उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 5:21 - 6:3
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 5:21 – 6:3
कार्यक्रम : #0022

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प्रभु में प्रिय मित्रों प्रेम भरा नमस्कार, आज के इस बाइबल अध्ययन कार्यक्रम में आपका स्वागत है, जैसे कि आपको मालूम है कि हम इन दिनों उत्पत्ति की पुस्तक से अध्ययन कर रहे हैं, और पिछले अध्ययन में हमने उत्पत्ति 5 अध्याय के पद 5 तक देखा था। जिसमें हमने आदम की वंशावली को येरेद तक देखा था कि वे सभी अपने समय में मृत्यु को प्राप्त करते है। आदम के वंश में शेत, एनोश, केनान, महललेल, और येरेद। अब हम आते हैं उत्पत्ति 5 अध्याय के पद 21 पर।

हनोक की रोमांचक कहानी।

मित्रों आज हम हनोक की रोमांचक कहानी से आरंभ करेंगे। पद 20 में हमने पढ़ा था कि, येरेद की कुल आयु नौ सौ बासठ वर्ष की हुई, इससे पहले कि वह मरा, येरेद का एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम हनोक था। उत्पत्ति 5:21 में लिखा है।

उत्पत्ति 5:21 “जब हनोक पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उससे मतूशेलह का जन्म हुआ।“

पर क्या इसमें लिखा है, और तब हनोक मर गया? नहीं! वह मरा नहीं। यह एक अलग प्रकार का अध्याय है जिसमें हमें एक रौशनी या ज्योति देखने को मिलती है। आइए हम पढ़ते हैं उत्पत्ति अध्याय 5 का पद 22 से 24, लिखा है।

उत्पत्ति 5:22 “मतूशेलह के जन्म के पश्चात् हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्वर के साथ साथ चलता रहा, और उसके और भी बेटे बेटियाँ उत्पन्न हुईं।“

उत्पत्ति 5:23 “इस प्रकार हनोक की कुल आयु तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई।“

उत्पत्ति 5:24 “हनोक परमेश्वर के साथ साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया।“

यहाँ पर एक बहुत ही ध्यान देने योग्य बात है, कि पृथ्वी पर मृत्यु के होते हुए भी, एक व्यक्ति बिना मृत्यु के ही संसार से उठा लिया गया। हनोक के बारे में कहा जाता है कि वह “परमेश्वर के साथ-साथ चलता था।“ यह भी एक महत्त्वपूर्ण बात है। बाइबल में केवल दो व्यक्तियों के बारे में कहा गया है कि वे परमेश्वर के साथ चलते रहे। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि नूह के विषय में लिखा हुआ है कि वह भी परमेश्वर के साथ चलता रहा। यही दो पुराने व्यक्ति हैं, जो परमेश्वर के साथ चलते बताए गए है। हम पुराने नियम की पुस्तकों में दो व्यक्तियों के बारे में पाते हैं, जो नहीं मरे। उसमें से पहला हनोक और दूसरा एलिय्याह है।

हनोक ही एक ऐसा व्यक्ति है जो जलप्रलय के पहले के कुछ लोगों में से एक है जिसका हमें कुछ वर्णन मिलता है, अन्यथा दूसरे किसी का नहीं। हमें बताया गया कि हनोक मरा नहीं परन्तु उठा लिया गया अर्थात उसका स्थानान्तरण हो गया। आप स्थानान्तरण से क्या समझते हैं? स्थानान्तरण का अर्थ है जैसे अनुवाद करना, अर्थात किसी भाषा के एक शब्द को लेकर दूसरी भाषा के शब्द में, अर्थ को बिना बदले अनुवाद करना है। हनोक भी इस पृथ्वी से उठा लिया गया और दूसरे स्थान पर रख दिया गया अर्थात उसका स्थानान्तरण हो गया। वह एक भिन्न व्यक्ति हो गया, यद्यपि वह हमारे जैसा ही था। जिस प्रकार हम एक शब्द को लेकर दूसरी भाषा के शब्द में बिना अर्थ बदले रखते हैं ठीक उसी प्रकार हनोक के साथ भी हुआ। हनोक स्वर्ग में उठा लिया गया।

