उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 7:10 - 8:12
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 7:10 – 8:12
कार्यक्रम : #0025

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प्रिय मित्रों, आप सबको प्रभु यीशु के मीठे और पवित्र नाम में प्रोमभरा नमस्कार। मुझे आशा है कि, हमेशा की तरह आज भी हमारे मेरे साथ बाइबल अध्ययन के लिए तैयार हैं। पिछले अध्ययन कप्रसारण में हमने उत्पत्ति 7:9 पद तक देख था। आज हम उसके आगे से अपना बाइबल अध्ययन आरंभ करेंगे, जहाँ हमने अपने अध्ययन को विराम दिया था। इसका विषय है।
सभी जीवित प्राणियों का विनाश, और जहाज़ के अन्दर के लोगों का, छुटकारा या बचाव। आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 7वें अध्याय का पद 10 से 17 तक।
उत्पत्ति 7:10 “सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा।“
उत्पत्ति 7:11 “जब नूह की आयु के छरू सौवें वर्ष के दूसरे महीने का सत्रहवाँ दिन आया; उसी दिन बड़े गहरे समुद्र के सब सोते फूट निकले और आकाश के झरोखे खुल गए।“
उत्पत्ति 7:12 “और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृथ्वी पर होती रही।“
उत्पत्ति 7:13 “ठीक उसी दिन नूह अपने पुत्र शेम, हाम, और येपेत, और अपनी पत्नी, और तीनों बहुओं समेत।“
उत्पत्ति 7:14 “और उनके संग एक एक जाति के सब बनैले पशु, और एक एक जाति के सब घरेलू पशु, और एक एक जाति के सब पृथ्वी पर रेंगनेवाले जन्तु, और एक एक जाति के सब उड़नेवाले पक्षी, जहाज में गए।“
उत्पत्ति 7:15 “जितने प्राणियों में जीवन का प्राण था उनकी सब जातियों में से दो दो नूह के पास जहाज में गए।“
उत्पत्ति 7:16 “और जो गए, वे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सब जाति के प्राणियों में से नर और मादा गए। तब यहोवा ने जहाज़ का द्वार बन्द कर दिया।“
उत्पत्ति 7:17 “पृथ्वी पर चालीस दिन तक जल-प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़ता ही गया, जिससे जहाज़ ऊपर को उठने लगा; और वह पृथ्वी पर से ऊँचा उठ गया।“

इस जल प्रलय का वैज्ञानिक, एतिहासिक सबूत क्या है? मैं इस विवाद के विषय में न पड़ते हुए केवल एक ही पुस्तक की अनुसंशा करना चाहुँगा, हेन्री एम मोरिस और जॉन सी विट्कॉम्ब द्वारा लिखित पुस्तक, “द जेनेसिस फ्लड“। ये दोनों व्यक्ति इस विषय पर लिखने के लिए उपयुक्त है क्योंकि जॉन पुराने नियम की पुस्तकों के विशेषज्ञ हैं और मोरिस एक सिविल इन्जीनियर हैं जो इस क्षेत्र के विशेषज्ञ है। उन दोनों ने मिल कर यह पुस्तक लिखी है। उन्होंने इस बात को साबित किया है कि पह जलप्रलय़ पूरे संसार में पृथ्वी पर आया था। यह एक बहुत बड़ी तबाही थी, और इसके ऐतिहासिक सबूत भी हैं। वे यूनिफॉर्मिटेरियन तर्क का भी जवाब देते हैं (जिसका अर्थ है कि वर्ततान की प्रक्रियाएं जो अभी काम कर रही हैं, वे सभी भूवैज्ञानिक बदलावों को समझाने के लिए पर्याप्त हैं)। यह उन अनेक अलग-अलग सिद्धान्तों में से एक है जो पूरी पृथ्वी पर आई बाढ़ के भूवैज्ञानिक सबूतों को गलत साबित करने के लिए पेश की गई थी। मेरा मानना है कि जलप्रलय के बहुत से ऐतिहासिक सबूत हैं, और मुझे इस बारे में विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस पुस्तक में बहुत ही बुद्धिमानी और वैज्ञानिक आधार पर इसका उत्तर दिया गया है। तब आइए हम आगे पढ़ते हैं और पद 18 से 23 को पढ़ें, लिखा है।
उत्पत्ति 7:18 “जल बढ़ते बढ़ते पृथ्वी पर बहुत ही बढ़ गया, और जहाज जल के ऊपर ऊपर तैरता रहा।“
उत्पत्ति 7:19 “जल पृथ्वी पर अत्यन्त बढ़ गया, यहाँ तक कि सारी धरती पर जितने बड़े बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए।“
उत्पत्ति 7:20 “जल पन्द्रह हाथ और ऊपर बढ़ गया, और पहाड़ भी डूब गए।“
उत्पत्ति 7:21 “और क्या पक्षी, क्या घरेलू पशु, क्या बनैले पशु, और पृथ्वी पर सब चलनेवाले प्राणी, और जितने जन्तु पृथ्वी में बहुतायत से भर गए थे, वे सब और सब मनुष्य मर गए।“
उत्पत्ति 7:22 “जो जो स्थल पर थे, उनमें से जितनों के नथनों में जीवन का श्वास था, सब मर मिटे।“
उत्पत्ति 7:23 “और क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगनेवाले जन्तु, क्या आकाश के पक्षी, जो जो भूमि पर थे सब पृथ्वी पर से मिट गए; केवल नूह, और जितने उसके संग जहाज में थे, वे ही बच गए।“

