उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 3:7 - 3:24
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आप क्या सुनेंगे

डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 3:7 – 3:24
कार्यक्रम : #0019

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जय मसीह की दोस्तों और सभी को प्रेम भरा नमस्कार तथा आप के अपने सत्यवचन बाइबल अध्ययन में स्वागत है। आइए हम अपने अध्ययन में आगे बढ़ते हुए पढ़ते हैं उत्पत्ति अध्याय 3 का पद 7, लिखा है।

उत्पत्ति 3:7 “तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये।“

कहता है, “तब उन दोनों की आँखें खुल गईं“ – यह उनके विवेक के संदर्भ में कहा गया है। पाप में गिरने के पहले, मनुष्य में विवेक नहीं था, वह अबोध और निष्कलंक था। निष्कलंकता का अर्थ है पाप या दुष्टता के प्रति अज्ञानता। मनुष्य ने अपना विवेक नहीं बनाया है। विवेक हमारे अंदर, हम पर दोष लगाने वाला कारक है, जो हमें पाप का बोध करता है। दक्षिण कैलीफोरनिया यूनिवर्सिटी के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थे जो मसीही थे, उसने कहा, कि मनुष्य के अंदर दोषी होने का भाव उसके हाथ के समान मनुष्य के जावन का एक भाग है। मनुष्य कभी भी मनोवैज्ञानिक तरीके से, पाप के बोध से बच नहीं सकता।

तब जैसा लिखा है, “उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये।“ क्या आप ने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि वहाँ केवल अंजीर के पेड़ का उल्लेख किया गया है, किसी अन्य पेड़ का नहीं? (ध्यान रखें मित्रों, भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष, सेब का पेड़ नहीं था। मैं नहीं जानता कि वह कैसा था, पर यह निश्चित है कि वह सेब का पेड़ नहीं था।) अंजीर के पत्ते उन्हें छिपा तो रहे थे, लेकिन पूरी तरह ढक नहीं पा रहे थे। आदम और हव्वा ने अपने पाप का अंगिकार नहीं किया; उन्होंने बस उसे छुपाने का प्रयास किया। वे अपनी खोई हुई पापी दशा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

आज धर्म के मामले में भी मनुष्य की यही दिशा है। वह रीति-रिवाज़ और अनुष्ठान का पालन करता है, आराधनाओं में शामिल होता है, और बहुत धार्मिक बन जाता है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि प्रभु यीशु मसीह ने अंजीर के पेड़ को श्राप दिया था? यह बहुत रोचक बात है। और इसके तुरंत बाद उन्होंने धर्म की निंदा भी की; उन्होंने हृदय की गहराई से इसकी निंदा की, क्योंकि धर्म केवल पाप को ढकने का काम करता है उसका हल नहीं निकालता।

इस परिक्षा के दौरान, शैतान मनुष्य के प्राण और परमेश्वर के बीच आने का प्रयास कर रहा था। दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर करना चाहता था, उसे अपने वश में करना चाहता था और स्वयं मनुष्य का ईश्वर बनना चाहता था। वैसे भी, उस समय मनुष्य को शारीरिक प्रलोभन आकर्षित नहीं करते थे। उसे चोरी करने, झूठ बोलने या लालच करने का कोई प्रलोभन नहीं था। उसे केवल परमेश्वर पर संदेह करने का प्रलोभन था। उस धनी युवा शासक की समस्या क्या थी? उसने परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया। गेहूँ और जंगली बीज के पौधों के दृष्टान्त में क्या समस्या थी? जंगली पौधे वे है जिन्होंने परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया। आप यहाँ पर शैतान के तरीकों पर ध्यान दें मित्रों। सब से पहले, हव्वा ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा था। दूसरा, वह आँखों में देखने में मनभावन था। और तीसरा, वह बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य था। शैतान बाहर से अंदर की तरफ काम करता है, हमारे बाहर से हमारे अंदर की तरफ।

दूसरी तरफ आप पाते हैं कि, परमेश्वर मनुष्य के अंदर से उसके हृदय से काम करना आरंभ करता है। धर्म मानो बाहर से अपने जीवन को रगड़ने जैसा है, लेकिन परमेश्वर धर्म से आरंभ नहीं करता, परन्तु परमेश्वर धर्म से आरंभ नहीं करता है। क्या मैं इन दोनों के बीच एक लकीर खींच कर अंतर प्रगट कर सकता हूँ: मसीहत कोई धर्म नहीं है, मसीहत मसीह में होना है। आज संसार में बहुत से धर्म है, परन्तु प्रभु यीशु सीधे उसके उद्गम स्थान में चला जाता है जब वह कहता है – “तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना आवश्यक है।“

