उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 1:2 - 1:25
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 1:2 – 1:25
कार्यक्रम : #0014

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प्रिय दर्शकों नमस्कार और सत्यवचन के एक और प्रसारण में आप का स्वागत है। हमने उत्पत्ति के पहले अध्याय के पहले पद को देखा था आज हम दूसरे पद से अपना मनन आरंभ करेंगे। तो आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 1:1 लिखा है।

उत्पत्ति 1:2 “पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था; तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डराता था।“

हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में कई लोगों ने इस दृष्टिकोण को नकार दिया है, पर मेरा मानना है कि पद 1 और 2 के बीच में एक महा प्रलय हुआ होगा। जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, इसके पर्याप्त प्रमाण उपस्थित हैं। सबसे पहले, इस विशाल सृष्टि पर ध्यान दीजिए, इसमें कुछ तो हुआ था! चाँद पर मनुष्य की यात्रा के द्वारा मात्र बंजर भमि की जानकारी ही प्राप्त हुई। यह वहाँ तक कैसा पहुँचा होगा? मेरा अनुमान है कि उस महा प्रलय के द्वारा से ही।

इसका उल्लेख विशेष तौर पर पृथ्वी के संदर्भ में किया गया है क्योंकि इसे उस स्थान पर स्थापित किया जाना था जहाँ मनुष्य वास करता है, इस कारण लिखा है, “पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी।“

 “और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था“, यह उस पृथ्वी पर परमेश्वर की अनुपस्थिति को प्रगट करता है।

यहाँ पर उपयोग किया गया शब्द, “पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी,“ बहुत ही रोचक कथन है। बेडौल के लिए इब्रानी भाषा में “तोहू“ शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है, खंडहर, बेकार, खाली या शून्य होता है। आप इसी बात को यशायाह 45:18 में की गई भविष्यद्वाणी में देख सकते हैं, “क्योंकि यहोवा जो आकाश का सृजनहार है, वही परमेश्वर है; उसी ने पृथ्वी को रचा और बनाया, उसी ने उसको स्थिर भी किया; उसने उसे सुनसान रहने के लिये नहीं परन्तु बसने के लिये रचा है। वही यों कहता है, “मैं यहोवा हूँ, मेरे सिवाय दूसरा और कोई नहीं है।“ यहाँ परमेश्वर कहता हैं कि उसने पृथ्वी को “सुनसान रहने के लिये“ नहीं बनाया, और इसके लिए जो इब्रानी शब्द उपयोग किया गया है, वह हमें उत्पत्ति 1:2 में मिलता है। परमेश्वर ने पृथ्वी को बेडौल और सुनसान नहीं बनाया है। परमेश्वर ने संपूर्ण जगत को सुव्यवस्थित बनाया और अव्यवस्थित नहीं बनाया है। और इसी बात को यशायाह नबी भी स्पष्ट करने का प्रयत्न कर रहा था। परमेश्वर ने इस संसार को तोहू और बोहू के रूप में नहीं बनाया था पर पृथ्वी तोहू और बोहू बन चुकी थी। परमेश्वर ने पृथ्वी को सुनसान पड़े रहने के लिए नहीं बनाया था, परन्तु उसने पृथ्वी को आबाद होने के लिए, अर्थात् मनुष्य के बसने के लिए बनाया। और वह परमेश्वर ही है जिसने इस पृथ्वी को विशेष तौर पर मनुष्यों के बसने के लिए रचा है।

वर्तमान समय में अंतरिक्ष पर किए गए हमारे अध्ययन और खोजों से यही पता चलाता है कि आप और मैं एक ऐसे ब्रह्मांड में रहते हैं जहाँ केवल पृथ्वी ही मनुष्यों के रहने योग्य बनी है। मेरा मानना है कि उत्पत्ति की पुस्तक हमें बताती है कि जब परमेश्वर की आत्मा जल पर मंडरा रही थी, तब यह पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और यह चंद्रमा के समान ही निर्जन हो गई थी।

