उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक
आप क्या सुनेंगे
डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 19:4 – 20:18
कार्यक्रम : #0037
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प्रिय मित्रों आप सभी को नमस्कार। आशा है आप परमेश्वर के वचन पर चलते हुए उसके अनुग्रह में बढ़ते जा रहे हैं। एक बार फिर से आप का स्वागत है। पिछले प्रसारण में हम देख रहे थे कि स्वर्गदूत सदोम के फाटक के परत्रास लूत से भेंट करते हैं और लूत उन्हें समझा कर अपने घर चलने को मनाता है। तो आइए हम अपने अध्ययन में आगे बढ़तें हुए पढ़ें उत्पत्ति 19 अध्याय के पद 4 और 5, लिखा है।
उत्पत्ति 19:4 “उनके सो जाने से पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन् चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया।“
उत्पत्ति 19:5 और लूत को पुकारकर कहने लगे, “जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।”
यह एक घिनौना दृष्य है, जो इस सदोम नगर की नीच-अवस्था को प्रगट करता है। इस पाप के कारण ही सदोमी लोगों का नाम पड़ा है जिसका अर्थ होता है पुरूषगामी। स्पष्ट रूप से सदोम में कलीसिया बनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि इस भीड़ के लिए एक कलीसिया बनाई जाए और न उनसे कहे कि कुछ ठीक नहीं हैं, इसके बावजूद कि वे इस प्रकार का घिनौना काम करते आ रहे हैं। मैं आप को याद दिलाना चाहता हूँ कि परमेश्वर का वचन इस विषय में स्पष्ट़ है, और आप इसे कम करके नहीं बता सकते। सोदोमी होना या पुरूषगामी होना एक बहुत बड़ा पाप है।
मुझे पूरा भरोसा है कि जब लूत इस सदोम नगर में वास करने को गया तब उसे अनुमान नहीं था कि यह किस प्रकार का नगर है। वह वहाँ जाकर बस गया उसके बाद उसे पता चला कि वहाँ हर तरफ़ बुराई फैली हुई है, तथा उसने अपने बच्चों, अपने बेटों और बेटियों को उसी माहौल में पाला पोसा। जब उसने पहली बार सदोम की तरफ़ अपना तम्बू लगाया था, तब उसने नीचे ताराई में देखा और उसे सुंदर सड़कें, बगीचे और भव्य इमारतें दिखाई दीं। तथा उसने लोगों को बाहरी तौर पर देखा था, लेकिन उसने यह नहीं देखा कि वे वास्तव में कैसे हैं। इस नगर का पाप इतना बड़ा है कि अब परमेश्वर इसका न्याय करने जा रहा हैं। परमेश्वर इस नगर को नष्ट करने जा रहा था।
आइए हम इन दोनों के बीच एक रेखा खींच कर देखें। आप पाप के प्रति लोगों का अलग ही नज़रिया बन चुका है। आज समाज में एक ऐसे क्षेत्र का निमार्ण हो चुका है जिस में पाप उतना काला या भयंकर नहीं माना जाता है जैसा पहले हुआ करता था। चर्च ने आज इतना समझौता कर लिया है कि उसकी दशा दयनीय बन चुकी है। संसार में कुछ ऐसे देश हैं जहाँ समलैंगिक लोगों की कलीसिया स्थापित की जा चुकी है, और शर्म की बात तो यह है कि उनका पास्टर भी समलैंगिक है। क्या आप इस बात को स्विकार करना चाहेंगे कि सदोम और अमोरा का न्याय और दण्ड आज की पीढ़ी के लिए एक सबक है। परमेश्वर इस प्रकार की कलीसिया को स्विकार नहीं करने वाला है।
आज लागों का विचार यह है कि आप परमेश्वर की सन्तान बन सकते हैं और साथ ही पाप में भी जीवन व्यतीत करते रह सकते हैं। परमेश्वर कहता है कि सह असंभव है, आप ऐसा नहीं कर सकते। सदोम का नगर इस सच्चाई का जीवित उदाहरण था। पौलुस रोमियों की पत्री 6:1-2 में एक प्रश्न पूछते हुए कहता है, “तो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें कि अनुग्रह बहुत हो? कदापि नहीं! हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उसमें कैसे जीवन बिताएँ?“ आप मसीही हो कर पाप में बने रह सकते हैं, यह विचार बहुत बड़ी भूल और भ्रम है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो इसे हल्के में लेते हैं, और जैसा कि मैं सोचता हूँ इस विशेष घटना के अन्तर्गत।
