उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 2:9-2:25
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 2:9-2:25
कार्यक्रम : #0017

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 प्रिय मित्रों आप सभी को प्रभु यीशु मसीह के पवित्र नाम में प्रेम भरा नमस्कार, तथा एक बार पुनः आप का स्वागत है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह अध्ययन आप के लिए भी बहुत रोचक होते जा रहा है, क्योंकि हम अपने जीवन नी उत्पत्ति और उद्देश्य को जानते हुए आगे बढ़ रहे हैं। हम ने पिछले प्रसारण में उत्पत्ति के दूसरे अध्याय के पद 8 तक मनन किया था आइए अब हम दूसरे अध्याय के पद 9 से आरंभ करते हैं, लिखा है।

उत्पत्ति 2:9 “और यहोवा परमेश्वर ने भूमि से सब भाँति के वृक्ष, जो देखने में मनोहर और जिनके फल खाने में अच्छे हैं, उगाए, और वाटिका के बीच में जीवन के वृक्ष को और भले या बुरे के ज्ञान के वृक्ष को भी लगाया।“

मित्रों यहाँ पर हमें, दो असाधारण वृक्षों के बारे में विशेष तौर पर बताया गया है। एक है “जीवन का वृक्ष” और दूसरा है, “भले-बुरे के ज्ञान का वृक्ष“। मैं इन वृक्षों के बारे में भी अधिक नहीं बता सकता क्योंकि आज हमारे संसार में पाए में नहीं जाते हैं। उन्हें संसार से हटा दिया गया है।

परमेश्वर ने प्रत्येक पेड़ को बढ़ने के लिए बनाया, और जिस पेड़ पर आप ध्यान देने जा रहे हैं, वह दिखने में आकर्षक और उसका फल खाने में स्वादिष्ट था। उनमें सुन्दरता और व्यवहारिकता दोनों का समावेश था। संभवतः आप उसकी तुलना किसी लकड़ी के फर्नीचर की दुकान में रखे सामान से भी कर सकते, जिसके लिए दुकानदार कहता, इस सामान की लकड़ी बहुत सुन्दर और उपयोगी है। अदन की वाटिका में वे पेड़ अत्यंत महत्वपूर्ण थे, वहाँ पर कुछ सुन्दर पेड़ थे लेकिन वो उपयोगी भी थे। वास्तव में वे बहुत ही व्यावहारिक थे वे खाने के लिए भी अच्छे थे। मित्रों, इस पृथ्वी पर जिसमें हम रहते हैं, आज भी हम ऐसी चीज़ों को देखते हैं जिनमें सुन्दरता है। जबकि मनुष्य के पाप में गिरने के बाद पृथ्वी श्रापित हो गई है। सच्चाई यह है कि पृथ्वी आज काँटे और ऊँटकटार उत्पन्न करती है, इसके बावजूद आज भी उसमें सुन्दरता है। आज भी आप यदि अपने देश के विभिन्न दर्शनीय स्थलों को देखें तो आप को वहां से वापस आने की इच्छा नहीं होगी। परमेश्वर ने इस पृथ्वी को बहुत सुन्दर बनाया है। दक्षिण क्षेत्र में नारियल और केले के पेड़ों की खबसूरती आप को मंत्रमुग्ध कर देती है। एक बार उन पेड़ो के बीच मैंने एक छोटे से आराधनालय को देखा जिसकी सुन्दरता देखते ही बनती थी। उसकी सुन्दरता के कारण मैंने अपने समुह के लोगों से निवेदन किया कि कम से कम हम वहाँ रूक कर प्रार्थना कर के आगे चलें। अब आप अनुमान लगा सकते हैं मित्रों कि अदन की वाटिका कितनी सुन्दर रही होगी। तब आगे पद 10 से 14 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:10 “उस वाटिका को सींचने के लिये एक महानदी अदन से निकली और वहाँ से आगे बहकर चार धाराओं में बँट गई।“

उत्पत्ति 2:11 “पहली धारा का नाम पीशोन है; यह वही है जो हवीला नाम के सारे देश को जहाँ सोना मिलता है, घेरे हुए है।“

उत्पत्ति 2:12 “उस देश का सोना चोखा होता है; वहाँ मोती और सुलैमानी पत्थर भी मिलते हैं।“