मेरा मानना है कि पूरा ब्रह्मांड इस महाविनाश की चपेट में आया था। यह महाविनाश क्या था? हम केवल अनुमान लगा सकते हैं कि इस धरती पर आदम से पूर्व कोई प्राणी या जीवन था। और ऐसा प्रतीत होता है कि इन सब का संबंध भोर के पुत्र, लूसिफ़र के पतन या स्वर्ग से गिराए जाने से जुड़ा है। जो शैतान बन गया, जैसा आज हम उसे जानते हैं। मुझे लगता है कि यह सब इसमें शामिल है, लेकिन परमेश्वर ने हमें इसका विवरण नहीं दिया है। सच तो यह है कि उत्पत्ति के पहले अध्याय में उसने हमें संसार के बारे में बहुत कम विवरण दिया हैं।

तब लिखा है, “परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डराता था।“ मण्डराता के लिए जिस शब्द का उपयोग किया गया है उसका अर्थ है, जिस प्रकार मुर्गी अपने बच्चों की रक्षा करती है, उसी प्रकार वह आत्मा जल के ऊपर मण्डराता था। परमेश्वर के पवित्र आत्मा ने एक सेवकाई आरंभ किया था जिसे हम बार-बार करते देख सकते हैं। यह सृष्टि का पुनःनिर्माण है! पवित्र आत्मा चित्रण में आता है और पुनःनिर्माण करता है। यही वह हमारे लिए भी करता है।

आप को याद होगा कि यूहन्ना 3:5 में प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, यीशु ने उत्तर दिया, “मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता“।“ यहाँ जल परमेश्वर का वचन है। अब यदि आप इसे बपतिस्मा का चिन्ह बताना चाहते है तो ठीक है पर यहाँ पर जल का अर्थ है परमेश्वर का वचन। और पवित्र आत्मा इसका लेख या कर्ता है। यह हमारे लिए अति महत्वपूर्ण है।

पृथ्वी का निमार्ण

उत्पत्ति पहले अध्याय के पद एक में हम ने ब्रम्हाण का निमार्ण देखा था, तब पद दो में पृथ्वी पर होने वाली तबाही और उथल-पुथल को देखा था। अब हम आते हैं पृथ्वी के पुनःनिर्माण पर जिसका विवरण पद 3 से 31 में दिया गया है। मेरे विश्वास है कि यह विकास का चित्रण है।

यहाँ पर मैं कुछ प्रमुख बातों की ओर आप का ध्यान आकर्षित करना चाहुँगा। निर्गमन 20:11 में हम पढ़ते हैं, “क्योंकि छः दिन में यहोवा ने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें हैं, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।“ इस पद में रचना करने के संबंध में कुछ व्याख्या नहीं की गई है। उस में लिखा है “सब को बनाया“, इस का अर्थ है जो कुछ पहले से परमेश्वर ने रचा था, उसका उसने छः दिन में पुनःनिर्माण किया। इस समय उसने पूर्व निर्मित तत्वों का उपयोग करते हुए संसार को बनाया, संभवतः जिसे उसने करोडों वर्ष पहले निर्माण किया था।

 परमेश्वर ने जीवन का निर्माण किया और उसे पृथ्वी पर रखा, और उसने पृथ्वी के लिए आदम को रचा। यह वही प्राणी है जिस में हमारी रूची है क्योंकि आप और मैं उन प्राणियों में से एक हैं। इस कारण उत्पत्ति की पुस्तक का वर्णन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 1 का 3 से 5

प्रथम दिन – ज्योति

उत्पत्ति 1:3 “तब परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो,” तो उजियाला हो गया।“

उत्पत्ति 1:4 “और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।“

उत्पत्ति 1:5 “और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।“

ह चौबीस घण्टों का दिन रहा होगा। मुझे समझ नहीं आता कि इससे आप और क्या अनुमान लगा सकते हैं। ध्यान दीजिए कि लिखा है, तब परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो।“ दस बार इस अध्याय में लिखा है, “ऐसा हो जाए।“ “जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो, उजियाला हो, जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए, आदि। परमेश्वर के किसी भक्त ने इसे सृष्टि की रचना की दस आज्ञा कहा है। यहाँ हम प्रभु यीशु मसीह की प्रथम दस अलौकिक आज्ञाएं पाते हैं।

परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो।“ यह पहली बार है कि धर्मशास्त्र प्रगट करता है कि परमेश्वर ने कुछ कहा।

दूसरा दिन – भूमि और आकाश के मध्य का खाली स्थान।

आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 1 का 6।

उत्पत्ति 1:6 “फिर परमेश्वर ने कहा, “जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।”

“फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो जाए।“ इस खाली स्थान के लिए इब्रानी भाषा में “रक्यिा“ उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है खाली स्थान।

लिखा है, “जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो जाए।“ इसका क्या अर्थ होता है? सब से पहले परमेश्वर ने जल को लंबवत तरीके से ऊपर और नीचे में विभाजित किया। जिस कारण जल ऊपर भी है और नीचे भी है। तब पद सात में कहता है।

उत्पत्ति 1:7 “तब परमेश्वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।“

मित्रों हमारे भारत में मेघालय में मवास्यनराम और चेरापुंजि वह स्थान है जिसमें बहुत बारिश होती है। लगातार बरसात होती रहती है और थोड़े ही समय में कई इंच वर्षा होना सामान्य बात है। मित्रों बादलों में ऊपर इतना पानी है कि चंद मिनटों में कई इन्च बारिश हो सकती है। परमेश्वर ने यही किया, उसने पानी को ऊपर और नीचे में विभाजित कर दिया है। तब पद आट में कहता है।

उत्पत्ति 1:8 “और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।“

लिखा है, “और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा।“ यह वह आकाश नहीं है हम में से बहुत से लोग सोचते हैं। वास्तव में बाइबल तीन आकाश के बारे में बात करती है। हमारे प्रभु यीशु मसीह इसी आकाश के बारे में कह रह थे जब उन्होंने कहा था कि आकाश के पक्षियों को देखो वे न बोते हैं और न काटते है। यह प्रथम आकाश है। दूसरा आकाश वह स्थान है जहाँ आकाश के तारागण पाए जाते हैं, और तीसरा आकाश वह स्थान है, जहाँ परमेश्वर तथा उसके स्वर्गदूत निवास करते हैं। अंग्रेजी भाषा की बाइबल में इस आकाश को स्वर्ग कहा गया है। इस प्रकार से आकाश की प्रथम परत वह है, जहाँ वायुमंडल पाया जाता है, और पक्षी हवा में उड़ते दिखाई देते हैं। यहाँ पर इसी आकाश के बारे में कहा गया है।

आइ, अब हम तीसरे दिन की सृष्टि के विषय में देखें। पद 9 और दस में लिखा है।

तीसरा दिन-सूखी भूमि और पेड़ पौधे

उत्पत्ति 1:9 “फिर परमेश्वर ने कहा, “आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे,” और वैसा ही हो गया।“

उत्पत्ति 1:10 “परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।“

हम ने देखा है कि जल का एक लम्बवत अंतर है जो ऊपर और नीचे में विभाजित किया गया है। सब से पहले नीचे के पानी को ऊपर और नीचे में विभाजित किया गया। अब नीचे के जल को सूखी भूमि से अलग किया जाता है। आप ध्यान रखें मित्रों कि इस में कोई अवैज्ञानिक बात नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस सूखी भूमि पर हम आज रहते हैं वह एक दिन पूर्ण रूप से जल में डूबी हुई थी। यह स्पष्ट रूप से एक ऐसा निर्णय था जो बहुत पहले, अनंत काल में, पृथ्वी पर आया था, और हम इसके बारे में व्यावहारिक रूप से कुछ भी नहीं जानते। हम जो कुछ भी कहते हैं वह अनुमान पर आधारित हैं। वास्तव में परमेश्वर ने हमें इस पुस्तक में बहुत कम जानकरी दी है। लेकिन उसने हमें इतना अवश्य बताया है कि हम उस पर विश्वास कर सकें, बस इतना ही।

