उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 2:1-2:8
कार्यक्रम : #0016
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प्रिय दर्शक मित्रों आप सभी को जय मसीह की और प्रेम भरा नमस्कार। मैं एक बार पुनः आप का स्वागत करता हूँ मित्रों। आज हम उत्पत्ति की पुस्तक के दूसरे अध्याय पर मनन करने जा रहे हैं, जिसका शीर्षक है।
शीर्षक: सब्त का दिन, पाँच दिनों की सृष्टि का सारांश व पुनःस्थापना, मनुष्य की सृष्टि, मनुष्य के समक्ष नियम प्रस्तुत किया जाना और स्त्री की रचना।
मित्रों, इस अध्याय में पहली बार, हम प्रकाशन के महान सिद्धान्त को देखते हैं, परन्तु इसे हम परमेश्वर के वचन में बार-बार पाते हैं। यह प्रेरणा की अंगुली की छाप या चिन्हों में से एक है। यह व्यवस्था की पुनरावृति या व्यवस्था का सार है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का आत्मा हमें परमेश्वर का वचन प्रदान करते समय, महान तथ्यों और सच्चाईयों की एक श्रृंखला को संक्षेप में प्रस्तुत करता है; फिर वह पुनः उन तथ्यों और सच्चाईयों की श्रृंखला में से वह निकालता है जो सबसे महत्वपूर्ण है, और उस विशेष बात को स्पष्ट और विस्तृत करता है। इसी कार्य को वह अध्याय 2 में करने जा रहा हैं, उन छः दिनों की सृष्टि की रचना के साथ जिसे हमने अध्याय 1 में देखा था। यही सिद्धान्त व नियम हम व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में भी देखते हैं, व्यवस्थाविवरण की पुस्तक उस व्यवस्था की व्याख्या है जो 40 वर्षों तक निर्जन प्रदेश में रहने का अनुभव प्रगट करती है। व्यवस्थाविवरण दी गई व्यवस्था को मात्र दोहराना नहीं है, परन्तु यह उसकी एक स्पष्ट व्याख्या है। जिस प्रकार हमें एक नहीं परन्तु चार सुसमाचार दिए गए हैं। तथा बार-बार इस प्रक्रिया का अनुसरण परमेश्वर के वचन मंे किया गया है।
सब्त का दिन
अध्याय दो जिसमें हम उन छः दिनों की सृष्टि में से उस दिन को लेते हैं जिसमें मनुष्य की सृष्टि हुई। और हम सब्त के दिन से आरंभ करते हैं। आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 2:1-3
उत्पत्ति 2:1 “यों आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया।“
उत्पत्ति 2:2 “और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया, और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया।“
उत्पत्ति 2:3 “और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।“
मित्रों हम सब्त के दिन के, महत्त्व को नज़रअंदाज नहीं कर सकते। जब कहता है, परमेश्वर ले अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया, तो इसका क्या अर्थ निकलता है? क्या इसका मतलब यह हुआ कि परमेश्वर थक गया और सातवें दिन बैठकर विश्राम करने लगा, और उसने कहा कि मेरे लिए यह सप्ताह बहुत थकावट भरा रहा – उसने 40 घण्टे से भी अधिक काम किया और इसलिए वह विश्राम करना चाहता था? यदि आप इसे, इस रीति से देखते हैं तो यह पूर्ण रीति से मूर्खता है। जब परमेश्वर ने अपने छः दिन के कार्य को पूरा किया तब उसने देखा कि वह अच्छा है, और उसके पश्चात् कुछ और काम करने के लिए नहीं था। जब मैं प्रति दिन अपने दिन का काम समाप्त कर कार्यालय से घर जाता हूँ, तब भी मेरा कगले दिन का काम बचा रहता है। मैं कभी यह नहीं कह पाता हूँ कि मेरा पूरा काम समाप्त हो चुका है। परन्तु परमेश्वर के लिए यह कहना संभव था। छः दिनों के अंत में उस ने सातवें दिन विश्राम किया क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था। यह बहुत महत्वपूर्ण आत्मिक सच्चाई है। इब्रानियों की पुस्तक हमें बताती है कि हम, विश्वासी होने के नाते परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करेंगे अर्थत हम उसके सब्त में प्रवेश करेंगे जो हमारे छुटकारे की सिद्धता है। करीब दो हज़ार वर्षों पहले वह उस क्रूस पर मेरे और आप के लिए मारा गया, और इसके द्वारा वह हमें छुटकारा प्रदान करता है जिसमें हम प्रवेश कर सकते हैं। इस कारण रोमियों की पत्री के पॉवे अध्याय के पद एक में पौलुस लिखते हुए कहता है। रोमियों 5:1 “अतः जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।“ मुझे पापों की क्षमा प्राप्त करने के लिए अपनी छोटी उंगली को उठाने तक का परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है, प्रभु यीशु मसीह से उसे पूरा कर दिया है।
यही कारण है कि एक गीत की लेखिका कहती है, यीशु ने पूरा चुका दिया, मैं केवल उसका ऋणी हूँ। पाप ने तो एक लाल दाग छोड़ा था, उसने धोके हिम की नाई स्वेत कर दिया।
प्रथम पॉच दिनों की रचना का सारांष
