उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 3:1 - 3:6
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 3:1 – 3:6
कार्यक्रम : #0018

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प्रिय दर्शकों आप सभी को जय मसीह की और एक बार पुनः आप का सत्यवचन के नए प्रसारण में स्वागत है। आइए हम अपने अध्ययन में आगे बढ़ते हैं और उत्पत्ति की पुस्तक के तीसरे अध्याय से आरंभ करते हैं।

अध्याय 3 का मुख्य विषय / शीर्षक है,

शीर्षक: सर्प का परमेश्वर के वचन को अस्वीकार करना, स्त्री और पुरुष का परमेश्वर के वचन का उल्लंघन करना, भविष्य के लिए परमेश्वर की योजना, छुटकारे के सिद्धान्त का परिचय, आदि।

मित्रों अब हम एक ऐसे भाग पर आते हैं जिसे कुछ लोग बाइबल का सब से महत्वपूर्ण भाग मानते हैं। मेरा विश्वास है कि सभी रूढ़ीवादी व्याख्याकर्त्ता इसे इसी दृष्टिकोण से देखते और स्वीकार भी करते हैं। बाइबल के व्यख्याकार डॉ. ग्रीफेथ थॉमस ने कहा था कि उत्पत्ति का अध्याय 3 बाइबल का केन्द्र बिन्दू है। अगर आप को इस बात पर कोई शंका है, तो आप उत्पत्ति के पहले दो अध्याय पढ़ें, तब तीसरे अध्याय को छोड़ कर अध्याय 4 से 11 तक पढ़ें। आप को एक ऐसा खालीपन अनुभव होगा जिसे भरे जाने की आवश्यकता आप को महसूस होगी। ऐसा जैसे कुछ छूट गया है। उदाहरण के लिए, उत्पत्ति अध्याय 1 और 2 में हम मनुष्य को उसकी अबोध या नादान स्थिति में पाते हैं। आप देखते हैं कि सब कुछ सिद्ध अवस्था में पाई जाती है, तथा परमेश्वर और मनुष्य के बीच हमें सहभागिता देखने को मिलती है। पर जैसे ही आप उत्पत्ति के चौथे अध्याय में आते हैं और उसे अध्याय 11 तक पढ़ते चले जाते हैं, तो आप को जलन, क्रोध, हत्या, झूठ, दुष्टता, भ्रष्टाचार, विद्रोह और न्याय तथा दण्ड देखने को मिलता है। अब यह प्रश्न उठता है कि वह सब कुछ कहाँ से प्रवेश किया? कहाँ से आरंभ हुआ? पाप का उद्गम कहाँ से हुआ। मेरा ऐसा मानना है कि पाप का उद्गम उत्पत्ति के अध्याय 3 में नहीं होता है, पर जहाँ तक मनुष्य के जीवन में पाप के प्रवेश करने का सवाल उठता है, तो वह यहीं से होता है।

