उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 1:1
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 1:1
कार्यक्रम : #0012

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सत्यवचन के सभी सम्मानित दर्शकों को प्रभु यीशु मसीह में प्रेम भरा नमस्कार। आइए मित्रों हम अपने अध्ययन में आगे बढ़तें हैं। अब तक हमने बाइबल अध्ययन मार्गदर्शन के साथ उत्पत्ति की पुस्तक के परिचय को देखा है। आइए अब हम देखते हैं उत्पत्ति पहने अध्याय के पद एक पर जिसका विषय है।

उत्पत्ति  1:1

विषय: सृष्टि की रचना, पृथ्वी का निमार्ण, पहले दिन-ज्योति, दूसरे दिन-सौर्य-मण्डल, तीसरे दिन-सूखी भूमि और पेड़-पौधे, चौथे दिन- सूर्य, चँद्रमा और तारे, पांचवे दिन-जीव-जन्तु, छठवें दिन-पशुओं की प्रजनन क्षमता और मनुष्य की सृष्टि।

सृष्टि की रचना

तो आइए हम पढ़ते है उत्पत्ति 1:1 लिखा है।

उत्पत्ति  1:1 “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।”

संसार में आज तक जितनी भी बातें कही गई हैं, उनमें से ये सबसे गहन और गंभीर कथन है। फिर भी हम पाते हैं कि आज के समय में भी, जिसमें हम जी रहे हैं, इस कथन को निश्चित रूप से चुनौती दी जा रही है। मुझे पूरा विश्वास है कि वास्तविक सृष्टि की रचना के बारे में हमारे पास बस यही एक कथन है। जो एक अपवाद है, जैसा हम अपने अध्ययन में आगे चलकर उत्पत्ति की पुस्तक में, मनुष्य और जीव जन्तुओं की रचना के संदर्भ में देखेंगे। परन्तु यह सृष्टि की रचना का विवरण है और मैं इस बात को मान कर चलता हूँ कि यह बहुत ही संक्षिप्त विवरण है।

कुछ लोगों को लगता है कि बाइबल में सृष्टि की रचना का वृत्तान्त और अधिक शब्दों में विस्तार के साथ लिखा जाना था। जिससे सृष्टि की रचना के उपर होने वाले विवाद को कम किया जा सकता था।

परन्तु मित्रों, यह बड़ी रोचक बात हैं कि परमेश्वर ने हमें निश्चय ही एक बहुत संक्षिप्त प्रकाशन दिया है। अब यहाँ एक प्रश्न उठता है कि जब परमेश्वर ने इस भाग को दिया तब उसके मन में क्या विचार रहा होगा? लेखक का यहाँ पर क्या उद्देश्य रहा होगा? क्या उसका उद्देश्य हमें भूगर्भशास्त्र पढ़ाने से था? इस घटनाक्रम के विषय में अनेकों तर्क-वितर्क तथा मतभेद हैं। कुछ समय पूर्व, किसी पश्चिमी देश में राज्य शैक्षणिक बोर्ड ने प्रस्ताव रखा कि बाइबल दी गई सृष्टि की उत्पत्ति के वृत्तान्त को विज्ञान की पुस्तकों में सम्मिलित किया जाना चाहिए। परन्तु मुझे समझ नहीं आता कि मैं इस बात से खुश होऊँ या नहीं। कुछ लोग मुझसे कहेंगे कि मुझे खुश होना चाहिए क्योंकि यह सही दिशा में उठाया हुआ एक कदम है। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं खुश क्यों नहीं हूँ। जो शिक्षक इसे पढ़ाएगा उसका जीवन चरित्र कैसा होगा, यह मेरी चिन्ता का विषय है? क्योंकि बहुत कम शिक्षक अच्छी मसीही पृष्ठभूमि से पाए जाते हैं, जो बाइबल की पृष्ठभूमि के आधार पर इसकी शिक्षा दे सकें। बहुत थोड़े मसीही शिक्षक हैं, जो सृष्टि के वृत्तान्त को सही रूप से समझ कर इसे सिखा सकते हैं।

