उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 1:1
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 1:1
कार्यक्रम : #0013

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प्रिय दर्शक मित्रों एक बार पुनः आप सभी को हमारे प्रभु यीशु मसीह के पवित्र और महिमामय नाम में प्रेम भरा नमस्कार। आशा है आप परमेश्वर के वचन का मनन करने के लिए तैयार बैठे हैं। आज हम उत्पत्ति पहले अध्याय से अपना मनन आरंभ करने जा रहे हैं। तो आइए अपने अध्ययन को आरंभ करें।

 

मित्रों हमारे आज के समय के धर्मशास्त्र के ज्ञाताओं के एक समुह, विशेष करके युवा वर्ग के धर्मशास्त्री जो स्वयं को रूढ़ीवादी बुद्धिजीवी कहलाना नहीं चाहते, उन्होंने स्वयं “आस्तिक विकासवाद“ को अपना लिया है। (आस्तिक विकासवादी मानते हैं कि परमेश्वर ने विकास की वैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से ब्रह्मांड और जीवन का निर्माण किया है, परन्तु अपने वचन के द्वारा नहीं जैसा बाइबल कहती है।) किसी भी निर्जीव वस्तु का पहली बार जीवित प्राणी में विकसित होना विकासवाद की दिशा में एक लम्बी छलांग को प्रगट करता है। आस्तिक विकासवाद संभवतः सभी सिद्धांतों में वास्तविक नहीं है। यह मूलतः तर्कविहीन, सिद्धान्त और परिस्थिति को निर्मिण करता है। आज कुछ ऐसे लोग हैं, एक तरफ तो वे अपने हाथों में बाइबल रखते हैं पर दूसरी तरफ गैरविश्वासियों के साथ विकासवाद की भीड़ में भी खड़े देखें जा सकते हैं। दो नावों पर पैर रख कर चलना असंभव है। “आस्तिक विकासवाद“ की यही स्थिति है। वे प्रायः गलत घोड़े के साथ सवारी करते हुए पाए जाते हैं।

हमारे आज के युग में बुद्धिमान मनुष्यों के मन में अनेक गलत जानकारियाँ और धारणाएं भरी हुई हैं। उदाहरण के लिए, कई वर्षों पहले किसी गैरधार्मिक पत्रिका में किसी लेख में एक प्रश्न पूछा गया था। प्रश्न था, बाइबल के आधार पर संसार की रचना की तीथी या तारीक क्या है? और उसका उत्तर भी दिया गया था, सन् 4004 ईसा पूर्व। यह बहुत ही बचकाना और अर्थहीन उत्तर था।

 

एक अन्य पत्रिका में जीवन की उत्पत्ति से संबंधित एक लेख में कहा गया था कि जीवन के असतित्व में आने का समय अनिश्चित है, पर कुछ लोग कहते हैं कि करीब दो अरब साल पहले जीवन विकसित हुआ, कुछ कहते हैं कि डेढ़ अरब साल पहले, जीवन चमत्कारिक रूप से गहरे समुद्र की सतह पर प्रकट हुआ। पर विज्ञान यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि किस रूप या आकार में जीवन का विकास हुआ था। उस लेख के आधार पर बस यही कहा जा सकता है कि, “किसी माध्यम से कुछ विशाल अणुओं ने स्वयं की नकल तैयार करने की क्षमता प्राप्त कर ली।“ मित्रों, क्या आप इस सिद्धांत से सहमत हो सकते हैं कि विशाल अणुओं ने स्वयं की प्रतिलीपि या नकल बनाने की क्षमता प्राप्त कर ली है?

 

ऐसे ही बहुत से बेतुके सिद्धांत सामने आते हैं। एक कहता है कि मनुष्य इस धरती पर उस कचरे से आया है जिसे किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने इतिहास के धुँधले अतीत में इस धरती पर छोड़ दिया था। क्या आप विश्वास कर सकते हैं दोस्तों कि यह कथन एक वैज्ञानिक द्वारा कहा गया है! मैं आप के बारे में तो नहीं जानता, पर मैं यह मानता हूँ कि सृष्टि और मनुष्य की रचना के संदर्भ में परमेश्वर का जो कथन है वह आज भी आधुनिक युग में प्रासंगिक, अचूक और उचित है।

 