मैं आप के लिए परमेश्वर के एक भक्त द्वारा अध्याय तीन पर उसके कथन को साझा करना चाहता हूँ: “जब हम पीछे जाकर उनके उद्गम को देखते हैं तो मानो हम ईश्वरीय सच्चाई की कई नदियों या बातों को पाते हैं। यहाँ पर एक महान नाटक का प्रारंभ होता है जो मानव इतिहास के रंग मंच पर खेला गया और अभी उसे छः हज़ार वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। यहाँ पर हम वर्तमान समय में पाप में गिरने और हमारे समय के लोगों के विनाश का ईश्वरीय स्पष्टीकरण पाते हैं। यहाँ पर हम हमारे शत्रु, शैतान की धूर्त चालाकी के विषय में जान पाते हैं। यहाँ पर हम मनुष्य की संपूर्ण धार्मिकता के पथ पर चलने की असमर्थता को देखते हैं, जब परमेश्वर का अनुग्रह उस पर से रोक दिया गया। यहाँ पर हम पाप के आत्मिक प्रभाव और परिणामों को देखते हैं, कि मनुष्य परमेश्वर से क्यों दूर भागना चाहता है। यहाँ पर हम पापी मनुष्यों के प्रति परमेश्वर के व्यवहार को देखते हैं। यहाँ पर हम मनुष्य के स्वाभाविक आदत पर ध्यान देते हैं। यहाँ पर हम मानव स्वभाव की सार्वभौमिक प्रवृत्ति को देखते हैं कि वह कैसे अपनी नैतिक शर्म को अपनी ही बनाई किसी युक्ति से ढ़ांकने का प्रयास करता है। यहाँ हमें उस अनुग्रहपूर्ण व्यवस्था के बारे में सिखाया जाता है जो परमेश्वर ने हमारी सब से बड़ी आवश्यकता को पूरा करने के लिए किया है। यहीं से भविष्यवाणी की वह अद्भुत धारा आरंभ होती है जो पवित्र शास्त्र में व्याप्त है। यहाँ हम सीखते हैं कि मनुष्य किसी मध्यस्थ के बिना परमेश्वर के पास पहुँचने में असमर्थ है।“ आइए हम पहले विषय को देखते हैं।
सर्प/शैतान परमेश्वर के वचन के प्रति संदेह का बादल उत्पन्न करता है।
पहले भाग में हम पाते हैं कि कैसे मनुष्य के लिए परिक्षा का जाल बिछाया जाता है। आइए हम पढ़ें उत्पत्ति अध्याय 3 का पद 1 लिखा है।

उत्पत्ति 3:1 “यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उस ने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?”

मित्रों, यहाँ पर अब एक प्रश्न उठता है, कि परीक्षा क्यों? यदि हम मुड़कर कुछ क्षण के लिए अध्याय 1 और 2 को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य को निर्दोष या अबोध बनाया था, परन्तु मनुष्य को धर्मी नहीं बनाया गया। अब प्रश्न उठता है, धार्मिकता क्या है? धार्मिकता वह निष्कपटता या निर्दोषता है जो परीक्षा के समय में भी बनी रहती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि परीक्षा या तो आप को उन्नत कर सकती है या फिर नष्ट कर सकती है, वह इन दोनों में से एक काम अवश्य करेगी। मित्रों, अदन की वाटिका कोई काँच का घर नहीं था और न ही मनुष्य काँच के घर में रखा गया कोई पौधा था। मनुष्य का चरित्र उन्नत किया जाना था और सिर्फ परीक्षा की उपस्थिति में यह संभव हो सकता है। मनुष्य एक ज़िम्मेदार व्यक्ति होने के लिए रचा गया है, तथा उसकी जिम्मेदारी परमेश्वर की महिमा करने, उसकी आज्ञा मानने, उसकी सेवा करने, और ईश्वरीय प्रशासन के अधीन रहने के लिए बनाया गया है।

मनुष्य ने स्वयं को नहीं रचा है, और मैं नहीं सोचता कि कोई ऐसा दावा कर सकता है, परन्तु परमेश्वर ने ही मनुष्य को रचा है। और परमेश्वर ने मनुष्यों के लिए जो शर्त रखी थी उसमें उसने कोई मनमानी नहीं किया था। परमेश्वर ने मनुष्य से उत्पत्ति 2:17 में कहा था, “पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” उस वाटिका में फल खाने के लिए केवल वही अकेला पेड़ नहीं था। अगर मनुष्य उस पेड़ का फल न खा कर भूख से मर जाता या फिर उससे यह कहा जाता कि अगर वह इसे खाएगा तो मर जाएगा, तो यह उस पर मनमानी होती। बगीचे में फल देने वाले पेड़ों की भरमार थी; इसलिए मनुष्य को उस पेड़ का फल खाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसलिए, हम पाते हैं कि मनुष्य एक ज़िम्मेदार प्राणी के रूप में सामने आता है।