इस पुस्तक के अलावा बहुत सी पुस्तकें छपकर आई हैं, लेकिन मैं उसे अज्ञानी और झूठा-धर्मविज्ञानी मानता हूँ। उनका कहना है कि जलप्रलय सिर्फ स्थानीय था जिसका मतलब यह हुआ कि यह हिद्दकेल और फरात घाटी के आस-पास के क्षेत्र तक ही सीमित था। दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक बड़े बाँध के जैसे था। “उत्पत्त्ति का जलप्रलय“ नामक यह पुस्तक इस सब बातों का खण्डन करती है, तथा मुझे पूरा विश्वास है कि आप इस बात पर भरोसा और विश्वास करेंगे कि बाइबल यह कहती है कि वह जलप्रलय का जल पुरी पृथ्वी पर आया था। परमेश्वर ने कहा था कि पूरी पृथ्वी को नष्ट करने का समय आ गया है। उत्पत्ति 6:13 में परमेश्वर ने नूह से कहा, “सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्ट कर डालूँगा।

मानव परिवार उस समय तक एशिय और भारत के कई हिस्सों में आ चुके थे और निश्चित रूप से जानवर भी वहाँ थे, और इस विषय पर कोई विवाद नहीं कर सकता। परन्तु यदि कोई कहता हैं कि जलप्रलय विश्वव्यापी नहीं था तब तो नूह के अलावा और कोई है जिसने दोबारा मानव परिवार बनाना आरंभ किया। परन्तु परमेश्वर का वचन हमें ऐसी कोई बात नहीं बताता है। यदि आप दुविधा में हैं तो आपको या तो परमेश्वर के वचन को स्वीकार करना होगा या फिर इसे मानने से इन्कार करना होगा। मेरे विचार और अध्ययन के अनुसार, यह जलप्रलय, वास्तव में हुआ है, और यदि आप इसे स्थानीय जलप्रलय मानते हैं तो आगे चल कर आपको पता चलेगा कि आप परमेश्वर के वचन का इन्कार करने वालों में हैं। पवित्र बाइबल इस बात को पूर्ण रीति से स्पष्ट करती है कि जलप्रलय विश्वव्यापी था। पद 23 में लखा है, “जितनों के नथनों में जीवन था वे सब मर मिटे … केवल नूह, और जितने उसके संग जहाज़ में थे, वे ही बच गए।“ आगे पद 24 में लिखा है।
उत्पत्ति 7:24 “और जल पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा।“
दूसरे शब्दों में लगभग आधा साल या पाँच महीने के तक पानी पूरी पृथ्वी पर भरा रहा।

“द जेनेसिस फ्लड“ पुस्तक न केवल, स्थानीय जलप्रलय के प्रश्नों का उत्तर देती है, बल्कि यह एकरूपतावाद के प्रश्नों का भी उत्तर देती है, और बताती है कि यह विश्वव्यापी जलप्रलय था। कुछ लोग यह नहीं मानते हैं, कि पृथ्वी जलप्रलय की महाविपत्ति से, नाश हुई थी। इसका उत्तर हमें 2 पतरस 3:3-4 में मिलता है, “पहले यह जान लो कि अन्तिम दिनों में हँसी ठट्ठा करनेवाले आएँगे जो अपनी ही अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे और कहेंगे, “उसके आने की प्रतिज्ञा कहाँ गई? क्योंकि जब से बापदादे सो गए हैं, सब कुछ वैसा ही है जैसा सृष्टि के आरंभ से था?“ मित्रों, ठट्ठा करनेवाले हमेशा से ही एकरूपतावाद बने रहे हैं, परन्तु आप इस विचार को बहुत मज़बूती के साथ नहीं थाम सकते। और ऐसी परिस्थिति में आपको परमेश्वर के वचन की सत्यनिष्ठा को स्वीकार करना होगा। इसलिए इसको देखना, समझना और विश्वास करना बहुत ही अवष्य है।
इसके साथ ही अध्याय सात समाप्त होता है और अब हम अध्याय 8 से आगे बढ़ेंगे।