विकास के संदर्भ में एक परिभाषा, हर्बर्ट स्पेंसर ने दी थी जो एक दार्शनिक थे, और उन्होंने “अस्तित्व की लड़ाई“ या फिटेस्ट फॉर सरवाईवल जैसे वक्तव्य दिए थे। क्या आप इस विचार पर विश्वास कर सकते हैं? इसे समझ सकते हैं? मैं तो नहीं।

 

परन्तु मेरे लिए तो आज भी वह वचन अर्थ रखता है, जो कहता है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ क्या आप जानते है कि किसने इस ब्रम्हाण को बनाया? परमेश्वर ने! उसने इसे पूरे संसार की सभी वस्तुओं को किसी भी वस्तु या मैटर के उपयोग के बिना रचा। पर कब? मैं नहीं जानता। हम नहीं जानते, कोई भी मनुष्य नहीं जानता। कुछ लोग कहते हैं एक अरब साल पहले, कुछ कहते हैं दो अरब साल पहले और अब कुछ लोग कहते हैं पॉच अरब साल पहले। मुझे लगता है कि हम केवल अनुमान लगा सकते हैं। मेरा मानना है कि यह उससे भी बहुत पहले रचा गया था। मित्रों हमें एक बात अपने मन-मष्तिस्क में बैठा लेनी चाहिए कि परमेश्वर के पीछे अनन्त काल का समय, जिसे आप और मैं गिन नहीं सकते। उस अनन्त काल के समय में लाखों साल पहले परमेश्वर क्या कर रहा था? क्या वह आप के और मेरे इस संसार में आने का इन्तजार कर रहा था? नहीं, वह अपने कार्य में व्यस्त था। परमेश्वर ने हमें बहुत कुछ नहीं बताया है जो हम अब भी नहीं जानते हैं।

 

इस कारण यह हमें उस महान कथन को ग्रहण करने के लिए प्रेरित करता है जिसके द्वारा परमेश्वर अपने वचन बाइबल का आरंभ करता है और कहता है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ आइए हम भजनकार के साथ मिल के भजन संहिता 8:3 के अनुसार कहें, “जब मैं आकाश को, जो तेरे हाथों का कार्य है, और चंद्रमा और तारागण को जो तू ने नियुक्त किए हैं, देखता हूँ।“ साथ ही भजन संहिता 19:1 में वह यह भी अनुभव करता है, “आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है।“

 

रोमियों की पत्री 1:20 में पौलुस प्रेरित कहता है,उसके अनदेखे गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं, यहाँ तक कि वे निरुत्तर हैं।“ तथा इब्रानियों की पत्री का लेखक इब्रानियों 11:3 में कहता है, विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। पर यह नहीं कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।“ हमें सृष्टि की रचना को विश्वास के द्वारा ग्रहण करने की आवश्यकता है। यहाँ तक की विज्ञान हमें आज तक यह नहीं बता पाया है कि सभी चीजों की रचना किसी भी वस्तु के बिना शून्य से कैसे हुई है, जब कोई वस्तु या सामग्री उपस्थित ही नहीं थी। परमेश्वर ने उसे ऐसे ही रचा है। आज मनुष्य यह भी नहीं बता सकता कि वह स्वयं कब रचा गया था।

 

जब हम उत्पत्ति की पुस्तक में सृष्टि की रचना के वृत्तांत की तुलना अन्य रचना के वृत्तांतों से करते हैं, तो हमें चौंकाने वाले अंतर दिखाई देते हैं। प्रायः सृष्टि की रचना में सभी राष्ट्रों में रचना की एक न एक कथा प्रचलित कथा है, और संभवतः वे सभी उत्पत्ति के वृत्तांत का ही भ्रष्ट और बिगड़ा हुआ स्वरूप हैं। उदाहरण के लिए, हमें एक राष्ट्र की रचना का सबसे अच्छा वृत्तांत बेबीलोन की रचना की पट्टिकाओं में मिलता है। आइए हम उन अंतरों पर जरा गौर करें। बेबीलोन की पट्टिकाओं में रचना का आरंभ गड़बड़ी से होता हैं। दूसरी तरफ, बाइबल के वृत्तांत में सृष्टि की रचना का आरंभ ब्रह्मांड, या यूनीवर्स के निमार्ण से होता है। जैसा हम ने पढ़ा था, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ बेबीलोन के वृत्तांत के अनुसार आकाश के सारे गण देवता है पर बाइबल के वृत्तांत के अनुसार संसार में वे केवल पदार्थ या एक सब्सटेन्स हैं। बेबीलोन के वृत्तांत में बहुदेववादी धर्मशास्त्र प्रस्तुत किया गया है परन्तु बाइबल के वृत्तांत के अनुसार केवल एक ही ईश्वर है यही सच्चाई है। बेबीलोन के वृत्तांत के अनुसार ब्रह्मांड किसी शिल्पकार का काम है, परन्तु बाइबल के वृत्तांत के अनुसार परमेश्वर ने कहा और वह अस्तित्व में आ गया। बेबीलोन का वृत्तांत अपनी बचकानी और विचित्र बातों के लिए जाना जाता है, जबकि बाइबल उस सृष्टिकर्ता परमेश्वर को, जो पवित्र और उद्धार करने वाला है, उसकी भव्य और गंभीर वास्तविकता में प्रगट करती है। बेबीलोन का विवरण निश्चित रूप से विज्ञान आधारित नहीं है, लेकिन बाइबल पूर्णतः विज्ञान के अनुरूप सिद्ध है।