पहले पद में हमारा परिचय उस सर्प अर्थात शैतान से कराया गया है। इस कारण, एक तत्काल हमारे मनों में यह स्वाभाविक प्रश्न आ सकता है, कि “संसार में वह कहाँ से आया? अदन की वाटिका में वह कैसे प्रवेश किया? मित्रों, जितना मैं परमेश्वर के वचन से समझ कर आप को बता सकता हूँ, सर्प उस स्थान में एक रेंगने वाले जीव के रूप में नहीं रख गा था। वास्तव में हमें यह नहीं बताया गया है कि वह, वहाँ कैसे आया, हमें बस यही बताया गया है कि वह वहाँ उपस्थित था। परमेश्वर के वचन में बहुत कुछ बातें प्रगट नहीं की गई हैं। सर्प एक ऐसा जीव था, जिसका उपयोग शैतान कर सकता था, और शैतान ने उसे उपयोग किया। क्या आज भी शैतान ऐसा नहीं करता है? पौलुस 2 कुरिन्थियों 11:14 में कहता है, “यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है।“ पवित्रशास्त्र की अन्य पुस्तकों की तुलना में प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में सबसे अधिक शैतान के बारे में लिखा गया है। प्रकाशितवाक्य 12:9 में लिखा हैं, “तब वह बड़ा अजगर, अर्थात् वही पुराना साँप जो इब्लीस और शैतान कहलाता है और सारे संसार को भरमाने-वाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया, और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए।“ यह प्राणी रेंगने वाला जीव नहीं था, जैसा कि आज हम विचारी करते हैं, तथा परमेश्वर का वचन हमें उसका ऐसा चित्रण नहीे देता है। प्रकाशितवाक्य 20:2 में लिखा हैं, “उस ने उस अजगर, अर्थात् पुराने साँप को, जो इब्लीस और शैतान है, पकड़ के हज़ार वर्ष के लिये बाँध दिया।“

इस प्राणी में अद्भुत योग्यता है। उत्पत्ति की पुस्तक में उसकी रचना या उद्गम का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। मेरा विश्वास है कि यशायाह की पुस्तक 14 अध्याय और यहेजकेल 28 अध्याय में हमंे इस प्राणी के उद्गम के बारे में बताया गया है और यह भी कि वह कैसे इस प्रकार का प्राणी बन गया। तब आगे पद 2 और 3 में लिखा है।

उत्पत्ति 3:2 “स्त्री ने सर्प से कहा, इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं।“
उत्पत्ति 3:3 “पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।”

अब प्रश्न उठता है कि, संसार में शैतान स्त्री के पास ही क्यों गया? वह पुरूष के पास क्यों नहीं गया? करण है कि, जब परमेश्वर ने आदम को रचा था, तब परमेश्वर ने उसे आज्ञा दिया था, वह वाटिका के वृक्ष के सभी फल खा सकता है परन्तु इस वृक्ष के फल को खाने के लिए मना किया था। स्त्री की रचना बाद में की गई थी, और उसे इस आज्ञा की जानकारी आदम से प्राप्त हुई थी। इस कारण सर्प सब से पहले स्त्री के पास गया। मेरा ऐसा मानना है मित्रों कि, स्त्री, पुरूष से उत्तम बनाई गई है, अर्थात उसके स्वभाव में करुणा और सहानुभूति, पुरूष से अधिक थी। संभवतः वह सुझाव देने और लेने के प्रति पुरुषों की तुलना में अधिक सक्षम थी। वास्तव में मेरा विचार है कि, स्त्री का स्वभाव पुरूष की तुलना में अधिक जिज्ञासु होता है। स्त्रियाँ, गलत शिक्षाओं, पंथों और धार्मिक बातों के समूह के प्रति अधिक जिज्ञासु और आकर्षित होती हैं। वास्तव में बहुत से मतों, पंथों और धार्मिक संस्थानों को स्त्रियों ने ही आरंभ किया है।
शैतान जानता था कि वह क्या कर रहा है। कृपया ध्यान दीजिए कि उसने क्या किया। जब वह आया तो उसके पास धूर्तता से तैयार की गई एक योजना थी। उसने स्त्री से ऐसा प्रश्न पूछा, जिसने परमेश्वर के वचन के प्रति सन्देह उत्पन्न कर दिया, क्या परमेश्वर ने कहा है, “कि तुम वाटिका के किसी भी वृक्ष का फल न खाना?“ उसने हव्वा के मन में सन्देह उत्पन्न किया और उसकी जिज्ञासा को उत्तेजित किया। हव्वा ने उत्तर दिया, “वाटिका के वृक्षों के फल तो हम खा सकते हैं, परन्तु इस वृक्ष के लिए परमेश्वर ने कहा है कि न तो उस में से खाना, और न उसे छूना, नहीं तो मर जाओगे। यहाँ पर स्त्री ने बढ़ा-चढ़ा कर बात कही। परमेश्वर ने सिर्फ कहा था, “इस वृक्ष के फल को न खाना,” परन्तु उसने उसमें “न छूना“ जोड़ दिया।

