उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 18:5 - 19:3
0:00 0:00

आप क्या सुनेंगे

डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 18:5 – 19:3
कार्यक्रम : #0036

पढ़ें

प्रिय मित्रों आप सभी को प्रेम भरा नमस्कार। आशा है आप परमेश्वर के अनुग्रह से सुरक्षित हैं तथा मेरे साथ वचन के मनन के लिए तैयार हैं। तो आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 18 अध्याय का पद 5 से 8 लिखा है।

उत्पत्ति 18:5 “फिर मैं एक टुकड़ा रोटी ले आऊँ, और उससे आप अपने अपने जीव को तृप्त करें, तब उसके पश्चात् आगे बढ़ें; क्योंकि आप अपने दास के पास इसी लिये पधारे हैं।” उन्होंने कहा, “जैसा तू कहता है वैसा ही कर।”
उत्पत्ति 18:6 “तब अब्राहम तुरन्त तम्बू में सारा के पास गया और कहा, “तीन सआ मैदा जल्दी से गूँध, और फुलके बना।”
उत्पत्ति 18:7 “फिर अब्राहम गाय-बैल के झुण्ड में दौड़ा और एक कोमल और अच्छा बछड़ा लेकर अपने सेवक को दिया, और उसने जल्दी से उसे पकाया।“
उत्पत्ति 18:8 “तब उसने दूध और दही और बछड़े का मांस, जो उसने पकवाया था, लेकर उनके आगे परोस दिया; और आप वृक्ष तले उनके पास खड़ा रहा, और वे खाने लगे।“

मित्रों, क्या किसी की आवभगत करने का यह अद्भुत तरीका नहीं है? अब्राहम ने छोटे पशु के मांस के साथ भोजन तैयार किया है, उसने एक अच्छे पशु को लेकर, अपने नौकर को दिया और नौकर ने उसे मारकर, स्वादिष्ट भोजन तैयार किया, और हो सकता है कि यह उस समय का सबसे अच्छा भोजन था। “तब उसने दूध और दही भी परोसा।“ जो वास्तव में एक त्यौहार के भोजन जैसे लग रहा था। अब्राहम ने इन तीनों अतिथियों की आवभगत अच्छी रीति की।

तब हम पाते हैं कि ये तीनों अतिथि राजसी थे, जैसा नये नियम में इब्रानियों 13ः2 में पढ़ते हैं, कि “अतिथि-सत्कार करना न भूलना, क्योंकि इसके द्वारा कुछ लोगों ने अनजाने में स्वर्गदूतों को आदर-सत्कार किया है।“ वास्तव में यह अब्राहम ही था जो यह बिना जाने कि वे स्वर्गदूत हैं उनकी सेवा टहल की। तब आगे पद 9 में लिखा है।

उत्पत्ति 18:9 “उन्होंने उससे पूछा, “तेरी पत्नी सारा कहाँ है?” उसने कहा, “वह तो तम्बू में है।”

उन दिनों में और आज भी बहुत सी सभ्यता में यह उचित नहीं माना जाता कि जब कोई अन्जान अतीथी घर में आए तो महिलाएँ उनके सामने बाहर आएँ, परन्तु अब वे उसकी पत्नी सारा के बारे में पूछते हैं। तब आगे पद 10 में हम पढ़ते हैं।

उत्पत्ति 18:10 ”उसने कहा, “मैं वसन्त ऋतु में निश्चय तेरे पास फिर आऊँगा, और तेरी पत्नी सारा के एक पुत्र उत्पन्न होगा।” सारा तम्बू के द्वार पर जो अब्राहम के पीछे था, सुन रही थी।”

मुझे लगता है कि सारा दरवाजे पर कान लगा कर सुन रही होगी कि क्या बात हो रही है। इस पर अब्राहम और सारा दोनों इस बात को समझ जाते हैं कि उन्होंने अनजाने में स्वर्गदूतों का सत्कार किया है। तब पद 11 और 12 में लिखा है।

उत्पत्ति 18:11 ”अब्राहम और सारा दोनों बहुत बूढ़े थे; और सारा का मासिक धर्म बन्द हो गया था।”
उत्पत्ति 18:12 ”इसलिये सारा मन में हँस कर कहने लगी, “मैं तो बूढ़ी हूँ, और मेरा पति भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा?”