अध्याय 8

विषय: बारिश का थमना, पृथ्वी का सूखना, नूह का जहाज छोड़ना, नूह का वेदि बना कर बलिदान चढ़ाना।
बारिश का थमना / जल-प्रलय का अन्त
आइए हम पढ़ें उत्पत्ति अध्याय 8 का 1 से 4 पद
उत्पत्ति 8:1 “परन्तु परमेश्वर ने नूह और जितने बनैले पशु और घरेलू पशु उसके संग जहाज में थे, उन सभों की सुधि ली: और परमेश्वर ने पृथ्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा।“
उत्पत्ति 8:2 “और गहिरे समुद्र के सोते और आकाश के झरोखे बंद हो गए; और उससे जो वर्षा होती थी वह भी रुक गई।“
उत्पत्ति 8:3 “और एक सौ पचास दिन के पश्चात् जल पृथ्वी पर से लगातार घटने लगा।“
उत्पत्ति 8:4 “सातवें महीने के सत्रहवें दिन को, जहाज अरारात नामक पहाड़ पर टिक गया।“

मित्रों, हमें सिर्फ बाढ़ या जलस्तर के बढ़ने का लेख ही नहीं दिया गया है, परन्तु उसके प्रबल होने और अब जलस्तर के कम होने का भी लेख दिया गया है। हमें यह बताया गया है कि “परमेश्वर ने नूह की सुधि ली,“ यह कितनी अद्भुत बात है, कि “परमेश्वर ने पृथ्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा।“ ऐसा एक ही रात में नहीं हो गया। जलस्तर बढ़ने में कुल 150 दिन लगे, और फिर उसे घटने में कुल 261 दिन लगे। इसे देखकर मुझे नहीं लगता कि यह कोई स्थानीय जलप्रलय था। तब आगे पद 5 और 6 में हम पढ़ते हैं।

उत्पत्ति 8:5 “और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहले दिन को पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई दीं।
उत्पत्ति 8:6 “फिर ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात् नूह ने अपने बनाए हुए जहाज की खिड़की को खोलकर।“
इसे देखकर हम कह सकते हैं कि यह बाढ़ या जलप्रलय के समाप्त होने का आरंभ है। आप देखिए कि आगे नूह क्या करता है, इसे हम उत्पत्ति 8 अध्याय के 7 और 8 पद में पाते हैं, लिखा है।
उत्पत्ति 8:7 “एक कौआ उड़ा दिया: जब तक जल पृथ्वी पर से सूख न गया, तब तक कौआ इधर उधर फिरता रहा। “
उत्पत्ति 8:8 “फिर उसने अपने पास से एक कबूतरी को भी उड़ा दिया कि देखे कि जल भूमि पर से घट गया कि नहीं।“
यहाँ पर मज़ेदार बात है कि, नूह उड़ते पक्षियों को निहारने वाला या चौकीदार बन जाता है। उसने दो पक्षियों को भेजा। एक कौआ और दूसरी कबूतरी।
तब आगे पद 9 से 12 में लिखा है, हम पढ़ते हैं।
उत्पत्ति 8:9 “उस कबूतरी को अपने पैर टेकने के लिये कोई आधार न मिला, तो वह उसके पास जहाज में लौट आई रू क्योंकि सारी पृथ्वी के ऊपर जल ही जल छाया था। तब उसने हाथ बढ़ाकर उसे अपने पास जहाज़ में ले लिया। “
उत्पत्ति 8:10 “तब और सात दिन तक ठहरकर, उसने उसी कबूतरी को जहाज में से फिर उड़ा दिया।“
उत्पत्ति 8:11 “और कबूतरी साँझ के समय उसके पास आ गई, तो क्या देखा कि उसकी चोंच में जैतून का एक नया पत्ता है; इस से नूह ने जान लिया कि जल पृथ्वी पर घट गया है।“
उत्पत्ति 8:12 “फिर उस ने सात दिन और ठहरकर उसी कबूतरी को उड़ा दिया; और वह उसके पास फिर कभी लौटकर नहीं आई।“