डॉ. राल्फ गिरार्ड जो केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में जीवविज्ञान के प्रोफेसर और स्नातक महाविद्यालय के डीन थे। उन पर प्रेस (मीडिया) वालों ने आरोप लगाया कि, उन्होनें कहा है, “सृष्टि की रचना के सिद्धान्त“ की शिक्षा देना एक लगलग पक्षी (स्टॉर्क) के बारे में सिखलाने के जैसा है। यहाँ पर रोचक बात यह है कि “स्टॉर्क सिद्धान्त” के बारे में बाइबल कोई भी चर्चा नहीं करती है। परन्तु सृष्टि की रचना का वर्णन हमें मिलता है। इसलिए यदि आप अपनी बाइबल को ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो आपके अन्दर कभी भी स्टॉर्क सिद्धान्त के विचार नहीं आएँगें। मेरा मानना है कि यह व्यक्ति अवश्य ही बाइबल के विश्लेशण के बारे में जानता है, परन्तु यह भी स्पष्ट है कि वह परमेश्वर के वचन के बारे में बहुत कम जानता है। क्योंकि जैसा कथन उसने दिया है, उससे यह बात स्पष्ट होती है कि वह परमेश्वर के वचन को अधिक नहीं जानता है।

हम देखते हैं कि सृष्टि की रचना के विषय में मनुष्यों ने अपनी समझ के अनुसार अनेकों सिद्धान्त बना लिए हैं, परन्तु उनमें आपस में ही बहुत मतभेद हैं। सदा काल से ही मनुष्य की परिकल्पनों में मतभेद रहे हैं इसके परिणामस्वरूप लोगों में विवाद होते रहते हैं। वास्तव में ऐसे दो विपरीत विचारधारा के समुह हैं जिन्होंने उन्होंने अपनी हठधर्मी धारणाओं और दावों से समझदारी को प्रभावित कर गंदा कर दिया है। उनमें से एक जनसमूह उन अहंकारी वैज्ञानिकों का है जो मानते हैं कि जैविक और दार्शनिक या बॉयलौजिकल और फिलौस्फिकल विकास ही सुसमाचार का सत्य है या बाइबल के कहने का अर्थ है। दूसरा समूह युवा और अभिमानी धर्मशास्त्रियों का है जो अपने इस गूढ़ ज्ञान पर घमण्ड करते हैं कि उन्होंने यह खोज कर लिया है कि परमेश्वर ने यह रचना कैसे की। वे विज्ञान और बाइबल का सामंजस्य स्थापित करने वाले किसी सिद्धांत के बारे में चतुराई से लिखते और बोलते हैं। वे पूर्वकाल के महान बाइबिल व्याख्याकारों का तिरस्कार करते हैं क्योंकि वे उनकी तुलना में बाइबल के मामले में बहुत छोटे हैं।

मैं कहना चाहता हूँ कि इन दोनों समूहों को उस वचन पर विचार करना चाहिए जो अय्यूब 38:4 में परमेश्वर ने अय्यूब से तब कहा जब परमेश्वर अंततः उसके सामने प्रकट हुआ और उससे यह प्रश्न पूछा, जब मैं ने पृथ्वी की नींव डाली, तब तू कहाँ था? यदि तू समझदार है तो उत्तर दे“। दूसरे शब्दों में परमेश्वर मनुष्यों से कह रहा हैं – “कि हे मनुष्य तू सृष्टि की रचना के विषय में बहुत बातें बोलता तो है और अनेक सिद्धान्त भी प्रस्तुत करता है, परन्तु तू तो यह भी नहीं जानता कि जिस समय मैंने पृथ्वी की नींव डाली थी, उस समय तू कहाँ था?“

मित्रों, आज सृष्टि की रचना के विषय में हम अनेक सिद्धान्त तथा विचार देखते हैं, परन्तु समस्त सिद्धान्त दो वर्गों से विभाजित होकर समाप्त हो जाता है। उसमें से पहला वर्ग है “सृष्टि” और दूसरा वर्ग है “निराधार अनुमान।” सभी अन्य सिद्धान्त इन्हीं दो वर्गों के अन्दर आते हैं।