प्रभु यीशु मसीह ने फरीसियों से कहा, जो बाहर से बहुत धार्मिक प्रतीत होते थे, “कटोरे को अन्दर से साफ रखो, तुम तो एक चूना फिरी हुई कब्र हो, जो बाहर से चिकनी और फूलों से भरी है। परन्तु अन्दर में मनुष्यों की हड्डियों से भरी पड़ी है।“ यह एक अद्भुत चित्र है! आदम और हव्वा अपने पापों का अंगिकार करने के स्थान पर, अंजीर के पत्तों को सी कर अपने आप को ढ़ांकने का प्रयास कर रहे थे। मैं आज आप से कहना चाहता हूँ मित्रों, आज लोग नए प्रकार के अंजीर के पत्तों का उपयोग किया जा रहा है। आज लोग अपने हृदय के पापों को मानने की अपेक्षा, चर्च में आराधना के लिए जा रहे हैं, धार्मिक रीति-विधिया पूरी कर रहे हैं और भले काम कर रहे हैं। तब आइए आगे बढ़ते हुए हम पढ़ते हैं पद 8 और 9 को, लिखा है।

उत्पत्ति 3:8 “तब यहोवा परमेश्वर, जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था, का शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए।“
उत्पत्ति 3:9 “तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, “तू कहाँ है?”

धर्म आप को परमेश्वर से अलग कर देगा – आदम के साथ भी ऐसा ही हुआ, कि वह पाप में खो गया। आदम परमेश्वर से अलग हो गया, और यही वह बात है कि, परमेश्वर उसे ढूँढता है, मनुष्य परमेश्वर को नहीं ढूँढ़ रहा है। तब आगे पद 10 से 12 में लिखा है।

उत्पत्ति 3:10 “उसने कहा, “मैं तेरा शब्द बारी में सुनकर डर गया, क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया।”
उत्पत्ति 3:11 “उसने कहा, “किसने तुझे बताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे मना किया था, क्या तू ने उसका फल खाया है?”
उत्पत्ति 3:12 “आदम ने कहा, “जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।”
ध्यान दीजिए दोस्तों, आदम ने अपनी गलतियों को स्विकार नहीं किया। महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि उसने इसके लिए स्त्री को दोषी ठहराया दिया, जैसा कि हम आम बोलचाल की भाषा में कह सकते हैं, “उसने जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी“, लेकिन उसकी तरफ से पापों का पश्चाताप या स्वीकृति नहीं आती है। तब पद 13 में लिखा है।

उत्पत्ति 3:13 “तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, “तू ने यह क्या किया है?” स्त्री ने कहा, “सर्प ने मुझे बहका दिया, तब मैं ने खाया।”
यहाँ तथाकथित, “जिम्मेदारी दूसरों पर डाल देने“ का एक और उदाहरण देखने को मिलता है। अगला विषय है:
भविष्य के लिए परमेश्वर की योजना

यह पुरूष, जिसे परमेश्वर ने रचा था, अब परमेश्वर से विमुख हो जाता है, और आवश्यक है कि परमेश्वर ही उससे निपटे और उसका न्याय करें। तब आगे पद 14 में कहता है।

उत्पत्ति 3:14 “तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, “तू ने जो यह किया है इसलिये तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा।“

आज हम जिस रेंगने वाले जीव की कल्पना करते हैं, सर्प निश्चित रूप से आदि काल में वैसा नहीं था। वह आरंभ में अलग था, और अब परमेश्वर उस पर दंड की घोषणा करता है। परमेश्वर शैतान पर ऐसा दंड की घोषणा करता है, जिसका गहरा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप निम्नलिखित पद को याद कर लें, क्योंकि यह वह वचन है जिसे आपको अवश्य याद रखना चाहिए। यह वचन हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीहा, के संसार में आने की पहली भविष्यवाणी है। जैसा पद 15 में लिखा है।

उत्पत्ति 3:15 “और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।”