 

मैं विकासवाद को इसलिए अस्वीकार करता हूँ क्योंकि वह ईश्वर और ईश्वरीय प्रकाशन को अस्वीकार करता है। विकासवाद मनुष्य के पतन अर्थात पाप में गिरने और पाप की सच्चाई को भी नकारता है, तथा विकासवाद प्रभु यीशु मसीह के कुंवारी से जन्म का विरोध करता है। इसलिए, मैं इसे पूरी रीति से अस्वीकार करता हूँ। मैं यह नहीं मानता कि क्रमिकविकास सृष्टि की उत्पत्ति का उत्तर है।

 

ऐसे तीन महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिन्में विकासवाद आगे बढ़ नहीं सकता और उन्हें हल नहीं कर पाता है। क्रमिकविकास शून्य या कुछ नहीं से किसी वस्तु के निर्माण करने के भेद का हल नहीं दे सकता। शून्य से जीवन की उत्पत्ति के भेद का भी हल विकासवाद के पास नहीं है। वह जीवन और मानवता के बीच के संबंध की खाई को पाट नहीं सकता – अर्थात, आत्म-चेतना वाले मनुष्य के जीवन और उसकी स्वतंत्र इच्छाशक्ति के बीच के ताल-मेल को समझा नहीं सकता।

हालाँकि इन विषयों पर और बहुत कुछ कहा जा सकता है, तब एक तीसरा प्रश्न भी उठता है। लोग न केवल यह पूछ रहे हैं कि किसने और कब सृष्टि की रचना की, बल्कि यह भी कि जिसने की उसने सृष्टि की रचना क्यों की। यकीनन, यह बात हमें इस प्रश्न के मूल विषय तक पहुँचती है। और यह बहुत महत्वपूर्ण है।

परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि परमेश्वर ने सृष्टि की रचना अपनी प्रसन्नता के लिए की। उसे बनाना परमेश्वर को उचित लगा और इससे वह प्रसन्न हुआ। बाइबल की अन्तिम पुस्तक प्रकाशितवाक्य 4:11 में लिखा है, हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा और आदर और सामर्थ्य के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएँ सृजीं और वे तेरी ही इच्छा से थीं और सृजी गईं।” परमेश्वर ने इस सृष्टि को इसलिए रचा क्योंकि वह इसे रचना चाहता था, यह उसकी इच्छा थी। उसने अपने आनन्द के लिए इसका निमार्ण किया। हो सकता है कि आप इस संपूर्ण ब्रम्हाण को पसंद न करें पर परमेश्वर करता है। उसने कभी किसी से यह नहीं पूछा कि इस छोटी पृथ्वी को जिस पर हम रहते हैं उसे संपूर्ण सौर्य मण्डल में कहाँ रखना चाहिए। वास्तव में परमेश्वर ने किसी मनुष्य से कभी यह नहीं पूछा कि वह किस देश या किस परिवार में पैदा होना चाहता हैं। शायद मुझे विकल्प दिया जाता तो मैं कुछ और मांग सकता था। संपूर्ण सृष्टि परमेश्वर की इच्छा से उसकी प्रसन्नता के लिए रची गई है। उसे अच्छा लगा और वह इससे आनन्दित है।

 