हम देखते हैं कि विकासवाद या क्रमिक विकास के सिद्धान्त में अन्य सिद्धान्त भी समाहित हैं, और भूतकाल तथा वर्तमानकाल में अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने इसे ठुकरा दिया था। हम इसे 2+2 = 4 की तरह एक वैज्ञानिक सिद्धान्त के समान प्रस्तुत नहीं कर सकते। इिसके बाद हमारे पास उत्पत्ति की पुस्तक के प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति का वृत्तान्त है जिसे हम विश्वास के द्वारा स्वीकार कर सकते हैं। यह अति रोचक बात है कि परमेश्वर ने उसे इसे इस रीति से बनाया है कि आप सिर्फ विश्वास के द्वारा ही इस गंभीर वचन को स्वीकार कर सकते हैं। कृपया यहाँ पर ध्यान दीजिए कि नये नियम में इब्रानियों की पत्री का लेखक, 11 अध्याय के 1 से 3 पद में क्या लिखता है, “अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। क्योंकि इसी के विषय में प्राचीनों की अच्छी गवाही दी गई। विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। पर यह नहीं कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।” सो हम देख सकते हैं कि वह महान समस्या आज भी वैसी ही खड़ी हुई है। कैसे परमेश्वर ने कुछ नहीं से कुछ बनाया? या दूसरे शब्दों में, किसी वस्तु के बिना उसने सब कुछ का निर्माण किया? आप इसका उत्तर या तो विश्वास के द्वारा या फिर अनुमान लगा कर प्राप्त कर सकते हैं। पर हम जानते हैं कि हमारे अनुमान का कोई आधार नहीं होता, वह अवैज्ञानिक कथन है।

आइए अब हम सृष्टि के आरंभ के संदर्भ में कुछ सिद्धान्तों और मान्यताओं को देखते हैं। ये वे लोग हैं जो कहते हैं कि हमें विज्ञान आधारित उत्तरों को ही महत्व देना चाहिए। मैं आप से पूछना चाहता हूँ कि विज्ञान आधारित उत्तर क्या है? आज वैज्ञानिक क्या कह रहे हैं? सन् 1806 में एक फ्रांसिसी प्रोफेसर श्री लायल ने बताया, कि सृष्टि की रचना के संदर्भ में फ्रेंच इन्स्टीटयूट ने ही लगभग 80 सिद्धान्त, प्रस्तुत किए है, जो पवित्रशास्त्र बाइबल के वचन के विरोध में थे, परन्तु आज उनमें से एक भी सिद्धान्त मान्य नहीं है। अर्थात् हमारे आज के युग में उन्हें कोई मान्यता नहीं है।

परमेश्वर का भक्त मूसा, एक मानवीय माध्यम था जिसे परमेश्वर ने उत्पत्ति की पुस्तक लिखने के लिए उपयोग किया। और मुझे ऐसा लगता है कि मूसा इस बात को देख कर मुस्कुराता होगा, कि किस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर, आज संसार के लोग परेशान हैं। क्योंकि जब उसने उत्पत्ति की पुस्तक लिखी, तब उसके मन में वैज्ञानिक वृत्तान्त देने की कोई मनसा नहीं थी। सन्त पौलुस, 2 तीमुथियुस 3:16-17 में, परमेश्वर के वचन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “संपूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है, ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए।“ इस प्रकार हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के वचन को लिखने का उद्देश्य, केवल धार्मिकता के विषय में शिक्षा देना है। परमेश्वर का वचन हमें जीवविज्ञान अथवा भूविज्ञान सिखाने के लिए नहीं लिखा गया है। मित्रों, यह पवित्र वचन वास्तव में केवल परमेश्वर से मनुष्य के संबंध को दर्शाने के लिए लिखा गया। और दूसरी ओर इसका उद्देश्य यह भी है कि मनुष्य जान ले कि परमेश्वर मनुष्य से क्या अपेक्षा या आशा करता है, और मनुष्य को क्या करना चाहिए कि उसका उद्धार हो सके? यदि आप चाहें तो उत्पत्ति की पुस्तक के प्रथम खण्ड पर आप लिख सकते हैं, उद्धार पाने के लिए मैं क्या करूँ, या परमेश्वर की योजना?“