कहता है, “और मैं तेरे (अर्थात शैतान) और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके (अर्थात प्रभु यीशु मसीह) वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण पद है जो हमें दिया गया है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कथन है जो हमें यहाँ दिया गया है। यहाँ सबसे प्रमुख विचार आने वाले समय में अंतिम विजय नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाला संघर्ष है। यह पद इस तथ्य को प्रकट करता है कि अब अच्छाई और बुराई के बीच एक लंबा संघर्ष होने जा रहा है। यही बात आपको पवित्रशास्त्र बाइबल के अन्य भागों में भी पढ़ने को मिलेगी। प्रभु यीशु ने अपने समय में इस संघर्ष के विषय में यह कथन कहा था, जो हमें यूहन्ना 8:44 में पढ़ने को मिलता है, “तुम अपने पिता शैतान से हो और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो आरंभ से हत्यारा है और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उसमें है ही नहीं जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है वरन् झूठ का पिता है।“ वह दुष्ट शैतान है। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने परमेश्वर की सन्तानों और शैतान की सन्तानों के बीच अन्तर व्यक्त किया था। यूहन्ना इसी द्वंद्व को 1 यूहन्ना 3:10 में पुनः व्यक्त करता है, “इसी से परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान जाने जाते हैं; जो कोई धर्म के काम नहीं करता वह परमेश्वर से नहीं, और न वह जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता।“ मित्रों, यहाँ पर हमारे सामने टकराव की वास्तविकता को लाया गया है, और यहाँ युद्ध है, यहाँ संघर्ष है और यहाँ इस संसार में दो वंश हैं। अन्तिम विजय होगी, लेकिन एक लम्बे संघर्ष को ध्यान मंे रखना महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति को परीक्षा का सामना करना होगा और अपनी लड़ाई जीतनी होगी। पृथ्वी पर यीशु मसीह के आने से पूर्व, हमें विजय, विश्वास में आज्ञाकारिता से प्राप्त होती थी। परन्तु अब प्रभु यीशु मसीह के पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में आने के बाद, हमें विश्वास के द्वारा प्रभु यीशु मसीह के साथ अपनी पहचान बनानी है। मित्रों, उद्धार या मोक्ष पाना या बचाये जाने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है मसीह यीशु में बने रहना उस में पाया जाना।

सृष्टि की रचना की तीन श्रेणियों में एक मनुष्य था: स्वर्गदूत, मनुष्य और प्राणी जगत। पशुओं को चुनाव का कोई विकल्प नहीं दिया गया था, परन्तु स्वर्गदूतों और मनुष्यों को चुनाव का विकल्प दिया गया था। यहाँ आप मनुष्य का विकल्प देख सकते हैं। उसने एक निर्णय लिया है, और वह अपने इस निर्णय के लिए उत्तरदायी है।

ध्यान दें मित्रों कहता है, “इस स्त्री के वंश“। यह नहीं कहता है पुरूष के वंश के बीच। यहाँ पर मसीह के कुँवारी से जन्म लेने की बात और भविष्यद्वाणी की गई है। जब परमेश्वर अदन की वाटिका में मनुष्य को खोजने के लिए गया, तब उसने आदम से कहा, “तू कहाँ है?“ धर्म का कोई भी संकलन या कोई भी धर्म यही कहानी सिखाता या बताता है कि मनुष्य परमेश्वर की खोज करता है। परन्तु मेरे मित्रों, परमेश्वर ऐसा नहीं करता है। ध्यान से सुनिए, उद्धार या पापों की क्षमा, का मतलब है, परमेश्वर द्वारा मनुष्य की खोज। मनुष्य परमेश्वर से दूर भाग गया था, और परमेश्वर उसे पुकार कर कहता है, “तू कहाँ है?“ परमेश्वर के एक महान दास, डॉ. डब्लू. एच. ग्रीफिथ, उत्पत्ति पर लिखी अपनी एक पुस्तक, में कहते हैं, “परमेश्वर की यह पुकार, अलौकिक न्याय की पुकार है, जो पाप को नज़र अंदाज नहीं कर सकती। यह अलौकिक वेदना की पुकार है, जो एक पापी के लिए निकलती है। यह अलौकिक प्रेम की पुकार है, जो पाप से छुटकारे का अवसर प्रदान करती है।“ हमारे सामने इस एक पद में ये सारी बातें दी हुई है, जो एक उद्धारकर्ता के आने की प्रतिज्ञा है।