लिखा है, “परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा।“ परमेश्वर यहाँ क्या करने की तैयारी कर रहा है? ऐसा लगता है कि वह एक ऐसी जगह बनाने की तैयारी कर रहा है जहाँ वह मनुष्य को रख सके, एक ऐसी जगह जो उसके रहने लायक हो। मनुष्य कोई जली जन्तु नहीं है, हालाँकि कुछ विकासवादी मानते हैं कि हम समुद्र और समुद्री शैवाल से आए हैं, जैसा कि मैनें बताया था, और कुछ ऐसे भी हैं जो सोचते हैं कि हम किसी गंदे पानी की बाल्टी से निकले हैं! लोग कितने बेतुके केसे हो सकते हैं? तब आगे पद 11 में कहता है।

उत्पत्ति 1:11 “फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें,” और वैसा ही हो गया।“

अब परमेश्वर यहाँ पर हरे पेड़ पौघे उत्पन्न कर रहा है। पृथ्वी पर आए उस महान जल प्रलय के पहले मनुष्य शाकाहारी था। मनुष्य केवल फल और कंदमूल खाया करता था। इस प्रकार से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष की उत्पत्ति के साथ तीसरा दिन बीत गया। तब पद 12 और 13 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:12 “इस प्रकार पृथ्वी से हरी घास, और छोटे छोटे पेड़ जिनमें अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्हीं में होते हैं उगे: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।“

उत्पत्ति 1:13 “तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।“

चौथा दिन – सूर्य, चाँद और तारे उत्पन्न होते हैं। पद 14 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:14 “फिर परमेश्वर ने कहा, “दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों।“

आप देख सकते हैं कि परमेश्वर ने इस समय सूर्य और चँद्रमा को नहीं रचा, वे तो पहले से ही रचे जा चुके थे। परमेश्वर ने केवल उन्हें अपने स्थान पर व्यवस्थित किया। तब आगे पद 15, 16 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:15 “और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें,” और वैसा ही हो गया।“

उत्पत्ति 1:16 “तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियाँ बनाईं; उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया; और तारागण को भी बनाया।“

उन दो ज्योतियों में से एक को दिन पर प्रभुता करना था जिसे सूर्य ने बखूबी अंजाम दिया। साथ ही चँद्रमा ने रात की जिम्मेदारी संभाल लिया। चाँदनी रात सभी को अच्छी लगती है। रात पर चँद्रमा प्रभुता करता है।

साथ में एक छोटा सा वाक्य यह भी लिखा है, “उस ने तारागण को भी बनाया।“ यह एक बहुत बड़ा कार्य था परमेश्वर के लिए नहीं। एक बार अपने समय के महान प्रचारक जॉन वैसली ने कहा था, “परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की और उसने एक बार भी आधा प्रयास नहीं किया।“ अर्थात् एक बार मंे ही सब कुछ बनाया गया। परमेश्वर ने “तारागण को भी बनाया।“ तब पद 17 और 18 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:17 “परमेश्वर ने उनको आकाश के अन्तर में इसलिये रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें।“

उत्पत्ति 1:18 “तथा दिन और रात पर प्रभुता करें, और उजियाले को अन्धियारे से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।“

 आप ने ध्यान दिया होगा कि परमेश्वर ने उन्हें विभाजित किया, “उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।“

वह आज भी उजियाले को अन्धियारे से अलग करता है! आज कुछ लोग हैं जो पूछते हैं कि, “सही और गलत में क्या अंतर है?“ परमेश्वर ने इन दोनों के बीच अंतर किया है। परन्तु हम कैसे जानेंगे कि सही क्या है? परमेश्वर ही तय करता है कि सही क्या है। इस संबंध मंे उसने कुछ सिद्धान्त स्थापित किए हैं। परमेश्वर ज्योति को अंधकार से अलग करता है, और यही अंतर सही और गलत के बीच का भी है। परमेश्वर ही है जो उन में अंतर करता है और आज भी वह ऐसा करता है। तब आगे पद 19 और 20 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:19 “तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौथा दिन हो गया।“

