उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक
आप क्या सुनेंगे
डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 6:4-6:13
कार्यक्रम : #0023
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प्रिय मित्र, आप सबको प्रभु यीशु मसीह के मीठे नाम में प्रेम भरा नमस्कार। मुझे आशा है कि, हमेशा की तरह आज भी आप मेरे साथ बाइबल अध्ययन के लिए तैयार हैं। पिछले प्रसारण में हमनें उत्पत्ति 6:3 पद तक अध्ययन किया था। आज हम उसी स्थान से अपनी बाइबल अध्ययन को आरंभ करेंगे, जहाँ हमने उसे पिछले अध्ययन में छोड़ा था। तो आइए हम पढ़ें उत्पत्ति अध्याय 6 का पद 4, लिखा है।
उत्पत्ति 6:4 “उन दिनों में पृथ्वी पर दानव रहते थे; और इसके पश्चात् जब परमेश्वर के पुत्र मनुष्य की पुत्रियों के पास गए तब उनके द्वारा जो सन्तान उत्पन्न हुए, वे पुत्र शूरवीर होते थे, जिनकी कीर्त्ति प्राचीनकाल से प्रचलित है।”
हमने यहाँ पर पढ़ा कि “उन दिनों में पृथ्वी पर दानव रहते थे।“ परन्तु यहाँ पर यह नहीं कहता है कि ये “परमेश्वर के पुत्रों” और “मनुष्यों की पुत्रियों” की सन्तान हैं। सन्तान के बारे में कहता है कि “वे शूरवीर होते थे जिनकी कीर्ति प्राचीनकाल से प्रचलित है।“ ये दानव या राक्षस नहीं थे। वे मनुष्य थे। लिखित प्रमाण, इस बात को स्पष्ट करता है, कि इस घटना के होने से पहले, इस पृथ्वी पर दानव रहते थे। इसका साधारण सा अर्थ है, कि ये सभी सन्तान एक विशिष्ट व्यक्ति थे।
मानवता के पास एक अद्भुत क्षमता है। मनुष्य को भयानक और अद्भुत रीति से बनाया गया है, यह एक महान सत्य है जो हमारी आँखों से ओझल हो चुका है। मित्रों, यह विचार रखना या मान का चलना कि मनुष्य एक कचड़े के डिब्बे (कूड़ेदान) से निकलकर आया एक जीवद्रव्य है, या समुद्री शैवाल से बना है पूर्णतः हास्यप्रद या निरर्थक है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि एक समय क्रमिकविकास का खण्डन किया जाएगा, और कुछ लोग उस समय हंसी के पात्र बनेंगें या बेतुके कहलाएंगे।
इस संसार में क्रमिकविकास जैसी कोई चीज नहीं है पर विज्ञान के संदर्भ में मात्र एक सिद्धान्त है। इसके कोई ठोस सबूत नहीं है। यह अन्य दर्शनशास्त्र की तरह ही एक दर्शनशास्त्र है। तथा आप इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते है। जब इसे स्वीकार किया जाता है, तो निश्चय ही, यह संसार की समस्याओं के प्रति कुछ सनकी-खेज समाधान की ओर ले चलता है। इसने संसार के सभी देशों को समस्या में डाल रखा है, और शायद हमें भी। कुछ लोग अपने आपको सर्वेसर्वा समझते हैं, लेकिन वे गलत हैं, मैं नहीं जानता कि लोग ऐसा क्यों सोचते हैं, कि वे अच्छे और शक्तिशाली हैं। इस प्रकार हू अपने स्वयं के विचारों में ही गलत हैं। बहुत से कॉलेज, दफ्तर, सूचना केन्द्र सोचते हैं कि वे महान हैं, लेकिन वे बड़ी मुश्किल से इस स्तर तक पहुँचे हैं। वास्तव में यह समय का भ्रम है कि जैसा मनुष्य सोचता है कि वह जितना महान है पर वह उतना महान है नहीं। मनुष्य गिरते जा रहा है, एक भयंकर गिरावट। आज वह पूर्णतः भ्रष्ट हो चुका है, और जब तक इस बात को सुधारा नहीं जाएगा हम समस्या और परेशानी में बने रहेंगे।
अब पद 4 में हमें क्या देखने को मिलता है? जैसे हम देख रहे हैं, उत्पत्ति की पुस्कत वंशावली की पुस्तक है, यह परिवारों की पुस्तक है। परमेश्वर की सन्तान, एक धर्मी या ईश्वरीय वंश क्रम है जो आदम से हो कर उसकी सन्तान शेत तक आता है, और मनुष्य की पुत्रियों कैन के वंश से उत्पन्न सन्ताने हैं। आज हमारे सामने जो लोग इस समय हैं, ये मिश्रित वंश है और इन दोनों वंशों के बीच विवाह संबंध के द्वारा से उत्पन्न हुए है। अन्ततः यह संपूर्ण वंश इस रीति से भ्रष्ट हो चुका है। यही चित्रण हमें यहाँ प्रगट किया गया है।
मैं इस बात को देखता हूँ, और मैं आप को बताना चाहता हूँ कि, बहुत से अच्छे-अच्छे और बड़े व्याख्याकार, इसके विपरीत, अपने विचार को प्रगट करते हैं, कि वास्तव में “परमेश्वर के पुत्र” स्वर्गदूत हैं। यदि आप इस विचार को स्वीकार करते है तो आपको एक अच्छी सहभागिता मिल जाएगी, परन्तु मुझे पूरा भरोसा है कि आप में से, कई लोग सही चुनाव करते हुए मेरे साथ चलना पसन्द करेंगे। हमारा विचार चाहे कुछ भी हो हमारी मित्रता बनी रहेगी। क्योंकि यह मात्र दृष्टिकोण और वचन को समझने और उसकी व्याख्या करने का अंतर है। इसके साथ कुछ करने की कोई आवश्यकता नहीं है, आप कुछ करें या नहीं, बस आप बाइबल पर विश्वास करते रहें और केवल, पवित्रशास्त्र की सच्चाई की व्याख्या पर, ध्यान दें।
क्या आप जानते हैं कि जलप्रलय से पहले पृथ्वी की क्या स्थिति थी? किस कारण से परमेश्वर को जलप्रलय के द्वारा मनुष्यों को नाश कर दण्ड देना पड़ा। आगे पद 5 में लिखा है।
उत्पत्ति 6:5 “और यहोवा ने देखा, कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है।”
मित्रों, यहाँ पर चार शब्द हैं, जिस पर ज़ोर देने की आवश्यकता है और जिसे मैंने अपनी बाइबल में चिन्हित कर लिया है। पहला है, “मनुष्यों की बुराई बढ़ गई थी।“ दूसरा, “उनके मन के विचार बुरे होते थे।“ तीसरा, “केवल बुरा ही उत्पन्न होता था।“ और चौथा है, वह बुराई “निरन्तर“ होती रहती थी। ये चार शब्द उस समय पृथ्वी पर रह रहे मानव परिवार की स्थिति को प्रकट करते हैं। तब आगे पद 6 में लिखा है।