संयोगवश मित्रों, जिस विशाल संसार में हम रहते हैं, वह करोड़ों-अरबों वर्षों से उपस्थित है, परन्तु इस पृथ्वी और पूरी सृष्टि पर ऐसा कुछ हुआ, जिसके परिणामस्वरूप परमेश्वर को इसमें आना पड़ा, और परमेश्वर का आत्मा गहरे जल के ऊपर मण्डराता था, और उस अव्यवस्था के मध्य ब्रम्हाण का निमार्ण किया गया। आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 2 का पद 4, लिखा है।
उत्पत्ति 2:4 “आकाश और पृथ्वी की उत्पत्ति का वृत्तान्त यह है कि जब वे उत्पन्न हुए अर्थात् जिस दिन यहोवा परमेश्वर ने पृथ्वी और आकाश को बनाया।“
वास्तव में “उत्पत्ति“ शब्द का अर्थ है परिवार। उत्पत्ति की पुस्तक न केवल आरंभ कि पुस्तक है पर वह परिवारों के आरंभ की पुस्तक भी है। हम इसे इा रीति से भी कह सकते हैं, “आकाश और पृथ्वी के परिवारों का वृत्तान्त यह है कि जब वे उत्पन्न हुए अर्थात् जिस दिन यहोवा परमेश्वर ने पृथ्वी और आकाश को बनाया।“ आगे पद 5 और 6 में लिखा है।
उत्पत्ति 2:5 “तब मैदान का कोई पौधा भूमि पर न था, और न मैदान का कोई छोटा पेड़ उगा था, क्योंकि यहोवा परमेश्वर ने पृथ्वी पर जल नहीं बरसाया था, और भूमि पर खेती करने के लिये मनुष्य भी नहीं था।“
उत्पत्ति 2:6 “तौभी कुहरा पृथ्वी से उठता था जिस से सारी भूमि सिंच जाती थी।“
मनुष्य के पृथ्वी पर आने के पहले ही यह सब कुछ पृथ्वी पर उपस्थित था और अब हम, इस संदर्भ में परमेश्वर के उद्देश्य को अध्याय एक में देख सकते है। प्रथम अध्याय में परमेश्वर मनुष्य के रहने के लिए एक घर तैयार कर रहा था जिसे वह सृजने जा रहा था। परमेश्वर अब उस मुनष्य को उस स्थान में रखने के लिए आगे बढ़ता है जिसे उसने सृजा है।
मनुष्य की सृष्टि
मित्रों, पहले अध्याय में हमने देखा था कि पृथ्वी पर कुछ भी नहीं था और उसके पश्चात् अजैविक वस्तुएं अस्तित्व आई। जैसा लिखा है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ तथा इस सृष्टि में सृजन का अगला कदम था जैविक या ऑर्गेनिक, अर्थात जीवन का निर्माण। हमने इसे उत्पत्ति 1:21 में देखा था, जहाँ परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं, और एक जाति के उड़ने वाले पक्षियों की भी सृष्टि की थी। परमेश्वर ने पशु जीवन की रचना की, लेकिन वनस्पति जीवन नष्ट नहीं हुआ था, और पुनःनिमार्ण के समय, पेड़-पौधों का बीज पहले से ही पृथ्वी में मौजूद था। यहाँ यही अर्थ प्रतीत होता है। परमेश्वर ने हमें इस संबंध में बहुत कम जानकारी दी है। फिर मनुष्य की सृष्टि अगला चरण था। वास्तव में कोई भी स्वाभाविक या प्राकृतिक परिवर्तन स्वयं से नहीं हुआ था, और न ही क्रमिक विकास का सिद्धान्त इस खाई को नहीं भर सकता है, जो पृथ्वी पर एक ही प्रकार के पशु पक्षियों की प्रजाति की उत्पत्ति लाते हैं। इसलिए पृथ्वी मनुष्य के आगमन के लिए तैयार की गई थी। तब आगे पद 7 में लिखा है।
उत्पत्ति 2:7 “तब यहोवा परमेश्वर ने आदम’ को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया।“
स्पष्ट तौर पर मनुष्य इसी रीति से रचा गया है, लेकिन फिर से हम अपनी सीमाओं में बान्धे गए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने हमें, मनुष्य की रचना के बारे में इतनी ही जानकारी दी है। भौतिक दृष्टिकोण से मनुष्य पृथ्वी की मिट्टी से बनाया गया है। और यह एक रोचक बात है कि मनुष्य का शरीर लगभग 15-16 प्रकार के रासायनिक तत्व से बना है। और वही रासायनिक तत्व पृथ्वी की मिट्टी में पाए भी जाते हैं, मनुष्य का देह भूमि की धूल या मिट्टी से बनी है। यदि हम मानव शरीर के रासायनिक तत्वों को अलग-अलग कर दे, तो उन रासायनिक तत्वों का मूल्य बाज़ार में बहुत कम होगा। शायद तीन सौ से पांच सौ रुपये मात्र। हमारे शरीर की कीमत इतनी ही है क्योंकि हम मिट्टी से बनाए गए हैं।
परन्तु मनुष्य मिट्टी से बढ़कर है। शारीरिक रीति से तो मनुष्य धूल या मिट्टी ही है और एक दिन वह धूल में ही मिल जाएगा। परन्तु उसका आत्मा परमेश्वर के पास लौट जाएगा। क्या आप जानते हैं क्यों? क्योंकि “परमेश्वर उसके नथनों में जीवन का श्वास फूँका; और आदम जीवित प्राणी बन गया।“ परमेश्वर ने मनुष्य के अन्दर “जीवन का श्वास फूँका“। परमेश्वर ने मनुष्य को शारीरिक या मनोविज्ञानिक जीवन दिया है, और इसके साथ ही उसने, उसे आत्मिक जीवन भी दिया है। दूसरे शब्दों में, इस प्रकार मनुष्य, आश्चर्यजनक रीति से परमेश्वर की संगति में लाया गया। अर्थात् अपने सृष्टिकर्त्ता की संगति में। मित्रों, मनुष्य के स्वभाव में परमेश्वर के प्रति एक लगाव है। और यही एक मुख्य बात है जो मनुष्य को संसार की अन्य सृष्टि या रचना से अलग करती है, जो हम बाइबल के आधार पर जानते हैं, यही सच्चाई है। यह सच है कि स्वर्गदूत भी हैं, लेकिन हम उनके बारे में अधिक नहीं जानते हैं।