संपूर्ण पवित्रशास्त्र बाइबल में परमेश्वर द्वारा मनुष्य की खोज को ही चित्रित किया गया है। रोमियों की पत्री 3:11 में पौलुस इसी बात को लिखते हुए कहता है, “…….. कोई परमेश्वर का खोजने वाला नहीं।“ यूहन्ना 15:16 में हमारे प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, “तुम ने मुझे नहीं चुना परन्तु मैं ने तुम्हें चुना है।“ तथा हम सब 1 यूहन्ना 4:19 के समान यूहन्ना के साथ कह सकते हैं, “हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहले उसने हम से प्रेम किया।“ परमेश्वर मनुष्य को खोजता है, और उसे उद्धार या मोक्ष प्रदान करता है या उसका अवसर देता है, परन्तु इसके साथ एक लम्बा संघर्ष चलने वाला है। तब आगे पद 16 में कहता है।

उत्पत्ति 3:16 “फिर स्त्री से उसने कहा, “मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।”

यह दण्ड स्त्री के ऊपर था कि इस पृथ्वी वह बिना कष्ट के सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकती। क्या आज भी यह एक रोचक सत्य नहीं है? जो बात मानव जीवन में आनन्द और खुशी लेकर आती, और मानव परिवार को आगे बढ़ाती है, वह दुःख तथा क्लेश के द्वारा ही आती है। तब आगे पद 17 से 19 में लिखा है।
उत्पत्ति 3:17 “और आदम से उसने कहा, “तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तू ने खाया है इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुरूख के साथ खाया करेगा।“
उत्पत्ति 3:18 “और वह तेरे लिये काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा।“
उत्पत्ति 3:19 “और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है; तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।”
यह दण्ड पुरूष के लिए था। अब मनुष्य पर मौत का साया आ जाता है। मृत्यु क्या है दोस्तों? शारीरिक मृत्यु का अर्थ होता है, एक मनुष्य के शरीर से उसकी आत्मा और उसके प्राण का अलग होना। सभोपदेशक 12:7 में लिखा हुआ है, “तब मिट्टी ज्यों की त्यों मिट्टी में मिल जाएगी, और आत्मा परमेश्वर के पास जिस ने उसे दिया लौट जाएगी।“ अंततः सभी मनुष्यों को एक दिन परमेश्वर को ही उत्तर देना होगा। चाहे वह उद्धार पाया हुआ या उद्धार बिना हो, उसे एक दिन परमेश्वर को उत्तर देना ही होगा। लेकिन आदम की शारीरिक मृत्यु उस दिन नहीं हुई जिस दिन उसने उस फल को खाया था। उसकी मृत्यु नौ सौ वर्षों से भी अधिक समय बाद हुई। संक्षेप में कहें तो: जिस क्षण उसने अज्ञा तोड़ा, उसी क्षण उसकी आत्मिक मृत्यु हो गई; वह परमेश्वर से अलग हो गया। मृत्यु अलगाव है। जब इफिसियों की कलीसिया को पौलुस लिखते हुए कहता है, “उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे“, उसके कहने का अर्थ यह नहीं था कि वे शारीरिक तौर पर मरे हुए थे, वे परमेश्वर से अलग थे। उड़ाऊ पुत्र के अद्भुत दृष्टान्त में, हमारा प्रभु यीशु मसीह उस पुत्र के बारे में बात करता है, जो अपने पिता के पास से भाग गया था। जब वह लौट कर आया तब पिता लूका 15:24 में, अपने बड़े बेटे से कहता है, “क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है: खो गया था, अब मिल गया है, ………।“ कहता है मर गया था। क्या वह मर गया था? जी हाँ, वह मर गया था, शारीरिक रूप से नहीं, पर वह अपने पिता से अलग हो गया था। अपने परमेश्वर पिता से अलग होने का अर्थ है मृतक दशा में होना। इसी प्रकार प्रभु यीशु मसीह ने यूहन्ना 11:25 में मार्था से कहा था, “……पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा।“ यहाँ पर भी, मृत्यु का अर्थ है आत्मिक मृत्यु, अर्थात परमेश्वर से अलगाव। मनुष्य ने जिस पल उस वर्जित फल को खाया, वह उसी समय अत्मिक मृत्यु प्राप्त कर चुका था। यही कारण है कि वह परमेश्वर से दूर भाग रहा था। इसी कारण उसने अपने आप को ढ़ांकने के लिए अंजीर के पत्तों से लंगोट बना लिया। अब आता है छुटकारे या पापों की क्षमा का सिद्धान्त। आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 3 को 20, लिखा है।

छुटकारे या पापों की क्षमा का सिद्धान्त

उत्पत्ति 3:20 “आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई।“

मित्रों इस का यह अर्थ नहीं निकलता कि कैन औश्र हाबिल का जन्म अदन की वाटिका में हुआ था, पर हमें यह बताया गया है कि आदम और हव्वा के पाप में गिरने के बाद उनका जन्म हुआ था। तब आगे पद 21 में लिखा है।