मित्रों मैं चाहता हूँ कि आप अध्याय आठ में, कौआ और कबूतरी के द्वारा से प्रगट की गई आत्मिक सच्चाई पर भी ध्याने दें। जहाज़ में करीब एक साल बिताने के बाद नूह ने एक कौअे को उड़ा दिया और कौआ कभी लौट कर वापस नहीं आया। परन्तु कबूतरी लगातार आती रही यहाँ तक कि उसने अपनी चोंच में जलपाई की हरी पत्ती भी लाई। मित्रों, मैं नहीं जानता, कि क्यों कबूतरी और जलपाई के पत्ते, हमेशा से ही शान्ति के प्रतीक रहे हैं, लेकिन वे हैं। मैं नहीं समझ पाता कि, दूसरी बार, कबूतरी के वापस लौटने का, ठीक वही सन्देश है। परन्तु जब कबूतरी कभी नहीं लौटी तो वह परमेश्वर के न्याय और दण्ड के अन्त होने का चिन्ह था और अब पृथ्वी पर वह शान्ति पुनः लौट आई थी। लेकिन यह भी सही है कि मनुष्य जो जहाज़ से बाहर निकल रहे थे, वे उसी तरह के मनुष्य थे जैसे आदम के सभी सन्तानें थी, जिन्होंने जलप्रलय के न्याय को अपने ऊपर, पहली बार आने के लिए परमेश्वर को उकसाया था। मित्रों, आप देखेंगे कि जलप्रलय के बाद भी मनुष्यों मे कोई खा़स उन्नति नहीं हुई है। वास्तव में अभी तक नहीं हुई है, पाप से दूर होने के संदर्भ में।
मित्रों, हमारे लिए यहाँ पर एक महान आत्मिक शिक्षा है, और मैं नहीं चाहता कि आप संसार की, किसी वस्तु के लिए इसे खो दें। नूह यहाँ पक्षियों को देखने मंे व्यस्त है, उसने कौअे को छोड़ा और वह वापस नहीं आया। अब प्रश्न उठता है कि कौआ वापस लौटकर क्यों नहीं आया? आप अच्छी तरह इस बात को जानते हैं कि कौआ क्या खाता है – वह सड़े गले मांस से अपना पेट भरता है। उस समय पृथ्वी पर चारों ओर, पशु और मनुष्यों के शव जलप्रलय के बाद पड़े हुऐ थे। और कहीं-कहीं पर शव जल में तैर रहे थे। और यह कौआ उन शवों से अपना पेट भर रहा था। वह जहाज पर वापस इसलिए नहीं लौट क्योंकि वह दावत उड़ा रहा था, वह एक लम्बे समय के बात बहुत अच्छा समय व्यतीत कर रहा था। हम जानते हैं कि बाइबल में कौआ को एक अशुद्ध पक्षी की श्रेणी में रखा गया है।
दूसरी तरफ कबूतरी को एक शुद्ध पक्षी की श्रेणी में रखा गया है। आप को साद होगा कि जब नूह जहाज में प्रवेश किया तब शुद्ध और अशुद्ध दोनो पशु और पक्षी जहाज में थे। नूह ने कबूतरी को छोड़ा और कबूतरी सन्देश लेकर वापस आई। यह हमेशा घर में रहनेवाली कबूतरी थी। कबूतरी के दूसरी बार छोड़े जाने पर नूह को पूरा भरोसा हो गया था क्योंकि वह अच्छी तरह पक्षियों को समझने वाला बन गया था। और कबूतरी प्रमाण लेकर वापस लौटी कि अब भमि दिखने लगी है। और तीसरी बार, कबूतरी वापस नहीं आई। और तब नूह को समझ आ गया कि जलप्रलय का दण्ड समाप्त हो चुका है।
मित्रों मैंने पहले भी इस बात को कहा था कि बाइबल की सारी महान सच्चाईयाँ उत्पत्ति में ही आरंभ होती है। बाइबल हमें यह भी बताती है कि विश्वासियों में दो स्वाभाव होते हैं, एक पुराना और दूसरा नया स्वाभाव। जैसा 2 कुरिन्थियों 5:17 में लिखा है, “इसलिये यदि कोई मसीह मंे है तो वह नई सृष्टि हैः पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं।“
मित्रों, यहाँ पर ध्यान दें कि शुद्ध और अशुद्ध सब एक साथ रह रहे हैं। मैं और आप जो विश्वासी हैं, हमारे पास ये दो स्वभाव हैं। हमारे प्रभु ने यूहन्ना 3:6 पद में कहा, “क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।“ और रोमियों 7ः18 पद में पौलुस लिखता है, “क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती। इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते।“
पौलुस यहाँ पर दो स्वभावों के बीच के संघर्ष को बताता हैं और आज भी विश्वासियों के जीवन में, पुराने स्वभाव और नये स्वभाव के बीच में संघर्ष चलता रहता है।