आस्तिक विकासवादी मानते हैं कि मानवजाति इस स्तर तक विकसित हो चुकी थी, फिर परमेश्वर ने इस विकसित मानवजाति के साथ कार्य आरंभ किया। हालाँकि, विकासवाद का सिद्धांत किसी भी प्रकार से मानुष्य की वाणी, मानुष्य अंतःकरण और मानव व्यक्तित्व की व्याख्या नहीं कर पाता है। ये तीन बातें हैं जिनके साथ विकासवाद को कठिनाई होती है। किसी मनुष्य की हड्डियों को लेकर उनकी तुलना किसी मानवरूपी प्राणी, जैसे कि वानर, या घोड़े की हड्डियों से करना बहुत आसान है। मुझे यकीन है कि इनमें बहुत समानता होगी पर फिर भी उनमें व्यापक अंतर भी है। मेरा अनुमान है कि उनमें एक निश्चित समानता होगी क्योंकि इन प्राणियों को उसी वातावरण में रखा गया है जिसमें हम मनुष्यों को भी रखा गया हैं। स्वाभाविक रूप से, इनका ढांचा भी एक जैसा ही होना चाहिए। उदाहरण के लिए, दो अलग अलग कम्पनी द्वारा बनाई गई कारों के ढ़ांचें में हमें समानता देखने को मिलती है। परन्तु यदि आप उनकी विशेषताओं पर ध्यान करेंगे तो पाएंगे कि उनमें बहुत होता है। पर यदि आप उनके ढ़ांचें को देखेंगे तो सभी कारें एक समा नही दिखती है। जैसे चार चक्के, चेचिस, बोनट, इन्जन आदि। पर ऐसा क्यों? क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक ही है। इस कारण उन में समानता और अंतर दोनों होता है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि वे दोनों एक ही हैं। मुझे लगता है कि मनुष्य और इन अन्य प्राणियों के बीच जो समानता है उसे विकासवादियों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है। मनुष्य एक बिल्कुल अलग प्राणी है। परमेश्वर ने उसके श्वास लेने वाले स्थान में जीवन की श्वास फूँकी, और मनुष्य एक जीवित प्राणी बन गया। मनुष्य को भयानक और अद्भुत रूप से रचा गया है, और यह एक ऐसी बात है जिसे हमें ध्यान में रखना होगा। तब आगे पद 8 में लिखा है।
उत्पत्ति 2:8 “और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन में एक वाटिका लगाई, और वहाँ आदम को जिसे उसने रचा था, रख दिया।“
मैं आप को नहीं बता सकता कि अदन की वाटिका कहाँ है। निश्चित तौर पर वह हिद्देकेल या फरात घाटी में कहीं है, शायद वह पूरी घाटी भी हो सकती है। मूल रूप से आंरभ में, वह घाटी बहुत उपजाऊ क्षेत्र था, और आज भी है। यह एक “उपजाऊ अर्धचंद्राकार“ क्षेत्र का हिस्सा है। एक समय में, उस क्षेत्र में रहने वाले लोग वहाँ अनाज भी नहीं उगाते थे; वे बस उसे काटते थे, क्योंकि वह अपने आप उगता था। यह संभव है कि यह क्षेत्र किसी दिन फिर से पृथ्वी का केंद्र बन जाए।
दोस्तों तो आप ने देखा कि परमेश्वर ने मनुष्य को अन्य सभी प्राणियों से अलग बनाया है। मनुष्य में परमेश्वर प्रदत जीवन है। इसलिए हमारे अंदर परमेश्वर को जानने और उससे मिलने की एक इच्छा या ललक होती है। आइए हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर की ओर फिरें और उसके वचनों पर चलते रहें। आइए प्रार्थना के साथ अध्ययन समाप्त करें।
अध्ययन मार्गदर्शिका
जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ
सीखने के नोट्स
उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि
लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।
उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।
उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।
मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।
उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।
रूपरेखा
I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)
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A. सृष्टि, अध्याय 1-2
- स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
- पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
- पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
- a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
- b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
- c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
- d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
- e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
- f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
- g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
- h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
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B. पतन, अध्याय 3-4
- पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
- पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
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C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
- आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
- जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
- जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
- जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
- जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
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D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
- जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
- बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
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रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
- उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
- उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
- उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
- उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
- उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)
II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)
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A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23
(परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)
- अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
- अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
- पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
- परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
- साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
- परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
- परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
- दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
- अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
- इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
- परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
- सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
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B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26
(एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)
- अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
- अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
- परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
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C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
- याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
- याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
- याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
- याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
- याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
- याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
- याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
- याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
- याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
- एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
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D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
- याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
- यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
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मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
- पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
- यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
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मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
- यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
- याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
- याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
- यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
- यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
- याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
- याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
- याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
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याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
- याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
- कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50