सारा मन में ही हँस कर स्वयं से यह प्रश्न करती है कि, “क्या यह संभव है कि मुझे पुत्र हो?“ यह किस प्रकार की हँसी थी? मेरे विचार में वह कहना चाहती थी, यह बात सच साबित होने के लिए बहुत अच्छी, पर असंभव है। मेरा अनुमान है कि बहुत से लोगों ने सह अनुभव किया होगा। कुछ अवसरों पर परमेश्वर हमारे प्रति इतना भला बना रहता है कि हमें इस बात पर हँसी आती है और विश्वास ही नहीं होता है। यह बात इतनी अच्छी थी कि उसका सच साबित होना विश्वास से बाहर लग रहा था और इस पर सारा हँस पड़ी। उसके कहने का अर्थ था कि “यह असंभव है।“ तब आगे पद 13 से 15 में लिखा है।

उत्पत्ति 18:13 ”तब यहोवा ने अब्राहम से कहा, “सारा यह कहकर क्यों हँसी कि क्या मेरे, जो इतनी बूढ़ी हो गई हूँ, सचमुच एक पुत्र उत्पन्न होगा?”
उत्पत्ति 18:14 ”क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्थात् वसन्त ऋतु में,’ मैं तेरे पास फिर आऊँगा, और सारा के पुत्र उत्पन्न होगा।”
उत्पत्ति 18:15” तब सारा डर के मारे यह कहकर मुकर गई, “मैं नहीं हँसी।” उसने कहा, “नहीं; तू हँसी तो थी।”

परमेश्वर का प्रश्न सुन कर सारा डर गई और टालमटोल करने लगी, परन्तु वह सत्य को ठुकरा नहीं सकती थी। तब पद 16 में लिखा है।
उत्पत्ति 18:16 “फिर वे पुरुष वहाँ से चले और सदोम की ओर दृष्टि की; और अब्राहम उन्हें विदा करने के लिये उनके संग संग चला।“

अब्राहम उन्हें विदा करने के लिए बाहर थोड़ी दूर तक गया। और जिस जगह तक अब्राहम उन्हें छोड़ने को गया, वहाँ से वे सदोम और अमोरा को देख सकते थे। यदि आसमान खुला हो और बादल न हो तो आप उसे स्पष्ट देख सकते हैं। आप यरूशलेम से बैतलहम तक, और पुराने सामरिया के खंडहरों से यरूशलेम तथा भूमध्य सागर और गलील सागर को भी स्पष्ट रीति से देख सकते हैं। आप होरेब पर्वत को किसी भी देख सकते हैं जो बहुत ही आश्चर्यजनक है। अब्राहम इन अतिथियों के साथ नीचे तक गया और उन्होंने वहाँ से सदोम और अमोरा को देखा। उन दिनों में वह स्थान लोगों के लिए एक बड़े रेसार्ट या मजा करने के स्थान के समान था, जहाँ जा कर लोग बहुत खुश होते होंगे, और वह जगह भी बहुत सुन्दर थी। तब पद 17 में हम पढ़ते हैं।

परमेश्वर सदोम और अमोरा पर आने वाले विनाश की घोषणा करता है।

उत्पत्ति 18:17 “तब यहोवा ने कहा, “यह जो मैं करता हूँ, उसे क्या अब्राहम से छिपा रखूँ?“

इस समय तक परमेश्वर ने अब्राहम पर यह प्रगट नहीं किया था कि वह सदोम और अमोरा के साथ क्या करने जा रहा है। वह उन्हें नाश करने जा रहा था। लिखा है, “तब यहोवा ने कहा, “यह जो मैं करता हूँ, उसे क्या अब्राहम से छिपा रखूँ?“
अब परमेश्वर वह कारण बताता है कि क्यों वह इस बात को अब्राहम से छिपा कर नहीं रखेगा। पद 18।

उत्पत्ति 18:18 “अब्राहम से तो निश्चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी।“

अब्राहम एक अद्भुत प्रभाव डालने जा रहा था। वह बहुत बड़े समुह को प्रभावित करने जा रहा था, यहाँ तक कि आनेवाली पीढ़ी भी इसमें शामिल थी। यह आज भी सत्य है। अब्राहम हमें आज प्रभावित कर रहा है, और हम इसे टाल नहीं सकते। उसका जीवन हमें प्रभावित करता है। तब पद 19 में लिखा है।
उत्पत्ति 18:19 “क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।”

यहाँ पर परमेश्वर कहता हैं, “मेरे लिए यही अच्छा होगा, कि सदोम और अमोरा शहर के विनाश की बात, अब्राहम से न छिपाऊँ, नहीं तो मेरा गलत प्रभाव उसके ऊपर पड़ेगा।“ यहाँ पर ध्यान देने की बात है कि अब्राहम के घर में सभी लोग अनुशासित थे। तब आगे पद 20 और 21 में लिखा है।