आप अनुमान लगाए कि, यदि परमेश्वर ने सृष्टि की रचना का वैज्ञानिक आधारित विवरण दिया होता, तो मूसा के दिनों में कितने लोग इस बात को समझ पाते? या उस पर विश्वास करते? आज भी हमारे समय में कितने लोग इस बात को वैज्ञानित दृष्टिकोण से समझ पाते? आप को यह बात अपने मन मैं बैठा लेना चाहिए, कि बाइबल, पढ़े-लिख और शिक्षित लोगो के लिए ही नहीं लिखी गई है पर हर एक युग के साधारण और अनपढ़ लोगो के लिए भी लिखी गई है। यदि मूसा के दिनों में बाइबल वैज्ञानिक भाषा में लिखी जाती तो निश्चित तौर पर उसे त्याग दिया जाता।

इस कारण मनुष्यों ने जगत की सृष्टि या उत्पत्ति के विषय में अनेक विचार प्रस्तुत किए हैं। जिसमें पहला विचार है – माया या भ्रम है। इनका सोचना है कि सृष्टि एक माया या भ्रम है, वह सत्य से बिल्कुल परे है। लेकिन इसके बावजूद भी कुछ लोग इस सिद्धान्त को मानते हैं। दूसरे विचारकों का मानना है कि पृथ्वी अपने आप ही है, बिना किसी तत्व के उत्पन्न हुई है। (एक प्रकार से यह वही बात है जो बाइबल दूसरे तरीके से कहती है, पर इसमें परमेश्वर के वचन का भी उल्लेख किया गया है जिस कारण उसका निर्माण हुआ।) तीसरे प्रकार के लोगों का विचार है कि पृथ्वी की सृष्टि नहीं हुई परन्तु यह आदिकाल से ही विद्यमान थी। अन्तिम और चौथा विचार है – कि पृथ्वी की सृष्टि या रचना की गई है और पृथ्वी को किसी ने रचा है। इस विचार ने अनेकों सिद्धान्त को जन्म दिया है, जिसके द्वारा मनुष्य पृथ्वी की सृष्टि या रचना का हल ढूँढ़ने का प्रयास करता रहता है।

हमारे समक्ष कुछ सिद्धान्त हैं जिन्हें मनुष्यों ने जगत के इतिहास से लेकर अब तक विकसित किया हैं। डॉ. हारलो शापले जो हारवर्ड वेधशाला के अध्यक्ष थे – उन्होंने कहा था, “जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उसके संपूर्ण विषय में अभी तक हमें पूर्ण जानकारी नहीं है, अर्थात् अभी भी हम अन्धकार में हैं। उन्होंने यह भी पाया कि हमें अब तक ज्ञान में जितना विकास प्राप्त कर लेना चाहिए था, अनुमानतः हम उतना नहीं कर पाए हैं। हमने बहुत कुछ सीखा और खोजा है, पर फिर भी, हम यह जानते हैं कि जो हम नहीं जानते हैं वह हमारे ज्ञान से कितना दूर है।“ दूसरे शब्दों में, जिस पृथ्वी पर अभी हम रहते हैं, उसकी उत्पत्ति के संबंध में हम पूरी तरह से अँधकार में हैं।

जब एक प्रसिद्ध मानवविज्ञानी डॉ. लॉरेन एसले, को सृष्टि की रचना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “हम जितना आत्मिक बातों के बारे में जानते हैं, उतना हम तत्व या मैटर के बारे में अधिक नहीं जानते कि यह कैसे या कहाँ से आया। ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्मांड उभरते हुए स्तरों की एक श्रृंखला के रूप में उपस्थित है, जिनमें से कोई भी नीचे के स्तर जैसा नहीं है। हम इस परिवर्तन का इन्कार नहीं कर सकते कि मनुष्य और अन्य जीवों का विकास हुआ है। काश मैं आपके प्रश्नों का उत्तर दे पाता, लेकिन अपनी अज्ञान को बड़े-बड़े शब्दों में ढालने से न तो आपको और न ही मुझे कोई लाभ होगा।” दूसरे शब्दों में उनका मानना है कि आज भी हम उन मामलों में अज्ञानी हैं।