दूसरा कारण है, सृष्टि परमेश्वर की महिमा के लिए रची गई। अय्यूब 38:7 में लिखा है, जब कि भोर के तारे एक संग आनन्द से गाते थे और परमेश्वर के सब पुत्र जयजयकार करते थे?“ सृष्टि की रचना परमेश्वर की महिमा को प्रगट करने के लिए की गई थी। उसी प्रकार यशायाह 43:7 में यशायाह भी इस बात को कहता है, हर एक को जो मेरा कहलाता है, जिसको मैं ने अपनी महिमा के लिये सृजा, जिसको मैं ने रचा और बनाया है।”

 

परमेश्वर का वचन हमें यह भी बताता है कि परमेश्वर ने इस ब्रम्हाण में मनुष्यों को अपनी संगति के लिए बनाया था। उसकी धारण मानवजाति के साथ सहभागिता रखने की थी, इस कारण उसने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा के साथ रचा। उसने मनुष्य को किसी रोबोट के समान नहीं बनाया। परमेश्वर मशीन मानव बना सकता था और एक बटन दबाकर उन्हें अपने सामने झुकने को मजबूर कर सकता था। परमेश्वर को ऐसा मनुष्य भी नहीं चाहिए था। परमेश्वर चाहता था कि मनुष्य उसे अपने ईश्वर के रूप में चुने, परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी सेवा करने के लिए वह मनुष्य स्वतंत्र हो।

 

मेरे मित्रों, आज हमारे चारों ओर फैले अविश्वास, ईशनिंदा और परमेश्वर के प्रति शत्रुता के बीच, एक मनुष्य के तौर पर आप जो सबसे बड़ा काम कर सकते हैं, वह है सार्वजनिक रूप से प्रभु यीशु मसीह को अपने परमेश्वर के रूप में चुनना और उसे स्विकार करना। स्वर्ग और पृथ्वी के रचयिता, सर्वशक्तिमान परमेश्वर पिता में विश्वास करना और उसके पुत्र, प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार करना, आपके और मेरे लिए सबसे गौरवशाली कार्य है। जब हम प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता चुनते हैं, तब ही हमें वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त होती है।

अब हम उत्पत्ति के पहले अध्याय के पहले पद पर आते हैं, जहाँ लिखा है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ यह एक बेजोड़ और अद्भुत पद है। मेरे विचार में यह वह द्वार है जिससे आप बाइबल के भीतर प्रवेश करते हैं। आप को विश्वास करना होगा कि परमेश्वर ही सृष्टिकर्ता है, क्योंकि जो कोई परमेश्वर के पासा आता है उसे यह विश्वास करना चाहिए कि वह है। जैसा लिखा है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“

 

जब कहता है, “आदि में“, तो यह वह आरंभ का बिन्दु है जिसकी तिथी आप जान नहीं सकते। आप अनुमान लगा कर लाखों अरबों वर्ष कह सकते हैं, पर कौन जानता है कि वास्तविकता क्या है। निश्चित तौर पर मनुष्य कुछ नहीं जातना है।

तब आगे लिखा है, “परमेश्वर ने सृष्टि की“। “सृष्टि की“ के लिए इब्रानी भाषा में “बारा“ शब्द उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कुछ नहीं से कुछ बनाना या निर्माण करना। इस शब्द का उपयोग उत्पत्ति के पहले अध्याय में केवल तीन बार किया गया है। क्योंकि इसके द्वारा केवल तीन चीजों की रचना की गई। (1) कुछ सामग्री या वस्तु न होने पर भी किसी वस्तु का निमार्ण: “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ (2) जीवन का सृजन: उत्पत्ति 1:21 में लिखा है, इसलिये परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की ……… और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।“ यह है सभी प्रकार के जीव-जन्तुओं की रचना। (3) मनुष्य की रचना: उत्पत्ति 1:27 में लिखा है, तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।“ आस्तिक विकासवाद सृष्टि की इस रचना का उत्तर नहीं है। आस्तिक विकासवाद सृष्टि को मनुष्य के समय तक ले जाने का प्रयास करता है, फिर आदम और हव्वा को किसी विकासवादी प्रक्रिया का परिणाम मान लेता है। आस्तिक विकासवादी उत्पत्ति में वर्णित दिनों को समय की अवधि के बराबर लंबी अवधि मानते हैं। परन्तु परमेश्वर द्वारा सृष्टि के दिनों को “तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ, इस प्रकार पहला दिन हो गया इस प्रकार प्रगट करता है। इन शब्दों के द्वारा यह स्पष्ट होता है कि वह वास्तव में चौबीस घंटे के दिनों की ही बात कर रहा है।