उत्पत्ति 18:20 “फिर यहोवा ने कहा, “सदोम और अमोरा की चिल्लाहट बढ़ गई है, और उनका पाप बहुत भारी हो गया है।“
उत्पत्ति 18:21 “इसलिये मैं उतरकर देखूँगा कि उसकी जैसी चिल्लाहट मेरे कान तक पहुँची है, उन्होंने ठीक वैसा ही काम किया है कि नहीं; और न किया हो तो मैं उसे जान लूँगा।”

दूसरे शब्दों में परमेश्वर, अब्राहम से कहता हैं, “मैं वहाँ की स्थिति को जानता हूँ, परन्तु मैं वहाँ पर जाँच पड़ताल के लिए जा रहा हूँ।“ परमेश्वर कभी भी जल्दबाज़ी या हड़बड़ी में कोई काम नहीं करते हैं। यह अच्छी बात थी कि परमेश्वर ने अब्राहम को बताया कि वह इन शहरों को नाश करनेवाला है, अन्यथा अब्राहम पर परमेश्वर का गलत प्रभाव पड़ता। शायद वह सोचता कि परमेश्वर तानाशाह या बदला लेने वाला हैं, और ऐसा है जो अपने लोगों पर कोई दया या रहम नहीं करता है। अब्राहम के मन में परमेश्वर के प्रति लगत धारण या विचार विचार उत्पन्न हो जाता, इसलिए परमेश्वर अब्राहम को बता देता है कि वह सदोम और अमोरा के साथ क्या करने जा रहा है। अब अब्राहम के पास समय है कि वह इसे अपने मन में ही रखे। यह अच्छा हुआ कि परमेश्वर ने अब्राहम को बता दिया अन्यथा उसके मन में परमेश्वर के प्रति और सदोम और अमोरा के प्रति गलत धारणा बनी रहती। यही एक कारण है कि परमेश्वर हमें, वह सब कुछ बता रहा हैं, जो वह है और करने जा रहा है।
ऐसी बहुत सी बातें भी हैं जो वह हमें नहीं बताया है, परन्तु उसने इतना कुछ बता दिया है, ताकि एक नासमझ या मूर्ख व्यक्ति भी क्यों न हो, वह कोई गलती करने का साहस नहीं करे। तब पद 22 में कहता है।

उत्पत्ति 18:22 “तब वे पुरुष वहाँ से मुड़ के सदोम की ओर जाने लगे; पर अब्राहम यहोवा के आगे खड़ा रह गया।“
अब अब्राहम परमेश्वर के सामने इन्तजार करते खड़ा रहता है। तब आगे 23 पद में लिखा है।
उत्पत्ति 18:23 “तब अब्राहम उसके समीप जाकर कहने लगा, “क्या तू सचमुच दुष्ट के संग धर्मी का भी नाश करेगा?“

अब्राहम के मन में सब से पहले कौन सी बात आई होगी? निश्चित तौर पर उसके मन में लूत का विचार आया। उसने पहली बार लूत को छुड़ा लिया था और अब वह फिर से खतरे में पड़ गया है। मैं सोचता हूँ कि अब्राहम कई बार लूत के बारे सोचकर आश्चर्य करता रहा होगा, कि उसका संबंध परमेश्वर के साथ कैसा है, परन्तु अब्राहम यह तो विश्वास करता था कि लूत उद्धार पाया हुआ व्यक्ति है। इसलिए वह परमेश्वर से कहता है, “धर्मियों का क्या होगा?“ मैं विश्वास करता हूँ कि अब्राहम ने बताया होगा कि उस शहर में बहुत से उद्धार पाए हुए लोग हैं। वह नहीं समझ पाया कि क्यों परमेश्वर धर्मियों को दुष्टों के साथ नाश कर रहा हैं। अब हम आगे पद 24 में क्या देखते हैं।

उत्पत्ति 18:24 “कदाचित् उस नगर में पचास धर्मी हों; तो क्या तू सचमुच उस स्थान को नष्ट करेगा और उन पचास धर्मियों के कारण जो उसमें हों, न छोड़ेगा?“

अब्राहम पचास से आरंभ करता है, वह परमेश्वर से कहता है, “यदि नगर में पचास धर्मी जन हों, तो क्या फिर भी तू उन्हें नाश करेगा? क्या पचास धर्मी के होने पर भी?” तब पद 25 में कहता है।

उत्पत्ति 18:25“ इस प्रकार का काम करना तुझ से दूर रहे कि दुष्ट के संग धर्मी को भी मार डाले, और धर्मी और दुष्ट दोनों की एक ही दशा हो। यह तुझ से दूर रहे। क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?”