सदोम और अमोरा में वे यही कर रहे थे और तब परमेश्वर ने इन नगरों को नष्ट कर दिया। आप यह न कहें कि उत्पत्ति की पुस्तक में परमेश्वर पुराने विचाधारा का था और आज वह बदल गया है। कृपया आप इस बात पर वाद-विवाद न करें, क्योंकि प्रभु यीशु आखिरकार सब पापियों को स्वीकार करता है। वह निश्चित ऐसा करता है, परन्तु वह ऐसा कर के उन्हें पूरी रीति से बदल देता है। वह पापिन स्त्री जो उसके पास आई थी वह अपना पुराना काम छोड़ चुकी थी। जब वह प्रभु के पास आई तब उसने उसे बदल दिया। ऐसा ही अन्य पापियों के साथ भी होता है। एक चुंगी लेने वाला उसके पास आया और उसने अपने चुंगी लेने के पद को त्याग दिया। जब वह प्रभु यीशु के पास आया तो उसने अपनी कुटिलता छोड़ दी। मित्रों, यदि आप प्रभु यीशु मसीह के पास आए हैं तो आप का जीवन भी बदल जाएगा। बहुत से लोग कहने का प्रसास करते हैं कि हम एक नए संसार में जी रहे हैं, जमाना बदल गया है और मुझे भी अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है। प्रिय मित्रों, यह सच है कि हम एक नई दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन यह फिर से सदोम और अमोरा की तरह बनता जा रहा है। तब आगे पर 6 और 7 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:6 “तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया, और किवाड़ को अपने पीछे बन्द करके कहा।“
उत्पत्ति 19:7 “हे मेरे भाइयो, ऐसी बुराई न करो।“
सदोम के पुरुष द्वार के बाहर थे और वे यह चाहते हैं कि जो अतिथि लूत के घर के अन्दर हैं, वे उन्हें लुच्चाई करने के लिए सौंप दिए जाएँ। लूत उनसे कहने लगा, “मेरे भाइयों, कृपा करके ऐसा दुष्कर्म न करो।“ लूत ने इस रीति से उन बातों सामना किया और वह एक लम्बे समय से सदोम में रह रहा था। यह उसके लिए कोई नई नैतिकता नहीं थी परन्तु पुराना पाप था। तब पद 8 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:8 “सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा; इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो; पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।”
उन दिनों में जब कोई अतिथि किसी घर में आता था, तब घर वाला ही उसकी कुशलता का जिम्मेदार होता था। लूत अपने अतिथियों को बचाने के लिए इस हद तब बलिदान देने को तैयार था। पद 9 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:9 “उन्होंने कहा, “हट जा!” फिर वे कहने लगे, “तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिये आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिये अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।” और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए।“
यहाँ पर आप देख सकते हैं कि लूत अपने राजनैतिक क्षेत्र में बढ़ा हुआ था। तब 10 और 11 पद में लिखा है।
उत्पत्ति 19:10 “तब उन अतिथियों’ ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया।“
उत्पत्ति 19:11 “और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरुषों को जो घर के द्वार पर थे, अन्धा कर दिया, अत: वे द्वार को टटोलते टटोलते थक गए।“