उत्पत्ति 2:13 “दूसरी नदी का नाम गीहोन है; यह वही है जो कूश के सारे देश को घेरे हुए है।“

उत्पत्ति 2:14 “और तीसरी नदी का नाम हिद्देकेल है; यह वही है जो अश्शूर के पूर्व की ओर बहती है। और चौथी नदी का नाम फरात है।“

हो सकता है कि इथियोपिया में जिस नदी का जिक्र किया गया है वह नील नदी हो और हिद्दकेल टाईग्रीस हो नदी हासे सकती है। तब पद 15 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:15 “तब यहोवा परमेश्वर ने आदम’ को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे।“

इस मनुष्य आदम को अधिकार दिया गया तथा प्रकृती की शक्तियाँ उसका कहना माना करती थी। तब आगे पद 16 और 17 में लिखा है।

मनुष्य के लिए निर्धारित शर्ते और परिस्थितियाँ

उत्पत्ति 2:16 “और यहोवा परमेश्वर ने आदम’ को यह आज्ञा दी, “तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है।“

उत्पत्ति 2:17 “पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।”

मनुष्य के लिए परमेश्वर की आरंभिक योजना में मृत्यु शामिल नहीं थी, परन्तु अब मनुष्य परिक्षण की अवधी में रखा गया है। आप देख सकते हैं कि मनुष्य के पास आज स्वतंत्र इच्छा है, तथा अवसर हमें सदा जिम्मेदारियाँ प्रदान करता है। यह एक स्वयंसिद्ध कथन है और सत्य भी है। इस मनुष्य को जिसे स्वतंत्र इच्छा दी गई है उसे परिक्षण से भी गुजरना पड़ेगा कि वह परमेश्वर की आज्ञा मानता है कि नहीं।

कुछ बाइबल व्यख्याकारों का मानना है कि भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल ज़ारीला था। परन्तु इसके विपरीत मेरा विचार है कि वह वाटिका सब से उत्तम फल रहा होगा।

जैसा लिखा है, “जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” स्मरण रखें कि मनुष्य भी त्रिएक है, और उसकी मृत्यु भी त्रिएक है या तीन प्रकार से होगी। शारीरिक तौर से आदम की मृत्यु 930 वर्षों तक नहीं हुई। परन्तु परमेश्वर ने कहा था कि “जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” मृत्यु का अर्थ है अलगाव, और आदम परमेश्वर से आत्मिक रूप से उसी दिन अलग हो गया था, जिस दिन उसने वह फल खाया था, आप इस बात में निश्चित हो सकते हैं। तब आगे पद 18 में कहता है।

उत्पत्ति 2:18 “फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, “आदम’ का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए।”

मनुष्य को अदन की वाटिका में कुछ समय तक अकेले रखने के पीछे परमेश्वर की योजना थी। परमेश्वर उसे अनुभव कराना चाहता था कि उसकी कुछ आवश्यकता है, और उसे एक जीवन साथी की आवश्यकता भी है। तब आगे पद 19 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:19 “और यहोवा परमेश्वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भाँति के पक्षियों को रचकर आदम के पास ले आया कि देखे कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया।“

यकीन मानिए, आदम को सभी पशु-पक्षियों के नाम रखने के लिए बहुत समझदार होना था। किसी ने ऐसा कहा है कि जब परमेश्वर ने आदम के पास एक हाथी लाया और पूछा, “इसका क्या नाम होना चाहिए?“ तो आदम ने कहा, “यह तो किसी भी चीज़ से अधिक एक हाथी जैसा दिखता है।“ और शायद वह ऐसा ही था! आगे पद 20 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:20 “अतः आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पक्षियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिये कोई ऐसा सहायक न मिला जो उस से मेल खा सके।“