 

दोस्तों जब कहता है, परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ तो आप समझ सकते हैं कि पृथ्वी बाकी सारी रचनाओं से अलग है। पर ऐसा क्यों? क्योंकि पृथ्वी मानवजाति का घर है, उसके रहने का स्थान है, जहाँ उसे रखा जाना था। हमारी रूची उसमें है क्योंकि हम इसी सृष्टि के हैं। मित्रों हमें इस बात को याद रखना होगा कि आप और मैं प्राणी मात्र है, हम परमेश्वर रचित प्राणी मात्र है। परमेश्वर रचित प्राणी होने के कारण हम पर परमेश्वर का कुछ कर्ज है, कुछ जिम्मेदारी है।

 

कई वर्षों पहले एक दार्शनिक, हर्बर्ट स्पेंसर, जिन्होंने अस्तित्व के लिए संघर्ष, या सर्वाईवल ऑफ फिटेस्ट का नारा देते हुए समाज में विकासवाद के विचार को बढ़ावा दिया था,  कहा था, “अज्ञात बातों की अभिव्यक्तियाँ, जिन सबसे सामान्य स्वरूपों में फिर से विभाजित की जा सकती हैं, वे हैं समय, स्थान, पदार्थ, बल, गति।“ अंग्रजी में कहें तो, टाईम, स्पेस, मैटर, फोर्स और मोशन। यह उनके विभाजन की श्रेणियाँ थीं। एक बार एक निजी कार्यकर्ता, जॉर्ज डेवी ब्लोमग्रेन, एक सेना के सार्जेंट से बात कर रहे थे, जो विधि स्नातक थे। श्री ब्लोमग्रेन उन्हें अपनी गवाही देने का प्रयास कर रहे थे। जब सार्जेंट ने हर्बर्ट स्पेंसर का ज़िक्र किया, तो श्री ब्लोमग्रेन ने उत्तर दिया, “क्या आप जानते हैं कि बाइबल और स्पेंसर, दोनों ही हमें सृष्टि के महान सिद्धांत की शिक्षा देते हैं?“ यह सुन कर, सार्जेंट की आँखें खुली की खुली रह गई और उन्होंने पूछा, “कैसा?“ ब्लोमग्रेन ने उत्तर दिया, “स्पेन्सर ने समय, स्थान, पदार्थ, बल और गति के बारे में बात किया था। वैसे ही उत्पत्ति के पहले दो पदों में हम पाते हैं, लिखा है: “आदि में“ अर्थात समय – टाईम, परमेश्वर ने “आकाश“ अर्थात स्थान – स्पेस, और “पृथ्वी“ अर्थात पदार्थ – मैटर, की रचना की। और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था। तथा “परमेश्वर का आत्मा“ अर्थात बल – फोर्स, जल के “ऊपर मण्डराता“ अर्थात गति – मोशन, था।“ स्पेंसर को इस नियम की खोज करने में पचास वर्ष लगे, लेकिन परमेश्वर के वचन, बाइबल में यह पचास सेकंड में ही सामने आ गया। सार्जेंट के पास उस तर्क को काटने का कोई आधार नहीं था और उसने शीघ्र ही मसीह यीशु को अपना उद्धारकर्ता मान लिया।

यह बहुत रोचक तथ्य है कि परमेश्वर ने उत्पत्ति के पहले दो पदों में इन महान सिद्धांतों को रखा है। हमारे लिए यह समझना कितना महत्वपूर्ण है।

मित्रों हो सकता है कि अब तक आप ने परमेश्वर के वचन को इस दृष्टिकोण से न हीं पढ़ा होगा और न ही समझा होगा जहाँ विज्ञान वचन को नहीं समझाता पर वचन विज्ञान के सिद्धान्तों को पूरा करता दिखाई देता है। क्या यह अध्ययन आप के विश्वास और परमेश्वर के प्रति आप के प्रेम को बढ़ाने में सक्षम रहा। कृपया हमें फोन या संदेश के द्वारा सूचित अवश्य करें। आइए प्रार्थना के साथ समाप्त करें।

 

 

 

 

 

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

आज के पैसेज से आपने जो मुख्य बात सीखी, उसे लिखें।

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