हमने हनोक के बारे में पढ़ा था कि वह 65 साल तक जीवित रहा और उसने मतूशेलह को जन्म दिया और उसके बाद भी वह परमेश्वर के साथ चलता रहा। मैं उसके 65 साल के पहले के जीवन के बारे में नहीं जानता कि वह कैसा था। मैं ऐसा सोचता हूँ कि वह भी अन्य लोगों की तरह ही रहा होगा। यह एक ऐसा समय था जब लोग बहुत ही असावधानी या स्वछंद विचार से जीवन जीते थे, पर अब हम नूह के कार्य क्षेत्र के दिनों की ओर बढ़ रहे हैं। परन्तु जब मतूशेलह का जन्म हुआ तो हनोक के चाल में परिवर्तन आ गया। इस छोटे बालक ने उसे परमेश्वर की ओर मोड़ दिया।

प्रिय मित्रों, कई बार परमेश्वर परिवार में बच्चे इसलिए देता है कि वह आपको अपनी ओर फेर सके। यदि बच्चे आपको प्रभु के पास नहीं ला पाए तो और कोई चीज़ आपको परमेश्वर के निकट नहीं ला सकती है। हनोक परमेश्वर की ओर फिरने के बाद भी तीन सौ साल परमेश्वर के साथ चलता रहा। और उसके और भी बेटे बेटियाँ उत्पन्न हुए। लिखा है “और हनोक की कुल अवस्था तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई।“ इन्हीं वर्षों में वह पृथ्वी पर था परन्तु वह मरा नहीं। बाइबल हमें यह नहीं बताती है कि “और हनोक मर गया“ परन्तु वह कहती है, “और हनोक परमेश्वर के साथ चलता था; और वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया।“
मित्रों, इसे समझाने के लिए मेरे पास एक ही रास्ता है, जिसके द्वारा मैं आपको इसका विश्लेषण दे सकता हूँ और वह है एक छोटी लड़की कहानी, जिसने सण्डे स्कूल से लौटने के बाद अपनी माँ को हनोक के लोप होने के बारे में बताया या विश्लेषण दिया, जो इस प्रकार है, वह बोली, “आज हमारे सण्डे स्कूल टीचर ने हमें हनोक के बारे में बताया कि वह कैसे परमेश्वर के साथ चला।“ उसकी माँ ने कहा, “अच्छी बात है, लेकिन हनोक का क्या हुआ?“ तब उस छोटी लड़की ने कुछ इस प्रकार कहा, “ऐसा लगता है कि प्रतिदिन परमेश्वर हनोक के पास आता था और कहता था, हनोक, क्या तुम मेरे साथ टहलने के लिए चल सकते हो? और हनोक घर से बाहर निकलकर गेट से बाहर जाता और परमेश्वर के साथ टहलता था। वह उन स्थानों में जाता था जहाँ वह आनन्दित होता था, इसलिए वह अपने दरवाज़े के पास प्रतिदिन परमेश्वर के आने के इन्तज़ार में रहता था। परमेश्वर उसके पास आकर कहता “चलो टहलने के लिए चलें।“ एक दिन परमेश्वर उसके पास आया और कहा, “चलो आज हम एक लम्बी दूरी तक टहलने के लिए चलें।“ मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है, और वे दोनों टहलते-टहलते बहुत दूर चले गए, अन्त में हनोक को कहना पड़ा कि बहुत देर हो गई है और अब शाम भी हो चुकी है, इसलिए अब मुझे घर जाना चाहिए। तब परमेश्वर ने उससे कहा, “हनोक तुम मेरे घर के बहुत पास में हो और तुम्हारा घर अभी बहुत दूर में है, इसलिए तुम मेरे साथ मेरे घर चलो, और इस प्रकार से हनोक परमेश्वर के घर में गया।“ मित्रों, मैं नहीं जानता, कि आप इस घटना को इससे और अच्छी तरह कैसे रख सकते हैं। क्योंकि इस कहानी की यही वास्तविकता है।
मैं सोचता हूँ कि उत्पत्ति की पुस्तक की सभी महान सच्चाईयाँ उपयुक्त या संबंधित हैं। मेरे विचार के अनुसार हमें एक तस्वीर दी गई है जो होनेवाली है, और वह है कलीसिया का उठा लिया जाना। यहाँ पर ऐसा ही कुछ हुआ है, कि जलप्रलय के न्याय के पहले ही हनोक को परमेश्वर ने उठा लिया।