लिखा है “आदम के लिए योग्य सहायक”, यहाँ पर सहायक शब्द का उपयोग अनुचित अनुवाद है। सहायक शब्द का अर्थ होता है, जो बात को समझकर स्वीकार करता है, उसका उत्तर देता है, सहायक के रूप में उसका पूरक, उसका आधा हिस्सा। इसलिए कहा जाता है कि जब तक मनुष्य विवाह नहीं कर लेता, वह अधूरा या आधा रहता है, और यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। मैं यहाँ पर विवाह को बढ़ावा देने की बात नहीं कर रहा हूँ, परन्तु फिर भी मैं यह कहूँगा कि स्त्री और पुरुष दोनों के लिए परमेश्वर की इच्छा यही है कि यथा संभव वे विवाह करें। स्त्री पुरुष के प्रति उत्तरदायी है।

स्त्री की रचना

आइए हम पढ़ें उत्पत्ति दूसरे अध्याय का पद 21 और 22, लिखा है।

उत्पत्ति 2:21 “तब यहोवा परमेश्वर ने आदम’ को भारी नींद में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उसने उसकी एक पसली निकालकर उसकी जगह मांस भर दिया।“

 

उत्पत्ति 2:22 “और यहोवा परमेश्वर ने उस पसली को जो उसने आदम’ में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया।“

स्त्री को आदम में से उसकी पसली में से निकाला गया है। परमेश्वर के एक दास जो बाइबल के व्याख्याकार हैं, कहते हैं, परमेश्वर ने स्त्री को आदम के सिर से नहीं निकाला कि वह उससे श्रेष्ठ हो जाए, न ही उसके पैरों से निकाला कि वह उससे निम्न समझी जाए। परन्तु परमेश्वर ने उसे आदम की पसली में से निकाला कि वह उसके बराबर और उसके साथ रहे। यही विवाह का उद्देश्य है कि स्त्री पुरूष का आधा भाग है। इस कारण जब परमेश्वर कहता है कि, “पत्नियों, अपने अपने पति के अधीन रहो।“ उसके कहने का तात्पर्य है कि पत्नी, पति को उत्तर देने, और प्रत्युत्तर देने में तत्पर रहे। एक पुरूष बिना स्त्री के केवल अधूरा है।

यकीन मानिए मित्रों, हव्वा बहुत सुन्दर थी। प्रत्येक स्त्री अपनी आदि माता हव्वा की सुन्दरता धारण किए रहती है। ऐसी कोई सुन्दरता नहीं थी, जो हव्वा में नहीं थी। वह एक किसी गुड़िया के समान पूर्णरूप से सुन्दर थी और वह आदम का आधा भाग थी। तब आगे पद 23 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:23 “तब आदम’ ने कहा, “अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है; इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।”

इब्रानी भाषा में नारी के लिए जिस शब्द का उपयोग किया गया है वह नर से मिलता जुलता है। इब्रानी में नर को ईश कहा जाता है और नारी को ईशाह। स्त्री पुरूष का दूसरा आधा भाग है और वह उसके प्रति जवाबदेह है। परमेश्वर ने पुरूष को अगेवाई करने के लिए चुना है, इसलिए उसे पहले बनाया और उसके बाद उसने स्त्री को बनाया। पुरूष अगुवाई करने वाला है और स्त्री उसके पीछे उसके साथ चलने वाली है, परमेश्वर ने उन्हें ऐसा ही बनाया है यहाँ तक की शारीरिक तौर पर भी। 

आप मुझसे, यह न कहें, कि एक पत्नी को अपने पति से प्रेम करना चाहिए। परमेश्वर ने ऐसा नहीं कहा है। परमेश्वर ने कहा है कि स्त्री को पुरुष को प्रति उत्तरदायी होना चाहिए, अर्थात् सहयोग करना है। परन्तु यदि पति उससे कहता है कि “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।” तो वह भी उससे प्रत्युत्तर में यही कहेगी कि “मैं तुमसे प्रेम करती हूँ।” आज बहुत से पति कहते हैं कि मेरी पत्नी अच्छी नहीं है, लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि यदि आप एक अच्छे पति हैं तो निष्चय ही आप की पत्नी आपको सहयोग देगी। क्योंकि पति घर का स्वामी है और उसे परिवार का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई है। तब आगे पद 24 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:24 “इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे।“

दूसरे शब्दों में, एक प्रकार से अब पति अपनी पत्नी के अधीनता में आ जाता है, क्योंकि वह उसके प्रति जिम्मेदार है, और वह अब अपने माता-पिता के नियंत्रण में नहीं रहा। तब आगे पद 25 में लिखा है।