सर्प परमेश्वर के वचन का इन्कार करता है।

तब हम आगे पद 4 और 5 में पढ़ते हैं, लिखा है।
उत्पत्ति 3:4 “तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे।“
उत्पत्ति 3:5 “वरन परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखे खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।”

मित्रों, यहाँ पर हम देखते हैं कि “तुम नहीं मरोगे“ कहने के स्थान पर उसने प्रभावपूर्ण शब्दों में कहा कि “तुम निश्चय ही नहीं मरोगे। ऐसा क्यों, वह पूर्णतया असंभव है!“ उसने परमेश्वर के प्रेम और भलाई पर प्रश्न उठाते हुए कहा: “यदि परमेश्वर भला होता, तो यह पाबंदी वह क्यों लगाता?“ “तुम न मरोगे“, कह कर सर्प परमेश्वर की धार्मिकता पर प्रश्न उठाता है। तथा यह कह कर कि, “परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।” उसने परमेश्वर की पवित्रता पर सवाल उठाया।

हव्वा ने परमेश्वर के वचन में अपनी ओर से कुछ जोड़ने की गलती की। उदारवादी और नास्तिक लोग परमेश्वर के वचन से केवल कुछ बातें लेते हैं और कुछ छोड़ देते हैं, और परमेश्वर ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी है। अनेक पंथ और कुछ कट्टरपंथी लोग परमेश्वर के वचन में कुछ जोड़ देते हैं, और परमेश्वर ने इसके विरुद्ध भी चेतावनी दी है। कुछ लोग आज कहते हैं कि वे व्यवस्था के द्वारा बचाए गए हैं। वे वाद-विवाद करते हुए कहते हैं कि, “हाँ, विश्वास के द्वारा से हम उद्धार पाते हैं, पर उस विश्वास के साथ वे कुछ कर्म जोड़ देते है। वे किसी भी बात को उसके साथ जोड़ने के लिए तैयार रहते हैं। परमेश्वर का वचन यूहन्ना 6:26 में कहता है, यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “परमेश्वर का कार्य यह है कि तुम उस पर, जिसे उसने भेजा है, विश्वास करो।“ यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण है।

सर्प बड़ी चतुराई से परमेश्वर का विरोध करता है और अपने वचन को परमेश्वर के वचन से बदल देता है। रोमियों की पत्री हमें विश्वास की आज्ञाकारिता की सच्चाई सिखाती है। विश्वास हमें आज्ञाकारिता की ओर ले जाता है, और अविश्वास अनाज्ञाकारिता की ओर। संदेह भी हमेशा अनाज्ञाकारिता की ओर ही ले जाता है। तब आगे पर 6 का विषय है।

पुरूष और स्त्री दोनों परमेश्वर के वचन की अवज्ञा करते हैं।

उत्पत्ति 3:6 “अतः जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहनेयोग्य भी है; तब उसने उसमें से तोड़कर खाया, और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया।“