हनोक और नूह की वंशावली

आइए हम पढ़ें पद 27, लिखा है।

उत्पत्ति 5:27 “इस प्रकार मतूशेलह की कुल आयु नौ सौ उनहत्तर वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया।“

मतूशेलह आदम से अधिक वर्षों तक जीवित रहा। आदम और मतूशेलह ही दो ऐसे व्यक्ति हैं जो सृष्टि और जलप्रलय के बीच के खाली स्थान भरते हैं। दी गई वंशावली के अनुसार मतूशेलह, नूह को संसार की सृष्टि के बारे में सब कुछ बता सकता था। मुझे व्यक्तिगत रीति से ऐसा लगता है कि, जो वंशावली, हमें दी गई है उसमें कुछ खालीपन है। क्योंकि हम जानते हैं कि नये नियम के आरंभ में प्रभु यीशु मसीह की वंशावली दी गई है उसमें कुछ नाम छोड़ दिए गए हैं, और यह सब जानकर किया गया है, क्योंकि यहाँ पर वंशावली को तीन बराबर भागों में दर्शाने का प्रयत्न किया गया है। कुछ विशेष नाम छोड़ दिए गए हैं फिर भी आप देखेंगे कि इसकी निरन्तरता ठीक बनी हुई है। मुझे पूरा भरोसा है कि यह वंशावली सटीक है, परन्तु एक महत्त्वपूर्ण बात है कि, हमारे पास यहाँ एक अन्तर हो सकता है, जो इस सत्यता को प्रकट करता कि मनुष्य इस पृथ्वी पर, हमारे विचार से कहीं अधिक समय से उपस्थित था अर्थात जितना हमने सोचा है उससे भी अधिक समय से वह पृथ्वी पर था। मैं इस विषय पर अधिक गहराई में जाना नहीं चाहता हूँ क्योंकि यह एक जटिल विषय है। और पवित्रशास्त्र हमें इसके बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं बताता है। परन्तु यहाँ यह क्यों नहीं दिया गया है? क्योंकि परमेश्वर उसे बताने में रूचि नहीं रखता है। जो बातें वह हममें बताने और समझाने की कोशिष कर रहा है, वह है धार्मिकता, पाप से छुटकारा और पृथ्वी पर मनुष्यों का इतिहास।

मतूशेलह के नाम का अर्थ होता है “आगे भेजना“। कुछ लोग ऐसा विश्वास करते हैं कि मतूशेलह का अर्थ है, “जब वह मर जाएगा, तब इसे भेजा जाएगा।“ लेकिन क्या भेजा जाएगा? जलप्रलय! जब तक मतूशेलह जीवित था, जलप्रलय पृथ्वी पर नहीं आया। एक बहुत रोचक बात है, कि ऐतिहासिक पूर्वजों की वंशावली के अनुसार जिस साल मतूशेलह की मृत्यु हुई, ठीक उसी साल जलप्रलय भी आया। “जब वह मर जाएगा, तब इसे भेजा जाएगा।“ यही मतूशेलह के नाम का अर्थ मतलब है।

अब यह प्रश्न उठता है कि मतशेलह दूसरे लोगों से अधिक समय तक क्यों जीवित रहा? परमेश्वर ने उसे इसलिए रखा कि मानवजाति जान सके कि परमेश्वर दयालु और धीरजवन्त है। मेरे मित्र, परमेश्वर आपका भी, आपके पूरे जीवन भर इन्तज़ार करेंगे। पतरस, हमारे परमेश्वर के धीरज के विषय में 1 पतरस 3:20 में कहता हैं, “जिन्होंने उस बीते समय में आज्ञा न मानी, जब परमेश्वर नूह के दिनों में धीरज धरकर ठहरा रहा, और वह जहाज़ बन रहा था, जिसमें बैठकर थोड़े लोग अर्थात् आठ प्राणी पानी के द्वारा बच गए।“

जब हम इस अध्याय में आगे बढ़ते हैं, तो हम, प्रत्येक मनुष्य और उसकी मृत्यु के विषय में पाते हैं। आइए हम को पढ़ें, उत्पत्ति 5 का 31 और 32 पद, लिखा है।