आज भी यह प्रश्न बहुत से लोग पूछते हैं: “क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?” और इसका एक उत्तर यह है, कि बाइबल की बाकी पुस्तकें इस सच्चाई की गवाही देती हैं, कि समस्त पृथ्वी का न्यायी जो भी न्याय करता है, वह हमेशा सही ही करता है। जो कुछ भी परमेश्वर करता हैं वह ठीक ही करता हैं, और यदि आप सोचते हैं कि वह ठीक नहीं कर रहे हैं, तो समस्या परमेश्वर के साथ नहीं है, परन्तु समस्या आपके और आपकी सोच के साथ है। आप गलत सोच रहे हैं, आपके पास सारी सच्चाईयाँ उपलब्ध नहीं हैं, और आप के पास सारी जानकारियाँ नहीं हैं। यदि आप यह जानते तो आप यह भी जान जाते कि समस्त पृथ्वी का न्यायी जो कर रहा हैं, वह ठीक कर रहा हैं। अर्थात् हम सब गलत हैं और वह सही है। तब पद 26 में कहता है।

उत्पत्ति 18:26“ यहोवा ने कहा, “यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।”

अब्राहम इस पर विचार करता है। तब पद 27 और 28 में लिखा है।
उत्पत्ति 18:27 “फिर अब्राहम ने कहा, “हे प्रभु, सुन, मैं तो मिट्टी और राख हूँ; तौभी मैं ने इतनी ढिठाई की कि तुझ से बातें करूँ।“
उत्पत्ति 18:28 “कदाचित् उन पचास धर्मियों में पाँच घट जाएँ; तो क्या तू पाँच ही के घटने के कारण उस सारे नगर का नाश करेगा?” उसने कहा, “यदि मुझे उसमें पैंतालीस भी मिलें, तौभी उसका नाश न करूँगा।”

दूसरे शब्दों में अब्राहम कहता है, “यदि वहाँ पर सिर्फ पैंतालीस धर्मी बचे रहे, तो क्या तू पैंतालीस के रहते हुए भी शहर को नाश कर देगा?“ और परमेश्वर कहता हैं, “यदि मुझे पैंतालीस धर्मी भी मिले तो मैं उसे नाश न करूँगा।“ यह अब्राहम को थोड़ी हिम्मत देता है और वह फिर परमेश्वर से कहता है, “यदि वहाँ पर सिर्फ चालीस हों तब?“ यहाँ पर रोचक बात यह है, कि परमेश्वर कहता हैं, मैं उन्हें नाश न करूँगा। और अब्राहम लगातार संख्या को कम करने में लगा रहा। वह कहता है, “यदि तीस रहें तो तब?“ परमेश्वर कहते हैं, “यदि वहाँ पर तीस धर्मी भी हों तो मैं नाश न करूँगा।“ अब्राहम पुनः कहता है, “अगर वहाँ बीस धर्मी ही हों तब?“ परमेश्वर कहते हैं, “मैं उन्हें भी नाश नहीं करूँगा।“ अब्राहम अब उत्साह से भर जाता और वह एक और मौका लेते हुए कहता है। “यदि वहाँ पर सिर्फ दस ही धर्मी हों, क्या तू तब भी उन्हें नाश करेगा? तब परमेश्वर कहता हैं, “यदि शहर में दस धर्मी मिले तो भी मैं इसे नाश नहीं करूँगा।“ तब आगे पद 33 में लिखा है।