उत्पत्ति 6:6 “ और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ।”
“और यहोवा पछताया”, किस बात के कारण परमेश्वर को पछतावा हुआ? मनुष्य की बुराई के कारण परमेश्वर को पछतावा हुआ। यहाँ पर ऐसे लगता है कि परमेश्वर ने अपना बदल लिया और मनुष्य को पृथ्वी पर से नाश करने का निर्णय लिया। संभवतः उसने इससे पहले कि सृष्टि के साथ भी ऐसा ही न्याय किया रहा होगा। यद्यपि मनुष्यों की बुराई और पापों ने परमेश्वर को खेदित किया। प्रभु का धन्यवाद हो कि उसने मनुष्य को नाश नहीं किया। तब आगे पद 7 में लिखा है।
उत्पत्ति 6:7 “तब यहोवा ने सोचा, कि मै मनुष्य को जिसकी मै ने सृष्टि की है पृथ्वी के ऊपर से मिटा दूँगा क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूँ।”
यहाँ पर सब जन्तुओं को नाश करने की बात कही गई है, लेकिन मछली या जलजन्तु के बारे में नहीं है, क्योंकि वे जल मंे रहते हैं। और वह उसमें और अधिक पानी भेजनेवाला है। तब पद 8 में लिखा है।
परमेश्वर का जलप्रलय के न्याय से छुटकारा दिलाना
उत्पत्ति 6:8 “परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही।”
नूह ने क्यों यहोवा परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त किया? आगे पद 9 में लिखा है।
उत्पत्ति 6:9 “नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरूष और अपने समय के लोगों में खरा था, और नूह परमेश्वर ही के साथ साथ चलता रहा।”
परमेश्वर ने नूह को क्यों बचाया? क्या वह परमेश्वर के साथ चलता रहा इसलिए? जी हाँ, इसलिए, लेकिन हमें इब्रानियांे 11:7 में बताया गया है कि, “विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, चेतावनी पाकर भक्ति के साथ अपने घराने के बचाव के लिये जहाज़ बनाया, और इसके द्वारा उसने संसार को दोषी ठहराया; और उस धर्म का वारिस हुआ जो विश्वास से होता है।“ यह विश्वास ही था जिसने नूह को सूखी भूमि पर पानी का जहाज़ बनाने के प्रेरित किया, जबकि बारिश तो क्या पानी की बूंद भी नहीं गिरी थी। इब्रानियों की पत्री के इसी 11 अध्याय में हमें बताया गया है कि विश्वास के द्वारा ही हनोक स्वर्ग में उठा लिया गया। मित्रों आप देख सकते हैं कि जब कलीसिया इस संसार से उठाई जाएगी तो केवल विश्वासी उठाए जाएंगे, क्योंकि ऊपर उठाया जाना केवल विश्वासियों के लिए ही ठहराया गया है। सब से कमजोर विश्वासी भी उठाया जाएगा। वे परमेश्वर के उस अनुग्रह के कारण से उठाए जाएंगे, और हमें बताया गया है कि परमेश्वर की दया उस समय प्रदर्शित की जाएगी।
परन्तु प्रश्न उठता है जलप्रलय ही क्यों? परमेश्वर जलप्रलय क्यों भेजने जा रहा था? आगे पद 11 और 12 में लिखा है।
उत्पत्ति 6:11 “उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी।“
उत्पत्ति 6:12 “और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना-अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।”
इसका अर्थ है कि मनुष्यों ने परमेश्वर द्वारा निर्धारित चाल-चलन बिगाड़ लिया था और अपने मन के अनुसार चल रहे थे। वे उस परमेश्वर के उस उद्देश्य से फिर गए थे जिसके लिए परमश्वर ने उसे बनाया था। तब पद 13 में आगे लिखा है।
उत्पत्ति 6:13 “तब परमेश्वर ने नूह से कहा, सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मै उनको पृथ्वी समेत नाश कर डालूँगा।”
परमेश्वर जलप्रलय भेजने वाला था, इस संदर्भ में मैं आप को कुछ कारण बताना चाहता हूँ।
मनुष्य को एक छुटकारा देनेवाले की प्रतिज्ञा दी गई थी और उन्हें बताया गया था कि एक उद्धारकर्त्ता संसार में आनेवाला है। मनुष्य को इसी बात की अपेक्षा करते रहना था, परन्तु इसके बदले, मनुष्य परमेश्वर से ही फिर गया, विमुख हो गया।
परमेश्वर ने आदम और हव्वा के लिए बलिदान का प्रबन्ध किया था और हम देखते हैं कि कैन और हाबिल के लिए एक महान अनन्त नियम स्थापित किया गया। ये दोनों भाई, कैन और हाबिल दो अलग-अलग प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। दो समूह के लोग, एक खोया हुआ और दूसरा बचाया हुआ। एक स्वधर्मी और दूसरा टूटा हुआ हृदय, एक औपचारिक ज्ञानवान शिक्षक और एक दूसरा सही विश्वासी। यही भाव उस समय मानवजाति के अन्दर उपस्थित था।
आगे हम पाते हैं कि हमारे पूर्वज बहुत लम्बे समय तक जीवित रहते थे कि आदम और मतूशेलह का जीवन सृष्टि से लेकर जलप्रलय तक के समय को भर देता हैं। वास्तव में जो कुछ उन्होंने किया, उसे वे पूरी मानवजाति को प्रकाशन के रूप में बता सकते थे। तब हमें यहूदा की पत्री 1:14-15 में बताया गया है कि उस समय-काल में हनोक ने प्रचार किया और भविष्यद्वाणी की। हमें यह भी बताया गया है कि नूह भी जहाज़ बनाते समय प्रचार करता रहा। जब हनोक लोप हो गया, या उठा लिया गया तब, लोग इस बात से सचेत हो गए होंगे कि परमेश्वर मनुष्यों के जीवन में हस्तक्षेप करता है। वे मतूशेलह के बारे में जानते थे और उसके नाम का अर्थ भी जानते थे, तथा जब उसकी मृत्यु हुई तो लोग जान गए होंगे कि जलप्रलय आनेवाला है। अन्त में हम पवित्र आत्मा की सेवकाई को भी पाते हैं। परमेश्वर यहोवा ने कहा था कि “मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लों विवाद करता न रहेगा।“ परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के साथ विवाद या संघर्ष कर रहा था, परन्तु जब मनुष्यों ने परमेश्वर को पूर्ण रीति से त्याग दिया, जब जलप्रलय का न्याय पृथ्वी पर आया।