एक प्रसिद्ध जीवविज्ञानी एडविन कॉकलीन, सृष्टि की उत्पत्ति के संदर्भ में कहते हैं, “जीवन का उद्गम एक दुर्धटना से हुआ है, ऐसा कहना मानो छापखाने या प्रेस में किसी विस्फोट द्वारा पूरे शब्दकोश का तैयार होकर निकलने के समान है।“ किसी वैज्ञानिक द्वारा ऐसा कहा जाना बहुत ही अवैज्ञानिक प्रतीत होता है, पर यह ही सच्चाई है।

आज संसार की उत्पत्ति के तीन प्रमुख सिद्धान्त हैं जिसके बारे में ज्योतिष-शास्त्रियों ने भी बहुत कुछ कहा है। और इन तीनों बातों को जानना एक रोचक बात है। पहला है, “स्थिर अवस्था सिद्धान्त“ या स्टेडी स्टेट थ्योरी, दूसरा है, “महाविस्फोट सिद्धान्त“ या बिग बैन्ग थ्योरी, और तीसरा है – “दोलायमान (झुलायमान) सिद्धान्त या ऑसिलेशन थ्योरी।“ मुख्य तौर पर ये ही तीन सिद्धान्त माने जाते हैं।

विश्व प्रसिद्ध खगोलशास्त्रि, डॉ विल्यम ए बॉउम, ने एक राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान की सभा में कहा था कि, नई खोज-बीन “स्थिर अवस्था सिद्धान्त“ को नकार देती है, जो कहता है कि ब्रहमाण्ड हमेशा से स्थिर है और नये तत्वों का निमार्ण निरन्तर होता रहता है। कई वर्ष पूर्व यह सिद्धान्त स्वीकार किया गया था, परन्तु अब हमारे पास ब्रहमाण्ड की सृष्टि के नये सिद्धान्त उपस्थित हैं। उनका मानना है महाविस्फोट सिद्धान्त के आधार पर अरबों वर्ष पूर्व एक बड़ा विस्फोट हुआ और हम सब संभवतः दूसरे विस्फोट के लिए तैयार हैं जो अगले दस अरब वर्षों में होगा। मैं नहीं सोचता कि हमें इस विषय में कुछ चिन्ता करने की आवश्यकता है। परन्तु यह एक रोचक सिद्धान्त है जो ब्रिटेन में विकसित हुआ था।

कई वर्षों पूर्व प्रसिद्ध मानव वैज्ञानिक डॉ. लूईस लियाके, जो एक मसीही विश्वासी सेवक के पुत्र थे, उन्होंने अफ्रीका देश में मनुष्य की खोपड़ी की खोज की जिसे उन्होंने एक विलुप्त कड़ी या मिसिंग लिंक कहा। उन्होंने मनुष्य की खोपड़ी के टुकड़ों को खोद कर निकाला जिसके दाँत पूर्ण रूप से विकसित थे, और उन्होंने उसे “मानव सरौता“ या नटक्रैकर नाम दिया। उनका अनुमान था कि वह खोपड़ी एक किशोर की थी जो छः लाख साल पुरानी है। मित्रों, इस प्रकार के वृत्तान्त पहले भी सुनने में आते रहे हैं, लेकिन 1961 के बाद से हमने इस प्रकार के सिद्धान्तों के बारे में नहीं सुना है, इसलिए अब वैज्ञानिक जगत ने इस प्रकार के सिद्धान्तों को अस्वीकार कर दिया है।

मनुष्य की सृष्टि को बताने के और कई माध्यम भी हैं। डॉ लारेन्स एस ढ़िलों नामक एक वैज्ञानिक का कहना है कि मनष्य कोई प्राणी नहीं है, बल्कि एक पौधा है जिसका विकास भूरे रंग की एक समुद्री घास या शैवाल से हुआ था। उनका कहना है कि सभी जीव एक प्रकार के परिवर्तित समुद्री पौधे हैं। मित्रों, ऐसे सिद्धान्त केवल हास्यप्रद कथाओं के अलावा और कुछ नहीं हैं।