कौआ न्याय किए गए संसार में गया, परन्तु उसने वहाँ मरे लोगो को खाने का प्रीतिभोज पाया क्योंकि वह इसके लिए ही जीवित रहता है। मरकर फूले हुए पशु का शव उसके लिए एक दावत के जैसे था। मैं कहता हूँ कि यह उसके लिए एक मद्यपान-उत्सव मनाने के समान था। बिना विश्राम किए वह आगे-पीछे और ऊपर-नीचे चलता ही रहा। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि, यही चित्र हमारे पुराने मनुष्यत्व के स्वभाव का भी है। हमारा पुराना स्वभाव उस कौअे के स्वभाव जैसा है। हमारा पुराना स्वभाव, संसार की वस्तुओं से प्रेम करता है और उसमें आनन्दित रहता है। और यही कारण है कि बहुत से लोग शनिवार को देर रात तक टेलीविजन देखते हैं और रविवार को आराधना के लिए चर्च या गिरजाघर नहीं जाते हैं। इसके लिए, आप मुझे, कोई दूसरा, और अच्छा बहाना, मत दीजिए। आपके पास भी वह पुराना स्वभाव है, परन्तु उसके लिए कोई बहाना नहीं है, क्योकि आपको उस पुराने स्वभाव में नहीं रहना चाहिए।
कबूतरी दण्ड दिए गए उस संसार में गई, परन्तु उसे वहाँ कोई आराम का स्थान नहीं मिला, कोई सन्तुष्टी नहीं मिली, और वह वापस जहाज़ में आ गई। कबूतरी, संसार में रह रहे विश्वासियों को चित्रित करती है। परन्तु कौआ संसार में गया और उसने उसे पसन्द किया। जब उसने उन पुरानी, लाशों को पाया, तो उसे लगा कि वह सहशत्राब्दी या सतयुग में पहुँच गया है। आप संसार को किस नज़रिए से देखते हैं यी उस पर निर्भर करता है। किसी प्रध्यापक ने ऐसा कहा है “क्या सही है और क्या गलत है, यह संबंध-सूचक है।“ क्या वह सही है? नहीं। जो परमेश्वर कहता है वही सही है, और यह जो प्रध्यापक कहता है गलत है। और जो भी हो, यदि वह इासे अधिक, नहीं देख पाता है, तो वह गलत है। जिसे परमेश्वर गलत कहता है वह गलत है। 1 यूहन्ना 2:15 में विश्वासियों से कहा गया है, “तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो…“। आज आप और मैं एक ऐसे संसार में जी रहते हैं जिसे दण्ड दिया जा चुका है। हम इसी संसार में जी रहते हैं लेकिन हम इस संसार के नहीं हैं। हमें इसका उपयोग करना है, दुरूपयोग नहीं करना है। हमें इस संसार से प्रेम में नहीं करना है परन्तु हमें इस पर जयवंत होने का प्रयत्न करना है कि हम संसार में खोए हुओं को जीत सकें, और परमेश्वर के वचन को बाहर निकालें। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने मरकुस 16:15 में कहा, “… तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।“ आइए हम अपनी ज़िम्मेदारियों को उठाते हुए और परमेश्वर के वचन को दूसरे तक पहुँचाने के काम में लगे रहें। और यह एक महत्त्वपूर्ण काम है। कबूतरी ने इस बात को समझ लिया कि वह किस प्रकार के संसार में थी इस कारण उसे उसमें कोई विश्राम शान्ति नहीं मिली। उसे सिर्फ जहाज़ में आकर ही विश्राम मिला, और यह जहाज़ हमारे प्रभु यीशु मसीह को दर्शाता है, यदि आप इसके पास आते हैं तब।
इस वक्त मैं आप सभी दर्शकों से बहुत ही व्यक्तिगत प्रश्न पूछना चाहता हूँ: मित्रों आप इन दोनें में से किस पक्षी के समान हैं, आप एक कौआ के समान हैं या उस कबूतरी के समान है? यदि आप परमेश्वर की सन्तान हैं तो आप में दोनों स्वाभाव पाया जाता है – परन्तु आप किस स्वाभाव के साथ जीवन जी रहे हैं? क्या आप परमेश्वर की बातों से प्रेम रखते हैं या नहीं रखते। विचार करें और स्वयं को तथा परमेश्वर को उत्तर दें। आज का अध्ययन आप को कैसा लगा कृपया हमारे परामर्शदाता को फोन करे के अवश्य सूचित करें। आइए प्रार्थना करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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