उत्पत्ति 5:31 “इस प्रकार लेमेक की कुल आयु सात सौ सतहत्तर वर्ष की हुई; तत्पश्चात् वह मर गया।“

उत्पत्ति 5:32 “और नूह पाँच सौ वर्ष का हुआ; और नूह से शेम, और हाम, और येपेत का जन्म हुआ।“

मित्रों, संसार में, एक प्रचलित सिद्धान्त है, जिसे मनुष्यों के द्वारा बिना सोचे समझे स्वीकार कर लिया गया है, और मैं सोचता हूँ कि यह सभी तत्व ज्ञान या दर्शनशास्त्र, का नतीजा है, कि मनुष्य का स्वभाव जन्म से ही अच्छा होता है, तथा इसे और बेहतर बनाया जा सकता है। संपूर्ण कार्यक्रम जो आज चारों ओर है और यदि हम मनुष्यों के वातावरण और उसके आनुवंशिकता को सुधारने का प्रयास करेंगे, तो वह सुधर सकता है। साम्यवाद और समाजवाद मनुष्य में प्रगति सुधार लाना चाहता हैं। एक सिद्धान्त कहता है कि मनुष्य स्वयं अपना उद्धार पाने में सहयोग दे सकता है। आधुनिकतावाद का कहना है कि मनुष्य स्वयं से उद्धार पा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो उद्धार कुछ ऐसा काम के समान है जो परमेश्वर ने हमें स्वयं से प्राप्त करने के लिए दिया है। कुछ एक अनैतिक और गैरधार्मिक समूहों का कहना है कि मनुष्य पूर्ण रूप से अच्छा है इसलिए उसमें पाप नाम की चीज़ ही नहीं है।

क्या आप जानते हैं, कि मनुष्य के विषय में परमेश्वर क्या कहता है? परमेश्वर कहता है कि मनुष्य पूर्णरूप से दुष्ट और बुरा है। यही स्थिति हम सबकी है। क्योंकि पौलुस प्रेरित रोमियों 3:10 में लिखता हैं, “जैसा लिखा है, कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।“ यह हमारे लिए परमेश्वर के वचन का मापदण्ड है। इसलिए यदि आज, आप परमेश्वर के वचन को स्वीकार करते हैं, तो वह आज, आपको जीवन का सही अर्थ समझा देगा जैसा कोई और हमें नहीं दे सकता।

यही मानवजाति है और हम धार्मिक वंशावली का अनुसरण कर रहे हैं। लेकिन यह हमें कहाँ लेकर जा रही है? क्या यह हमें इस पृथ्वी पर ही एक सत्युग या प्रभु यीशु मसीह के हजार वर्ष के राज में ले जा रही है? क्या वे आनन्द-धाम से आकर एक आदर्श राज्य की स्थापना इस पृथ्वी पर करेंगे? जी नहीं। क्योंकि अगला अध्याय छः हमें प्रगट करता है कि परमेश्वर के न्याय और दण्ड के रूप में जलप्रलए इस पृथ्वी पर आया।

इसके साथी ही अध्याय 5 समाप्त होता है, और अब हम अध्याय 6 से अपना अध्ययन जारी रखेंगे, जिसका विषय है।

अध्याय 6
विषय: जलप्रलय का कारण, जलप्रलय के न्याय से परमेश्वर द्वारा बचाया जाना, जहाज बनाने के लिए नूह को निर्देश तथा जहाज में यात्रा करने वाले यात्री।

जलप्रलय का कारण

अध्याय छः में सिर्फ जलप्रलय ही नहीं बल्कि, जलप्रलय के न्याय के कारणों को भी देखते हैं।
आइए हम आगे पढ़ें उत्पत्ति अध्याय 6 का पद 1 और 2, लिखा है।

उत्पत्ति 6:1 “फिर जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढ़ने लगे, और उनके बेटियाँ उत्पन्न हुईं।“

उत्पत्ति 6:2 “तब परमेश्वर के पुत्रों ने मनुष्य की पुत्रियों को देखा, कि वे सुन्दर हैं, और उन्होंने जिस जिसको चाहा उनसे विवाह कर लिया।“