यदि उन अतिथियों ने लूत को अन्दर नहीं खींचा होता, तो वे उसे और उन अतिथियों को बर्बाद कर देते। क्योंकि सदोम के लोगों का यही उद्देश्य था। आगे पद 12 से 14 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:12 “फिर उन अतिथियों ने लूत से पूछा, “यहाँ तेरा और कौन कौन है? दामाद, बेटे, बेटियाँ, और नगर में तेरा जो कोई हो, उन सभों को लेकर इस स्थान से निकल जा।“
उत्पत्ति 19:13 “क्योंकि हम यह स्थान नष्ट करने पर हैं, इसलिये कि इसकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बढ़ गई है; और यहोवा ने हमें इसका सत्यानाश करने के लिये भेजा है।”
उत्पत्ति 19:14 “तब लूत ने निकलकर अपने दामादों को, जिनके साथ उसकी बेटियों की सगाई हो गई थी, समझा के कहा, “उठो, इस स्थान से निकल चलो; क्योंकि यहोवा इस नगर को नष्ट करने पर है।” पर वह अपने दामादों की दृष्टि में ठट्ठा करनेवाला जान पड़ा।“
लूत बहुत ही बुरी स्थिति में था। उसने सदोम नगर में बहुत वर्ष व्यतीत किया था। उसने यहाँ रहकर ऐसी बातों को बर्दाशत करना सीख लिया था जिसे वह दुष्टता कहता था, उसने अपने बच्चों को वहाँ के लोगों के साथ बढ़ते हुए देखा था। जो लोग वहाँ नैतिक रूप से थोड़े अच्छे थे सम्भवतः उनके साथ विवाह संबंध भी स्थापित किए गए थे। जब समय आया तब परमेश्वर की ओर से लूत को संदेश मिला कि इस नगर को छोड़ कर चला जा। तब वह अपने होने वाले दामादों के पास गया और उनसे कहा, “आओ हम इस नगर को छोड़कर दूर चले जाएँ। परमेश्वर इस नगर को नाश करनेवाले हैं।“ वे उस पर हँसने लगे, उसका उपहास कर मजाक बनाने लगे। वह उनके बीच बहुत सालों से बिना किसी अन्तर के, उनमें से एक बन कर रह रहा था, और उन्होनें उसकी चेतावनी को मज़ाक के रूप में ले लिया। इस स्थान में लूत परमेश्वर की इच्छा के बाहर था और न उसके पास कोई भी गवाही थी। उसने इस नगर में परमेश्वर के लिए एक भी व्यक्ति को जीता नहीं था, अर्थात् प्रभु की संगति में नहीं लाया था। मित्रों, यही सिद्धान्त आज भी लागू होता है, जब आप दूसरे लोगों के जीवन जीने का तरीका अपना लेते हैं, तो आप कैसे प्रभु के लिए आत्मा जीत सकते हैं। मैं सोचता हूँ वही बात यहाँ पर स्पष्ट रीति से हमें दर्शाई गई है।
मैं भी इस समय अब्राहम से सहमत होता कि शायद लूत का उद्धार अब तब नहीं हुआ होगा, परन्तु याद रखें कि 2 पतरस 2:6-8 में क्या कहता है, “और सदोम और अमोरा के नगरों को विनाश का ऐसा दण्ड दिया कि उन्हें भस्म करके राख में मिला दिया ताकि वे आनेवाले भक्तिहीन लोगों की शिक्षा के लिये एक दृष्टान्त बनें, और धर्मी लूत को जो अधर्मियों के अशुद्ध चालचलन से बहुत दुःखी था छुटकारा दिया। (क्योंकि वह धर्मी उनके बीच में रहते हुए और उनके अधर्म के कामों को देख देखकर और सुन सुनकर, हर दिन अपने सच्चे मन को पीड़ित करता था।)“ ध्यान रखें मित्रों कि लूत कभी भी सदोम में उन बातों का आनन्द नहीं उठा रहा था। और अब जब वह उस नगर को छोड़ने जा रहा था, तो वह अपनी पत्नी और दोनों बेटियों को छोड़ अपने साथ किसी को ला भी नहीं सकता था। पद 15 और 16 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:15 “जब पौ फटने लगी, तब दूतों ने लूत से जल्दी करने को कहा और बोले, “उठ, अपनी पत्नी और दोनों बेटियों को जो यहाँ हैं ले जा; नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा।”
उत्पत्ति 19:16 “पर वह विलम्ब करता रहा; इस पर उन पुरुषों ने उसका और उसकी पत्नी, और दोनों बेटियों के हाथ पकड़े, क्योंकि यहोवा की दया उस पर थी; और उनको निकालकर नगर के बाहर कर दिया।“