सृष्टि की रचना से संबंध में अनेक सिद्धान्त दिए जाते है। जमर्नी के वैज्ञानिक डॉ क्लॉस मैम्पेल कहते हैं, कि अब हमें मनुष्यों को वानरो और अन्य जीवजन्तुओं से मिला कर देखने का कोई कारण दिखाई नहीं देता है।

क्रमिक विकास का सिद्धान्त अनेक चरणों और दृष्टिकोणों में बंटा हुआ है। इसे कभी भी सत्य साबित नहीं किया गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब आप किसी झूठे या गलत वैज्ञानिक के स्तर तक नीचे उतर जाते हैं, और आज जब आप स्कूल में विज्ञान पढ़ा रहे  उन शिक्षकों के बारे में विचार करते है, वे इस हालत में नहीं हैं कि वे सही विचार रख सकें, क्योंकि महाविद्यालय में उन्हें सिर्फ एक ही विचार सिखाया जाता है, क्रमविकास का सिद्धान्त। क्रमविकास सिद्धान्त में एकता नहीं है और यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के द्वारा भी इसे स्वीकार भी नहीं किया गया है।

वैज्ञानिकों द्वारा भी विकासवाद के सिद्धान्त को सर्वसम्मती से स्विकार नहीं किया गया है। इंगलैन्ड के एक महाविद्यालय के मनोविज्ञान और जैविक-रसायनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर, डॉ. जी ए किरकुट कहते हैं, “एक सिद्धांत है जो कहता है कि समय के साथ कई जीवित प्राणियों में परिवर्तन देखे जा सकते हैं जिससे नई प्रजातियाँ बनती हैं। इसे “विकास का विशेष सिद्धांत“ कहा जा सकता है और कुछ मामलों में प्रयोगों द्वारा इसका प्रदर्शन भी किया जा सकता है। दूसरी ओर, एक सिद्धांत कहता है कि संसार के सभी जीवित प्राणी एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं। इस सिद्धांत को “विकास का सामान्य सिद्धांत“ कहा जा सकता है और इसके समर्थन में उपलब्ध प्रमाण इतने मजबूत नहीं हैं कि हम इसे एक कार्यशील परिकल्पना से अधिक कुछ मान सकें।“

एक स्वीडिश वनस्पतिशास्त्री डॉ. हेरिबर्ट निल्सन, जो स्वयं एक विकासवादी भी हैं, वे कहते हैं: “चालीस वर्षों से भी अधिक समय से चल रहे प्रयोगों द्वारा विकासवाद को प्रदर्शित करने का मेरा प्रयास पूरी तरह विफल रहा हैं… दृढ़ता से यह कहा जा सकता है कि जैविक प्राणियों का शरीर तो दूर उनका काटूर्न भी बनाना संभव नहीं है। जीवाश्म पदार्थ अब इतने पूर्ण हो गए हैं कि उनके नए वर्गों का निर्माण संभव हो गया है, और संक्रमणकालीन श्रेणियों के अभाव को पदार्थ की कमी के कारण समझाया नहीं जा सकता। कमियाँ वास्तविक हैं, वे कभी पूरी नहीं होंगी। विकासवाद का विचार केवल विश्वास पर आधारित है इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं।“

क्या मैं आप से कह सकता हूँ, विकासवाद अब धर्म के दायरे में जा रहा है! विकासवादी होने के लिए आपको उसके तथ्यों को विश्वास के साथ ही स्वीकार करना होता है। विकासवाद एक धोखा है और यह सदा से ऐसा ही है। लेकिन, दुर्भाग्य से, बहुत से लोगों ने इसे सच मान लिया है।

परमेश्वर का वचन बिलकुल स्पष्ट कहता है, आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की रचना की। आप केवल विश्वास से इसे स्विकार कर सकते हैं और इसलिए ही हम विश्वासी कहलाते हैं। आइए विश्वास की प्रार्थना के साथ परमेश्वर को धन्यवाद दें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

आज के पैसेज से आपने जो मुख्य बात सीखी, उसे लिखें।

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