उत्पत्ति 3:21 “और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए।“

किसी भी जानवर से उसका चमड़ा प्राप्त करने के लिए हमें उस मारना होगा। मुझे लगता है यह बलिदान की उत्पत्ति है और परमेश्वर ने मनुष्य को यह स्पष्ट कर दिया था। परमेश्वर अंजीर के पत्तों के वस्त्रों को अस्वीकार कर उन्हें चमड़े के वस्त्र दिये, तथा जब आदम और हव्वा ने अदन की वाटिका को छोड़ा, तब पीछे मुड़कर उन्होंने एक रक्तरंजित बलिदान को देखा। जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो उन्हें ठीक वही दिखाई दिया जो परमेश्वर ने मूसा को पवित्र स्थान में दया-सिंहासन पर चढ़ाने को कहा था: दो करूब उस लहू को देख रहे थे जो वहाँ चढ़ाया गया था – और यही परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग था।

यहाँ अंजीर के पत्तों और इस सच्चाई से कि परमेश्वर ने उन्हें चमड़े के वस्त्र से ढ़ांका, हम चार महान शिक्षा प्राप्त करते हैं। (1) परमेश्वर तक पहुँचने के लिए मनुष्य के पास पर्याप्त आवरण या वस्त्र होने चाहिए। आप अपने भले कार्यों के आधार पर परमेश्वर के पास नहीं आ सकते। आप को एक पापी के रूप में ही परमेश्वर के पास आना होगा। (2) अंजीर के पत्ते आप के पापों को ढ़ांपने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, वह एक घरेलु उपाय है। परमेश्वर इस प्रकार के घरेलु उपाय ग्रहण नहीं करता है। (3) परमेश्वर ही हमें पापों को ढ़ांपने का वस्त्र प्रदान करता है। (4) हमारे लिए पापों को ढ़ांपने का वस्त्र केवल प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु के द्वारा से प्राप्त होते हैं।

एक मनुष्य को, परमेश्वर के क्रोध और स्वयं के बीच एक विकल्प चाहिए जो खड़ा हो सके। आज भी मनुष्यों के लिए विचार करने वाली बात है। इस संसार में एक इन्सान के लिए सबसे कठिन काम है, परमेश्वर के समक्ष अपना उचित स्थान ग्रहण करना।

उद्धार तब प्राप्त होता है, जब हम परमेश्वर के सामने एक पापी के रूप में अपना उचित स्थान ग्रहण करते हैं। तब आगे पद 22 और 23 में कहता है।

उत्पत्ति 3:22 “फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, “मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है: इसलिये अब ऐसा न हो कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़ के खा ले और सदा जीवित रहे।”
उत्पत्ति 3:23 “इसलिये यहोवा परमेश्वर ने उसको अदन की वाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिस में से वह बनाया गया था।“

इस पर मैं बस इतना कह सकता हूँ, परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसने मनुष्य को अनन्तकाल के लिए पापी दशा में रहने के लिए नहीं छोड़ा और न ही परमेश्वर ऐसा रहने देगा। यह हम मनुष्यों के लिए बड़ी आशीष है! तब अंतिम पद 24 में लिखा है।
उत्पत्ति 3:24 “इसलिये आदम को उसने निकाल दिया और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की वाटिका के पूर्व की ओर करूबों को, और चारों ओर घूमनेवाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्त कर दिया।“

इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने उस मार्ग को ही बंद कर दिया। इसका अर्थ यह है कि आज भी मनुष्यों के लिए परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग खुला रखा गया था। परन्तु अब वह मार्ग जीवन के वृक्ष से होकर नहीं जाता। उद्धार या पापों की क्षमा या मोक्ष, बलिदान के लहू के द्वारा ही प्राप्त होता है, और जब मनुष्य ने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे बलिदान का लहू ही दिखाई दिया।
ओह मित्रों! क्या इससे अच्छा और कोई सुसमाचार हमारे लिए हो सकता है? परमेश्वर ने मनुष्य को पापी दशा में नहीं छोड़ा, पर उसे फिर से अवसर देता है। हमारा परमेश्वर दोबारा अवसर देने वाला परमेश्वर है। आइए हम उसे धन्यवाद दें और प्रार्थना के साथ समाप्त करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

आज के पैसेज से आपने जो मुख्य बात सीखी, उसे लिखें।

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