मित्रों, यहाँ पर ध्यान दीजिए कि शैतान ने जो निवेदन स्त्री से किया था बहुत ही रोचक है। यह अपील देह के लिए थी – “वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा था“ – परन्तु वह सब कुछ नहीं है, यह वह बात नहीं है जो वास्तव में महत्त्वपूर्ण है। “वह देखने में मनभाऊ था“, यह उसके देह से एक अपील तो थी ही पर साथ ही साथ, मनुष्य के मनोवैज्ञानिक भाग, उसके दिमाग से भी की गई एक अपील थी। तथा जब कहता है “बुद्धि देने के लिये चाहनेयोग्य भी है,“ तो यह मनुष्य के धार्मिक पक्ष से की गई एक अपील है।

मित्रों आप को याद होगा कि, शैतान ने, मत्ती 4, मरकुस 1 और लूका 4 अध्याय में प्रभु यीशु मसीह के सामने, जंगल में बिलकुल यही परिक्षा लाई थी। यब से पहले उसने प्रभु यीशु से कहा, “इन पत्थरों से कह दे कि ये रोटियाँ बन जाए“, यह उसकी देह से एक अपील थी, जैसे कि वह वृक्ष भोजन देने के लिए अच्छा था। तब शैतान ने प्रभु यीशु को संसार का वैभव दिखाकर उसे देने के लिए कहा – और यहाँ पर यह अपील उसके मन या मस्तिष्क के लिए थी, जिस प्रकार उस वृक्ष का फल आँखों के लिए लुभावना था। और अन्त में उसने कहा कि, “अपने आपको मन्दिर के कंगूरे से नीचे गिरा दे“ – यह निवेदन मनुष्य के आत्मिक भाग के लिए था, जिस प्रकार वृक्ष का फल बुद्धिमान बनाने के लिए चाहने योग्य था। मुझे नहीं लगता कि शैतान ने आज भी अपना तरीका बदला है। वह आज भी आप के और मेरे साथ उसी तकनीक का उपयोग करता है, क्योंकि वह आज भी कारागर है प्रभावशाली है। उसे अपनी तकनीक बदलने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम सभी उस में गिर जाते या फंस जाते हैं।

1 यूहन्ना 2:16 में यूहन्ना कहता है, “क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा और आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं परन्तु संसार ही की ओर से है।“ “शरीर की अभिलाषा“ का अर्थ है – उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा था। “आँखों की अभिलाषा“ का अर्थ है – उस वृक्ष का फल देखने में मनभाऊ था। और “जीविका का घमण्ड“, का अर्थ है – उस वृक्ष का फल बुद्धि देने के लिये चाहनेयोग्य भी है। ये बातें पिता की ओर से नहीं परन्तु संसार की ओर से है। यही वह स्थान है, जहाँ शैतान अपने निवेदन रखते हुए प्रहार करता है। यही वह पद्धति है जिसका वह उपयोग करता है ताकि मनुष्य तक पहुँच कर उसे परमेश्वर से दूर कर सके। और वह उसमें सफल भी हुआ। आदम और हव्वा को कहा गया था कि वे भले और बुरे का ज्ञान प्राप्त करेंगे। तब क्या हुआ? अब हमारे पास, मनुष्य के पाप में गिरने के परिणाम हैं।

मित्रों मनुष्य पाप की दशा में है, और उसे उससे बाहर निकलने के लिए किसी ऐसे मनुष्य की आवश्यकता है जो पापा से परे है, पाप से बाहर है, पाप पर जयवंत है, और जो पापों को क्षमा करने की सामर्थ्य रखता है। और पूरे संसार और ब्रम्हाण में केवल एक ही नाम है जो ऐसा करने की योग्यता रखता है, प्रभु यीशु मसीह। आइए हम उसे धन्यवाद दें और प्रार्थना करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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