यहाँ हम सारी बातों के बावजूद भी परमेश्वर के एक जन को देखते हैं। यदि मेरे पास केवल उत्पत्ति की पुस्तक का लेख होता तो शायद मैं कभी इस बात पर निश्चित हो पाता कि लूत का उद्धार हुआ की नहीं, परन्तु क्योंकि पतरस उसे धर्मी कहता है तो हम मान सकते है। लूत इसलिए धर्मी मनुष्य बना क्योंकि वह अब्राहम का अनुसरण कर रहा था, वह परमेश्वर पर विश्वास करता था और उसने बलिदान भी चढ़ाया था। परमेश्वर ने लूत पर अपनी दया प्रगट किया, और अ बवह परमेश्वर पर भरोसा कर के नगर से भाग भी जाता है। तब पद 17 से 19 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:17 “और ऐसा हुआ कि जब उन्होंने उनको बाहर निकाला, तब कहा, “अपना प्राण लेकर भाग जा; पीछे की ओर न ताकना, और तराई भर में न ठहरना; उस पहाड़ पर भाग जाना, नहीं तो तू भी भस्म हो जाएगा।”
उत्पत्ति 19:18 “लूत ने उनसे कहा, “हे प्रभु, ऐसा न कर!“
उत्पत्ति 19:19 “देख, तेरे दास पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि हुई है, और तू ने इस में बड़ी कृपा दिखाई कि मेरे प्राण को बचाया है; पर मैं पहाड़ पर भाग नहीं सकता, कहीं ऐसा न हो कि कोई विपत्ति मुझ पर आ पड़े, और मैं मर जाऊँ।“
यहाँ तक की लूत भी उस शहर को छोड़ना नहीं चाहता था। वह नगर से बाहर निकलना तो चाहता था परन्तु पहाड़ पर जाना नहीं चाहता था। आगे पद 20 में कहता है।
उत्पत्ति 19:20 “देख, वह नगर ऐसा निकट है कि मैं वहाँ भाग सकता हूँ, और वह छोटा भी है। मुझे वहीं भाग जाने दे, क्या वह नगर छोटा नहीं है? और मेरा प्राण बच जाएगा।”
यह एक छोटा नगर था जो सोहर कहलाता था और लूत उसी नगर को भाग गया। आप देखते हैं कि लूत सदोम से नितलता है और पर वह वहाँ से भी शुद्ध होकर नहीं निकलता है। हम पाते हैं कि वह उस विशेष समय पर एक बड़ी समस्या में पड़ा जाता है।
मैदानी क्षेत्र में बसे नगरों का नाश किया जाना
परमेश्वर ने सदोम और अमोरा नगर को नाश कर दिया, और हमंे दो बातें बताई गई है, एक उसकी पत्नी के बारे में और दूसरी उसकी पुत्रियों के बारे में। उसकी पत्नी के बारे मंे हम पद 26 में पढ़ते हैं लिखा है:
उत्पत्ति 19:26 “लूत की पत्नी ने जो उसके पीछे थी दृष्टि फेर के पीछे की ओर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई।”
मैं समझता हूँ कि इस पद को बहुत गलत समझा गया है। इस संसार में क्यों लूत की पत्नी पीछे मुड़ी और पीछे देखती है? मेरे विचार में इसके दो कारण हैं। सब से पहली बात कि वह सदोम छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी इसलिए पीछे मुड़ी और पीछे देखती है। वह सदोम से प्रेम रखती थी। वह लूत से भी प्रेम रखती थी, परन्तु वह सदोम के व्यवहार और आचरण से बहुत प्रेम रखती थी, तथा उसे छोड़ना नहीं चाहती थी। संभवतः वह किसी संस्था की सदस्य थी। शायद वह सभी कामों में जोर शोर से सहभागी थी। उसका शरीर तो बाहर आ गया था परन्तु उसका मन और हृदय अभी भी वहीं था।
हमारे लिए यहाँ बहुत ही उत्तम संदेश है। मैं बहुत से विश्वासियों को कहते सुनता हूँ कि वे प्रभु को आते देखना चाहते हैं परन्तु उनका जीवन इस बात की गवाही नहीं देता है। रविवार के दिन उनके लिए आराधना में जाना असंभव होता है। रविवार की रात वे अपना घर या कोई पार्टी नहीं छोड़ते हैं। वे टीवी पर घण्टों अपना समय दे सकते हैं। परन्तु मेरे प्रियों जब प्रभु का आगमन होगा, तब आप को अपना घर, टीवी, क्लब और सब कुछ छोड़ कर जाना होगा। मैं आप से बस एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, क्या आप को यह सब छोड़ने का दुःख होगा, क्या यह छोड़ना आप के लिए असंभव है?