संपूर्ण मानव जाति परमेश्वर से विमुख हो गई थी। रोमियों 3:10 में यही लिखा है, “… कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।“ कुछ थोड़े लोग थे जो परमेश्वर पर विश्वास करते थे, नूह और उसका परिवार। यहाँ पर एक व्यक्ति है जो परमेश्वर के साथ चला और उस पर विश्वास किया। यहाँ पर एक व्यक्ति है जो अब भी परमेश्वर पर भरोसा रखे हुए था, जैसा लिखा है, “सिर्फ विश्वास के द्वारा नूह ने।“ यहाँ पर एक व्यक्ति है जिसने सूखी भूमि में भी जहाज़ बनाने की चुनौती स्वीकार की। यदि बारिश नहीं होती तो निश्चित वह हँसी का पात्र बन जाता। वह 120 वर्षों तक ऐसे ही करता रहा, और परमेश्वर पर विश्वास बनाए रखा।
यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब प्रभु यीशु मसीह दोबारा आएंगे, विश्वासियों को लेने के लिए नहीं परन्तु पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करने के लिए तब पृथ्वी पर नूह के दिनों जैसी स्थिति ही होगी। पर कुछ ऐसी मिलती जुलती बाते हैं जो पहले ही हो चुकी हैं। जैसे, इस अध्याय का आरंभ, इस पद से होता है, “फिर जब मनुष्य भूमि के ऊपर बढ़ने लगे, और उनके बेटियाँ उत्पन्न हुई।“ उस समय ऐसा जन्संख्या विस्फोट हुआ कि मनुष्य पूरी पृथ्वी पर फैल गया। वह उत्तरी अमेरिका, एशिया, यूरोप आफ्रिका सभी जगह पर फैल गया। हर दिशा में वह फैल गया। आज भी ऐसा ही हो रहा है तथा पृथ्वी पर जन्संख्या वृद्धि होते जा रही है।
एक और बात है कि महाक्लेश के समय, पवित्र आत्मा बुराई को रोकने का काम नहीं करेगा। वह मनुष्यों को विश्वास में लाने का काम करता रहेगा परन्तु हमें बहुत ही स्पष्ट रूप से बताया गया है कि वह पाप और बुराई को रोकने का काम नहीं करेगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्यों को बचाने का प्रयास तुच्छ समझा जाएगा और उसे ठुकरा दिया जागा, और ऐसा आज भी हो रहा है। लोग परमेश्वर का वचन सुनना नहीं चाहते हैं। क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि संसार में आज केवल मुक्तविचार वाले पास्टरों और प्रचारकों की बात सुनी जाती है। लोग रूढ़ीवादी प्रचारकों को सुनना नहीं चाते हैं। उन्होंने कुछ हद तक प्रयार कर लोगों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया है परन्तु आज हम ऐसे समय में पहुंच चुके हैं, जब आप परमेश्वर और उसके वचन के लिए खड़े रहने का काम करेंगे, या उस पर बने रहेंगे तो आप को सामान्य सभा या प्रमुख प्रसार तंत्र में स्थान नहीं दिया जाएगा। आप का विरोध किया जाएगा। मसीह का विरोध करने और उसका इन्कार करने वालों को महत्व दिया जाएगा। यही स्थिति आज बनती जा रही है।
और अंततः उन दिनों में संसार विश्वासियों के बादलों पर उठा लिए जाने के कारण से समस्याओं में आ जाएगा और उसका सामना करता रहेगा। क्योंकि अचानक ही अद्भुत रीति से अनेक मनुष्य संसार के गायब हो चुके होंगे। नूह के दिनों में परमेश्वर का दण्ड आने वाला था पर फिर भी लोग परमेश्वर के वचन को सुनना और मानना नहीं चाहते थे।
मित्रों आज आप के चारों ओर क्या यही वातावरण नहीं देखा जा रहा है। किस प्रकार परमेश्वर के वचन के प्रति लोगों के अंदर रोश और नफरत देखी जा रही है। परमेश्वर आज भी धैर्य के साथ लोगों को अवसर दे रहा है। आइए हम उस परमेश्वर को धन्यवादे दें और उसके वचन के अनुसार चलते रहें। आइए प्रार्थना के साथ समाप्त करें।
अध्ययन मार्गदर्शिका
जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ
सीखने के नोट्स
उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि
लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।
उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।
उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।
मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।
उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।
रूपरेखा
I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)
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A. सृष्टि, अध्याय 1-2
- स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
- पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
- पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
- a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
- b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
- c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
- d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
- e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
- f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
- g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
- h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
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B. पतन, अध्याय 3-4
- पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
- पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
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C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
- आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
- जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
- जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
- जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
- जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
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D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
- जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
- बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
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रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
- उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
- उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
- उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
- उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
- उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)
II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)
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A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23
(परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)
- अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
- अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
- पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
- परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
- साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
- परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
- परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
- दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
- अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
- इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
- परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
- सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
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B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26
(एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)
- अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
- अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
- परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
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C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
- याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
- याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
- याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
- याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
- याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
- याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
- याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
- याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
- याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
- एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
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D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
- याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
- यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
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मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
- पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
- यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
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मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
- यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
- याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
- याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
- यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
- यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
- याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
- याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
- याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
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याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
- याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
- कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50