पॉचवा दिन – जीव जन्तुओं का बनाया जाना

उत्पत्ति 1:20 “फिर परमेश्वर ने कहा, “जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।”

हमारा विकास एक निश्चित सीमा तक ही होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ एक छोटे से प्रयास से हुआ है, बल्कि यह है कि परमेश्वर ने हर प्राणी को एक बनाया है और हर एक का विकास हुआ है। परमेश्वर ने कहा, “जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।” अगले पद में लिखा है “अपने प्रकार के“। “प्रकार“ शब्द का अर्थ प्रजाति नहीं है, जैसा कि डार्विन ने भी कहा था, बल्कि इसका अर्थ उससे कहीं अधिक है। वह शब्द है समुदाय या जाति। किसी एक वैज्ञानिक ने कहा था कि वह इस संबंध में दूसरे पर्यायवाची शब्द खोज रहा था। तब किसी बाइबल कॉलेज के एक विद्वान प्राध्यापक ने समुदाय के लिए प्रकार शब्द का उपयोग किया। यदि आप शब्दकोष में उस शब्द का अर्थ देखेंगे, तो आप पाएंगे कि उसका अर्थ है, उसी समुदाय या प्रकार के अन्य प्राणी। उदाहरण के लिए उस में केवल एक घोड़ा नहीं आएगा पर उस प्रजाति के सभी प्राणी शामिल होंगे। परमेश्वर ने एक प्राणी को रचा तब उसी प्रकार के अन्य प्राणी विकसित हुए, यह अद्वितीय विकास था। इसी  के साथ अपकर्षण भी हुआ-कुछ प्राणियों का अपघटन भी हुआ। तब आगे पद में कहता है।

 उत्पत्ति 1:21 “इसलिये परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्टि की: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।“

आप ध्यान दें कि लिखा है, “परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है“। जब परमेश्वर कुछ करता है तो वह अच्छा ही होता है। आगे पद 22 में कहता है।

उत्पत्ति 1:22 “और परमेश्वर ने यह कहके उनको आशीष दी, “फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें।”

मैंने पहले आप से कहा था कि एक वैज्ञानिक ने कहा था कि यदि उनके स्कूलों में बाइबल के अनुसार सृष्टि की रचना पढ़ाने लगेंगे तो वे लग-लग पक्षी के सिद्धान्त को भी पढ़ाने लगेंगे। आप विश्वास करें कि बाइबल इस सिद्धान्त से बिलकुल दूर है और इसकी चर्चा भी नहीं करती है। यदि आप इसे ध्यान से पढेंगे तो पाँएगें कि इन जानवरों को सामने लाने की आवश्यकता थी। और यही बात मनुष्य के लिए भी सत्य साबित होती है। तब पद 23 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:23 “तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पाँचवाँ दिन हो गया।“

छठा दिन – प्राणियों की प्रजनन क्षमता

आइए हम पढ़ें पद 24 और 25 लिखा है।

उत्पत्ति 1:24 “फिर परमेश्वर ने कहा, “पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों,” और वैसा ही हो गया।“

उत्पत्ति 1:25 “इस प्रकार परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।“

आगे फिर से लिखा है कि “अपने ही प्रकार के“, जो अपने ही प्रकार के जाति को प्रगट करता है। अब आगे हम देखने जा रहे हैं कि परमेश्वर पेड़-पौधों और प्राणियों को मानव जाति से अलग करते हुए कहता है, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं।“ यह प्राणी आप के और मेरी रूची का है क्योंकि यही हमारे आदि माता-पिता है। जिसका अर्थ यह है कि हम सभी आपस में भाई-बहन हैं।

परमेश्वर ने हम सभी को एक दूसरे से संबंध में बनाया है और यह कोई दुर्घटना नहीं है पर परमेश्वर की योजना है। आइए हम परमेश्वर की इस योजना के लिए धन्यवाद दें। आइए प्रार्थना के साथ इस भाग को समाप्त करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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