मैंने अपने आप से भी बहुत बार यही प्रश्न पूछा है। वास्तव में बहुत बार इन चीजों को छोड़ने की इच्छा नहीं होती है। हम इनके साथ ही रहना चाहते है। हमारे मित्र हैं, हमारे प्रिय लोग है जिनके साथ हम रहना चाहते हैं। मेरे साथ मेरी सेवकाई है जिसे मैं आगे बढ़ाना चाहता हूँ। कई बार मैं भी सोचता हूँ कि यदि प्रभु मुझे और अधिक समय दे तो अच्छा होगा। परन्तु मैं यह भी कहता चाहता हूँ कि जब वह मुझे बुलाए, तब ऐसी कोई भी चीज न हो जिसे छोड़े जाने से मेरा हृदय टूट जाए, एक भी न हो। मैं अपने घर से प्रेम करता हूँ, पर जब बुलावा हो तब उसे भी छोड़ने को मैं तैयार हूँ। आप उस दिन के बारे में आज क्या सोचते हैं? लूत की पत्नी मुड़ी और पीछे देखती है, और यही इसकी व्याख्या है।
दूसरा कारण है, कि वह परमेश्वर पर विश्वास नहीं करती थी। परमेश्वर ने कहा था, “अपना प्राण लेकर भाग जा; पीछे की ओर न ताकना।“ लूत पीछे मुड़कर नहीं देखा, उसने परमेश्वर पर विश्वास किया। परन्तु लूत की पत्नी ने परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया। वह विश्वासी नहीं थी, इसलिए वह नगर से बाहर नहीं जा पाई। वह पीछे मुड़कर देखी और नमक का खम्भा बन गई।
आगे हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों के साथ सोअर में जा बसा। मैं पद 31 से 38 में दी गई लूत और उसकी दो बेटियों कि घटना दोहराने नहीं जा रहा हूँ, जहाँ उसने अपनी दोनों बेटियों के साथ घोर अनैतिकता का पाप किया। वास्तव में लूत ने सदोम के शहर जा कर अच्छा नहीं किया। वह अपने प्राण को छोड़ सब कुछ खो दिया। उसका जीवन उन बहुत से लोगों के समान है जो अपने जीवन के पापों को नहीं देखते हैं। वे बच जाते हैं पर आप जलते-जलते। परमेश्वर ने इसे बहुत ही निश्चित रूप मंे उनसे कहा है, जिन्होंने अपना सब कुछ टोकरी में इस रीति से डाल दिया है कि यदि वे यहाँ अपने जीवन का न्याय नहीं करते हैं तो परमेश्वर उनका न्याय करेंगे। स्पष्ट रूप से लूत की कहानी भी यही थी।
मित्रों, मैं अब्राहम की ओर ध्यान केन्द्रित करते हुए इस अध्याय को समाप्त करना चाहता हूँ, कि अब्राहम इन सबके बारे में क्या सोचता है? पद 27-28 में कहता है।
उत्पत्ति 19:27 “भोर को अब्राहम उठकर उस स्थान को गया, जहाँ वह यहोवा के सम्मुख खड़ा था।“
उत्पत्ति 19:28 “और सदोम, और अमोरा, और उस तराई के सारे देश की ओर आँख उठाकर क्या देखा कि उस देश में से धधकती हुई भट्ठी का सा धूआँ उठ रहा है।“
जब अब्राहम सदोम की ओर देखा तब शायद उसका हृदय दुःखी हुआ होगा। मैं इस बात के प्रति निश्चित नहीं हूँ कि उसे यह मालूम था कि लूत बच गया है। संभवत उसे इसकी जानकारी बाद में हुई होगी। जब उसने सदोम की ओर देखा तो, संभवतः वह लूत के लिए दुःखी रहा होगा, परन्तु उसने लूत की तरह उस नगर में अपना कुछ भी पैसा नहीं लगाया था। और जब उस नगर का न्याय किया गया तो उसे कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि वह उस नगर से न ही प्रेम करता था और न संसार की वस्तुओं से।
मित्रों, इस बात को याद रखें कि हमें 1 यूहन्ना 2:15 पद में कहा गया है, “तुम न संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो।“ मित्रों जब मैं सदोम नगर को लूत की आँखांे से देखता हूँ तो पाता हूँ कि लूत का दृष्टिकोण निश्चय ही गलत था। परन्तु लूत की पत्नी उस नगर के साथ प्रेम कर बैठी। अब आप अब्राहम के दृष्टिकोण से भी सदोम को देख सकते हैं। उसने वहाँ कुछ भी हानि नहीं उठाई। अन्त में आप परमेश्वर के दृष्टिकोण से भी, जैस वह है, सदोम को देख सकते हैं। आज यह बहुत दुःख की बात है कि कलीसिया पुरुषगामी या समलैंगिकता के पाप को उस रीति से नहीं देख रही है जैसे परमेश्वर देखते हैं। मुझे लगता है कि उस समय कि अपेक्षा पुरुषगामी या समलैंगिकता इतना प्रचलित नहीं है, पर उसका प्रभाव पिछले कुछ 1 -2 दशक में बहुत बढ़ गया है। आज समलैंगिक लोगों की जनसंख्या बढ़ते जा रही है। आज लोग खुल कर इस बारे में बात कर रहे हैं, हमारे समाज के अन्दर। यह बड़ी चेतावनी है।