उत्पत्ति 18:33 “जब यहोवा अब्राहम से बातें कर चुका, तब चला गया; और अब्राहम अपने घर को लौट गया।“
मित्रों, अब यहाँ पर प्रश्न उठता है, कि अब्राहम दस से नीचे क्यों नहीं आया? मैं आपको बताका हूँ क्यों: इस समय वह डर जाता है कि कहीं लूत का उद्धार हुआ है कि नहीं, और यह बात उसे परेशान कर रही थी। इसलिए वह दस के नीचे नहीं जाता है। परन्तु वह एक मनुष्य तक उतर सकता था। वह कह सकता था, “यदि इस नगर में एक ही धर्मी तन मिले तो क्या तू फिर भी इस नगर को नाश करेगा?“ आप को मालूम है कि इस पर परमेश्वर का क्या उत्तर होता? “यदि उस नगर में एक भी धर्मी व्यक्ति है, तो मैं उसे उस नगर से बाहर निकाल लूँगा, क्योंकि मैं उस नगर के साथ उस एक धर्मी व्यक्ति को नाश नहीं करूँगा।“ आप कहेंगे, कि मैं यह कैसे जानता हूँ, क्योंकि इसी रीति से वह सब कुछ हुआ। वहाँ एक ही धर्मी व्यक्ति था, जिस पर अब्राहम ने विश्वास नहीं किया, परन्तु परमेश्वर उसे जानता था, और वह एक व्यक्ति लूत था। परमेश्वर ने लूत से कहा, “नगर से बाहर निकल जा। जब तक तू बाहर नहीं निकल जाता मैं नगर को नाश नहीं कर सकता।“

क्या आप जानते हैं मित्रों कि जब तक कलीसिया इस पृथ्वी पर है, संसार में महाक्लेश नहीं आ सकता? वह कदापि आ नहीं सकता मित्रों, क्योंकि मसीह यीशु ने हमारा दण्ड सह लिया है, और महाक्लेश आने वाले दण्ड और न्याय का ही भाग है। यही एक कारण है कि कलीसिया महाक्लेश से होकर नहीं जाएगी। उस महिमामय सच्चाई का यह चित्रण है। हम आगे चल कर देखेंगे कि सदोम और अमोरा संसार प्रतीक है, यह क्या ही भयानक दृष्य है! आज संसार की स्थिति क्या है? क्या यह सदोम और अमोरा के जैसे नहीं है। इसका यह मतलब यह नहीं कि प्रभु कल ही आने वाला है। न मैं यह जानता हूँ और न कोई मनुष्य यह जानता है, कि वह कब आने वाला है। वह कल भी आ सकता हैं, परन्तु इस बात को ध्यान रखें कि उसका आना उत्पत्ति की पुस्तक के इस दृष्य अनुसार ही होगा। इसके साथ ही अध्याय 18 यहाँ समाप्त होता है और हम अध्याय 19 से अपने अध्ययन को जारी रखेंगे जिसका विषय है।

अध्याय 19

विषय: स्वर्गदूत लूत को दर्शन देते हैं, मैदानी शहरों का विनाश

पिछला अध्याय परमेश्वर के साथ एक आशीषित मसीही सहभागिता का चित्राण करता है। परन्तु अब यह दृष्य बदल जाता है: क्योंकि अब हम हेब्रोन में मम्रे के मैदानी क्षेत्र को, जहाँ अब्राहम रहता है उसे छोड़ कर सदोम नगर में आते हैं, जहाँ लूत रहता था। इस अध्याय में हम देखते हैं कि लूत अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ, सदोम नगर को छोड़ता है तथा सदोम और अमोरा नगर नाश किया जाता है। लूत की पत्नी नमक का खम्भा बन जाती है, और इसके बाद हम, अपनी बेटियों के साथ लूत के भयंकर पाप को पाते हैं।

अब अध्याय 19 में हम अभिषापित जीवन कर चित्रण देखते हैं। आप इ बात को ध्यान रखें कि लूत एक धर्मी मनुष्य था। अगर हमारे पास केवल उत्पत्ति की पुस्तक का अभिलेख होता तो इस बात पर विश्वास करना कठिन होता, कि लूत धर्मी मनुष्य था। परन्तु शिमौन पतरस अपनी पत्री में 2 पतरस 2:7, 8 में कहता है, “धर्मी लूत को ……. क्योंकि वह धर्मी उनके बीच में रहते …………….अपने सच्चे मन को पीड़ित करता था।“ लूत सदोम में रहता था परन्तु वह मभी वहाँ खुश नहीं था। जिस दिन वह सदोम के लिए रवाना हुआ, यह उसके लिए एक दुःखद दिन था, क्योंकि उसने अपना परिवार को खो दिया। यदि आप पूरे दृष्य को देेखें तो पाएँगे कि उसने अपने सभों को खो दिया। यह वास्तव में एक दुःख की बात थी।