मित्रों, “परमेश्वर के पुत्रों“ और “मनुष्य की पुत्रियों“ यह एक ऐसा विषय रहा है, जिसके विवाद का कोई अन्त नहीं है। फिर भी बहुत से अच्छे और ज्ञानी लोग हैं, जो कहते हैं कि “परमेश्वर के पुत्र“ स्वर्गदूत थे। लेकिन मैं, व्यक्तिगत रीति से, इसे कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता। कई शिक्षकों ने यह पढ़ाया भी है कि “परमेश्वर के पुत्र“ स्वर्गदूत थे। और मैं इस बात को मानता हूँ कि आज भी बहुत से व्याख्याकर्त्ता उन्हें स्वर्गदूत ही मानते हैं। लेकिन मैं उनके इस विचार से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि यदि ये अच्छे स्वर्गदूत होते तो, यह पाप कभी नहीं करते। तथा दूसरी तरफ, दुष्ट या बुरे स्वर्गदूत कभी भी “परमेश्वर के पुत्र“ नहीं कहलाते है या वचन में कहे जाते। उनसे जो सन्तानें उत्पन्न हुईं वे राक्षस नहीं थे, परन्तु मनुष्य ही थे। मैं, नहीं जानता परन्तु बहुत लोगों के द्वारा ऐसा क्यों, सोचा और माना जाता है कि उनकी सन्तानें विशाल थी। मित्रों, इस विषय में आगे हम, और अधिक गहराई से पद 4 में देखेंगे।

आइए हम इस समय पढ़ें, उत्पत्ति 6 का 3, लिखा है।

उत्पत्ति 6:3 “तब यहोवा ने कहा, “मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लों विवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है; उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।”

हम वचन के आधार पर विश्वास करते हैं कि नूह करीब 120 वर्षों तब प्रचार करता रहा, और उस समय में परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से वाद-विवाद करता रहा। पतरस इस बात को और स्पष्ट करते हुए 1 पतरस 3:18-19 में कहता हैं कि नूह के दिनों में परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों के साथ संघर्ष करता रहा, वह उनके साथ परिश्रम करता रहा ताकि वह मनुष्य को परमेश्वर के पास फेर लाए। परन्तु वे, परमेश्वर की ओर, नहीं फिरे। 1 पतरस 3:18-19 “इसलिये कि मसीह ने भी, अर्थात अधर्मियों के लिये धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए; वह शरीर के भाव से तो घात किया गया, पर आत्मा के भाव से जिलाया गया। उसी में उसने जाकर कैदी आत्माओं को भी प्रचार किया।“ जब पतरस ने यह लिखा, तब ये आत्माएँ कैद में थीं, लेकिन नूह के समय में उन्हें प्रचार किया गया था। हम यह कैसे जानते हैं कि उन्हें प्रचार किया गया था? इसका प्रमाण हमें, 1 पतरस 3:20 पद में मिलता हैं, “जिन्होंने उस बीते समय में आज्ञा न मानी, जब परमेश्वर नूह के दिनों में धीरज धरकर ठहरा रहा, और वह जहाज़ बन रहा था, जिसमें बैठकर थोड़े लोग अर्थात् आठ प्राणी पानी के द्वारा बच गए।“ अब सवाल उठता है कि कब उन्होंने आज्ञा नहीं मानी? नूह के समय, उन 120 वर्षों में उन्होंने परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानी थी। जबकि परमेश्वर ने, धीरज के साथ, उनके वापस लौटकर आने के लिए, 120 वर्षो तक इन्तज़ार किया और इन्हीं वर्षों में, नूह ने जहाज़ बनाने का काम किया।

मित्रों हमारा परमेश्वर ऐसा ही धीरजवंत और कृपालु है, वह आप का अंत समय तक इन्तजार करता है, आप की राह देखते रहता है। पर इसके बाद भी यदि आप अपना मन नहीं फिराते हैं, उसके पास नहीं आते हैं तो वह आप को दण्ड देने से पीछे नहीं हटता। परमेश्वर का दण्ड भी उसके प्रेम को प्रगट करता है। आइए मित्रों हम उस उस समय तक का इन्तजान नहीं करें। आज हि अपने गुनाहों से तौबा कर परमेश्वर और उसके वचन की ओर फिर जाए। आइए प्रार्थना के साथ अध्ययन को विराम दें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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