उत्पत्ति 2:25 “आदम और उसकी पत्नी दोनों नंगे थे, पर लजाते न थे।“

यद्यपि पवित्र शास्त्र ऐसा नहीं कहता है, पद मेरा विश्वास है कि वे किसी अलौकिक ज्योति से आभूषित रहे होंगे। मैं आप से कहना चाहता हूँ, मेरा अनुमान है कि यह स्त्री और पुरुष की रचना का सबसे प्यारा और अनमोल वृत्तांत है। यहाँ एक ऐसा जोड़ा है जिसे परमेश्वर ने ही एक साथ जोड़ा था। परमेश्वर ने अपने लोगों को कुछ ऐसी बातें दी हैं जिनका उन्हें पालन करना चाहिए, और परमेश्वर ने ही मानव जाति को विवाह संबंध का उपहार दिया है। विवाह ही उन बंधनों में से एक है जिसे आधुनिक पुरुष और स्त्री तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं: भजन संहिता 2:3 में लिखा है, आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें, और उनकी रस्सियों को अपने ऊपर से उतार फेकें।” मनुष्य आप क्या करने का प्रशस कर रहा है? वह परमेश्वर से दूर होने का प्रयास कर रहा है क्योंकि परमेश्वर ही ने विवाह को स्थापित किया है।

स्त्री की रचना अप्रत्यक्ष रचना थी, क्योंकि परमेश्वर ने उसे पुरुष से उत्पन्न करके यह प्रकट किया कि वह पुरुष का ही एक अंश है। पुरुष के लिए स्त्री की रचना की कहानी सबसे सुंदर कहानियों में से एक है।

इस अध्याय के विषय अत्यंत अद्भुत है: जैसे मनुष्य की रचना, उसे जहाँ रखा गया, उसका व्यवसाय या पेशा, वह परिस्थिति जिसमें जिस में जिम्मेदारी के साथ है, उसके लिए एक साथी की आवश्यकता और परमेश्वर द्वारा स्त्री की रचना। पति और पत्नी के बीच एक पहचान की आवश्यकता है, तब परमेश्वर कहता है, “पतियों अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो।“ यह है सृष्टि की रचना की कहानी।

जमर्नी की जेल में एक पादरी था, जो नाज़ी सरदारों को आध्यात्मिक शिक्षा देता था, वह अपना अनुभव लिखते हुए कहता है कि, उसने एक व्यक्ति का अन्तिम साक्षात्कार किया, जो उन चंद लोगों में से एक था, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास नहीं किया। पादरी आगे कहता है, “उसने करीब रात 8:30 बजे उस व्यक्ति के साथ वार्तालाप का एक लम्बा समय व्यतित किया, जिस दौरान उस व्यक्ति ने सृष्टि की रचना की कहानी को खेल बताया, परमेश्वर के वचन बाइबल का पवित्र आत्मा के द्वारा लिखे जाने का मज़का बनाया तथा साथ ही मसीही विश्वास की आधारभूत बातों को पूरी रीति से इन्कार किया।“ और इस वार्तालाप के करीब दो घण्टों से भी कम समय में उस ने आत्महत्या कर लिया। मित्रों आज आत्महत्या के बढ़ती हुई संख्या से बचने का एक मात्र तरीका है कि हम लोगों को यह जानकारी प्रदान करें कि वे परमेश्वर की रचना है जो अपने सृष्टिकर्ता के प्रति उत्तरदायी हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है।

मित्रों हमनें दूसरे अध्याय में हमने परमेश्वर के साथ मनुष्य का सम्बन्ध, परमेश्वर की आराधना, परमेश्वर के साथ मनुष्य की संगति, परमेश्वर की सेवा, परमेश्वर के प्रति मनुष्य की निष्ठा, परमेश्वर से मनुष्य का अधिकार, और परमेश्वर से और परमेश्वर के लिए मनुष्य का सामाजिक जीवन देखा है। यही इस अध्याय का महान संदेश है। आइए दोस्तों हम परमेश्वर को इस संबंध और उसकी योजना के लिए धन्यवाद दें जो उसने हमारे साथ बनाए रखा है। आइए प्रार्थना करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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