परन्तु आज समलैंगिकता पर मसीहियों का विचार है? लूत भी अपने दिनों में कहता था यह दुष्टता है, और परमेश्वर ने इसका न्याय किया। क्या परमेश्वर की सन्तान के लिए यह जानना पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर इन सब बातों के साथ कभी समझौता नहीं कर सकता। यह पाप है! संसार इस में लिप्त है और इसे एक बिमारी कहता है। उसी प्रकार शराब के सेवन पर भी यही कहा जाता है। जी हाँ! सच में वे बिमार हैं। परन्तु किस बात ने उसे पहली बार शराब का सेवन करने को प्रेरित किया, और वह तब तक पीता गया जब तक की बिमार न हो गया? मित्रों यह पाप ने उसके जीवन में किया। समस्या पाप की है, और समलैंगिकता पाप है। रोमियों के पहले अध्याय में उसे यही शीर्षक दिया गया है, रोमियों 1:18-32, इस कारण परमेश्वर ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। उत्पत्ति कि पुस्तक का 19वां अध्याय हमारी आज की पीढ़ी के लिए बहुत महत्वपूर्ण अध्याय है जिसमें हम आज वास कर रहे हैं।
इसके साथ ही अध्याय 19 समाप्त होता है और अब हम आते हैं अध्याय 20 जिसका विषय है।
अध्याय 20
विषय: अब्राहम सारा का गलत परिचय देता है।
उत्पत्ति अध्याय 20 एक ऐसा अध्याय लगता है जिसे आप छोड़ देना चाहेंगे क्योंकि इस अध्याय में अब्राहम पुनः उसी पाप को दोहराता है, जिसे उसने मिस्र जाने पर किया था, वह अपनी पत्नी सारा को अपनी बहन कहकर संबोधित करता है। यह वही घिनौनी कहानी है, लेकिन इस अध्याय को इस पुस्तक में एक विशेष उद्देश्य के अन्तर्गत रखा गया है, इससे पहले कि अब्राहम और सारा से इसहाक उत्पन्न हो तथा इससे पहले कि वे आशीष प्राप्त करें, वे इस पाप का सामना करने जा रहे हैं। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि जब जक हम अपने जीवन में अपने पापों का निराकरण करने पर विचार न करें हम परमेश्वर से आशीष प्राप्त नहीं कर सकते।
अब्राहम, सारा का गलत विवरण देता है
मित्रों हम इस अध्याय के कुछ अहम बातों पर ध्यान देते हुए पढ़ें उत्पत्ति 20 का पद 1 और 2 लिखा है।
उत्पत्ति 20:1 “फिर अब्राहम वहाँ से निकल कर दक्खिन देश में आकर कादेश और शूर के बीच में ठहरा, और गरार में रहने लगा।“
उत्पत्ति 20:2 “और अब्राहम ने अपनी पत्नी सारा के विषय में कहा, “वह मेरी बहिन है,” इसलिये गरार के राजा अबीमेलेक ने दूत भेजकर सारा को बुलवा लिया।“
यह बहुत रोचक है, क्या आप सोचते हैं कि सारा बहुत सुन्दर थी? वह अब करीब 90 वर्ष की हो चुकी थी और वह अब भी सुन्दर थी। बहुत कम वरिष्ट नागरिक इस प्रकार देखे जा सकते हैं।
ध्यान दें कि अब्राहम उस देश के दक्षिण क्षेत्र में कादेशबर्ने से भी आगे बढ़ जाता है। यह वही स्थान है जहाँ बाद में इस्राएल के लोग मिस्र से आए थे और उन्होंने उस देश में प्रवेश करने से मना कर दिया था। अब्राहम गरार तक चला जाता है, जो उसे नहीं करना चाहिए था, और वह सारा के बारे में फिर से झूठ बोलता है।
मैं चाहता हूँ कि आप अब्राहम द्वारा अपनी गलती स्विकार करने की ओर ध्यान दें, क्योंकि यही वह कारण है जो इस अध्याय को विशेष बनाता है और इस सच्चाई को प्रगट करता है कि अब्राहम और सारा तब तक इसहाक को प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक वे अपने जीवन में इस पाप का निराकरण नहीं कर लेते। तब पद 11 में आगे हम पढ़ते हैं।
उत्पत्ति 20:11 “अब्राहम ने कहा, “मैं ने यह सोचा था कि इस स्थान में परमेश्वर का कुछ भी भय न होगा; इसलिये ये लोग मेरी पत्नी के कारण मुझे घात करेंगे।“
अब्राहम इस समय अबीमेलेक से बातें कर रहा है और अबीमेलेक परेशान है कि अब्राहम इस प्रकार कैसे झूठ बोल सकता है। अब्राहम ने यहाँ पर भी परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया। उसने सोचा कि जहाँ वह जा रहा है, वहाँ परमेश्वर नहीं है। परन्तु वहाँ उसे अबीमेलेक मिलता है जो भले और बुरे को अच्छी तरह से पहचानता था। अबीमेलेक अपनी नैतिकता का परिचय देता और वह परमेश्वर को जानने वाला मनुष्य था। यहाँ पर अबीमेलेक की तुलना में अब्राहम कमज़ोर पाया जाता है। तब पद 12 में लिखा है।
उत्पत्ति 20:12 “इसके अतिरिक्त सचमुच वह मेरी बहिन है; वह मेरे पिता की बेटी तो है, पर मेरी माता की बेटी नहीं; फिर वह मेरी पत्नी हो गई।“
यहाँ पर अब्राहम सत्य बोलने के लिए आधा झूठ कहता है, कि सारा मेरी आधी बहिन है और वह मेरी पत्नी है। तब पद 13 में कहता है।
उत्पत्ति 20:13 “और ऐसा हुआ कि जब परमेश्वर ने मुझे अपने पिता का घर छोड़कर निकलने की आज्ञा दी, तब मैं ने उससे कहा, ‘इतनी कृपा तुझे मुझ पर करनी होगी कि हम दोनों जहाँ-जहाँ जाएँ वहाँ-वहाँ तू मेरे विषय में कहना कि यह मेरा भाई है’।“
अब्राहम ने परमेश्वर के ऊपर पूरा भरोसा और विश्वास नहीं किया। इस कारण जब दोनों ने अपनी यात्रा आरंभ की तब उन्होंने यह योजना बनाई। अब्राहम और सारा सोचते रहे कि वे इस प्रकार अब्राहम की हत्या होने से बचा लेंगे। उन्होंने ऐसा अनुबंध किया और मिस्र में उसे उपयोग किया और अब यहाँ फिर से करते हैं। इस से पहले कि अब्राहम की प्रार्थना सुनी जाए और उसे इसहाक के रूप में आशीष दी जाए, पाप का निराकरण आवश्यक है।
आज बहुत से मसीही विश्वासी अपने जीवन में पाप पर विचार नहीं करते हैं जिसके फलस्वरूप उनके जीवन में कोई आशीष नहीं है। अगर मुख्य धारा की कलीसिया में अगुवाई करने वाले अगुवे आज अपने पापों का अंगिकार कर उनका निराकरण कर लें, तो मुझे पूरा विश्वास है कि कलीसिया में जागृति आ जाएगी। जब तक हम पापों का निराकरण नहीं करेंगे हमें तब तक कोई आशीष प्राप्त नहीं होगी। पौलुस 1 कुरिन्थियों 11:28-32 में कहता है, “इसलिये मनुष्य अपने आप को जाँच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। क्योंकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहिचाने, वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है। इसी कारण तुम में बहुत से निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए। यदि हम अपने आप को जाँचते तो दण्ड न पाते। परन्तु प्रभु हमें दण्ड देकर हमारी ताड़ना करता है, इसलिये कि हम संसार के साथ दोषी न ठहरें।“ आज आशीषें कलीसिया से और बहुत से विश्वासियों के जीवन में स्थगित की जा चुकी है, क्योंकि हम अपने जीवन में पापों का निराकरण नहीं कर रहे हैं। उत्पत्ति के इस बीसवें अध्याय में हमें यही एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश प्रदान किया गया है। क्या आप के जीवन में ऐसा कोई पाप है जिसे अंगिकार कर क्षमा प्राप्त करने की आवश्यकता है? तो आइए हम अभी प्रार्थना कर अपने पापों का निराकरण करें। आइए प्रार्थना करें।
अध्ययन मार्गदर्शिका
जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ
सीखने के नोट्स
उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि
लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।
उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।
उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।
मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।
उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।
रूपरेखा
I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)
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A. सृष्टि, अध्याय 1-2
- स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
- पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
- पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
- a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
- b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
- c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
- d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
- e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
- f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
- g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
- h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
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B. पतन, अध्याय 3-4
- पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
- पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
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C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
- आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
- जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
- जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
- जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
- जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
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D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
- जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
- बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
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रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
- उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
- उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
- उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
- उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
- उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
- उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)
II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)
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A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23
(परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)
- अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
- अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
- पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
- परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
- साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
- परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
- परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
- दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
- अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
- इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
- परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
- सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
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B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26
(एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)
- अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
- अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
- परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
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C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
- याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
- याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
- याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
- याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
- याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
- याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
- याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
- याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
- याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
- एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
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D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
- याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
- यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
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मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
- पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
- यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
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मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
- यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
- याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
- याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
- यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
- यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
- याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
- याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
- याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
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याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
- याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
- कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50