ऐसे बहुत से व्यक्ति हो सकते हैं, जो उद्धार प्राप्त हों, परन्तु अपनी जीवनशैली या रहने के स्थान के कारण वह अपना परिवार, अपना प्रभाव और अपनी गवाही सब कुछ खो देता है। मैं पिछले कई वर्षों से सेवा में हूँ, और ऐसे विश्वासियों को जानता हूँ जो लूत के समान हैं। कुछ वर्षों पहले की बात हैं कि किसी कलीसिया के एक अगुवे के बेटे ने कहा कि वह अपने पिता के मरने का इन्तजार कर रहा है ताकि वह मसीही जीवन को छोड़ सके। वह यह सोच रहा था कि सब कुछ बनावटी है और जो कुछ उसने देखा वो सब दिखावा है। यह सच है कि वह अपने घर की दशा के बारे में बता रहा था। उसका पिता कितना बनावटी रहा होगा? उस व्यक्ति ने अपने पुत्र को खो दिया, और दूसरे स्थानों में अपना प्रभाव भी खो दिया। मैं आप को इसका आश्वासन दे सकता हूँ। परन्तु मैं उसके उद्धार के बारे में प्रश्न नहीं उठा सकता। मैं सोचता हूँ कि वह व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता था, परन्तु आप उसके जीवन को देखकर कभी यह नहीं जान या समझ सकते। बेचारा लूत! यह उसके लिए कितना दुर्भाग्यपूर्ण था। उत्पत्ति की पुस्तक के दो सब से घृणित अध्यायों में यह एक अध्याय है।
स्वर्गदूत लूत से भेंट करते हैं।
आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 19 अध्याय का पद 1 लिखा है।
उत्पत्ति 19 में 1 “साँझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उन को देखकर वह उनसे भेंट करने के लिये उठा, और मुँह के बल झुककर दण्डवत् कर कहा।“

ये दो स्वर्गदूत सदोम में लूत से भेंट कर उसके विनाश की घोषणा करते हैं। ध्यान दें कि लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। मैं इस बात को अनदेखा नहीं कर सकता कि उन दिनों में नगर के फाटक के पास बैठने वाले न्यायकर्ता हुा करते थे। यह व्यक्ति लूत केवल सदोम नगर को गया नहीं परन्तु वह वहाँ राजनीती में भी शामिल हुआ। यहाँ वह एक न्यायधीश के सामान बैठा दिखाया गया है। तब पद 2 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:2 “हे मेरे प्रभुओं, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पाँव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइए।” उन्होंने कहा, “नहीं, हम चौक ही में रात बिताएँगे।”
संभवतः इन दोनों व्यक्तियों के पैर गन्दे थे, और यह सच है, यदि आप सिर्फ सैन्डल पहने हुए मम्रे के मैदानी क्षेत्र से पैदल चलकर सदोम आते हैं, तो निश्चय ही आपको पैर धोने की आवश्यकता पड़ेगी। अब फिर से मैं आपका ध्यान उस समय की प्रथा की ओर ले जाना चाहता हूँ, कि उन दिनों में अतिथियों का स्वागत कैसे किया जाता था।

लूत एक अतिथि-सत्कार करनेवाला व्यक्ति था। जब ये अजनबी आये तो उसने उन्हें अपने घर में आने का निमंत्रण दिया और वे उसके घर में आए। जो भी हो, उन्होंने पहले अनिच्छा व्यक्त की और कहा, “नहीं, हम अपनी रात इसी चौराहे पर बिताएँगे।“ दूसरे शब्दों में, हम पूरी रात बाहर ही बिताएँगे। “हम आपको कष्ट देना नहीं चाहते।“ वास्तव में वे एक उद्देश्य के अन्तर्गत ऐसा कह रहे थे। तब पद 3 में लिखा है।
उत्पत्ति 19:3 “पर उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया; इसलिये वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए; और उसने उनके लिये भोजन तैयार किया, और बिना खमीर की रोटियाँ बनाकर उनको खिलाईं।“
यहाँ हम देखते हैं, कि इन व्यक्तियों के लिए यह दूसरा भोज था। पहले इन्होंने अब्राहम के साथ भोज किया और अब ये लूत के साथ भोज कर रहे थे।
जब उन्होनें कहा, कि हम चौराहे पर ही रात बिताएँगे, तब लूत उनसे कहता है, कि आप यहाँ पर सदोम में ऐसा न करें। यह खतरनाक है। आपका जीवन खतरे में आ सकता है। आज बहुत से शहर ऐसे हैं जिनका नाम बदल कर सदोम रख देना चाहिए क्योंकि वहाँ रात को सड़क पर सोना खतरे से खाली नहीं है। आज बहुत से शहरों की हालत सदोम और अमोरा के सामन हो चुकी है जहाँ जीवन सुरक्षित नहीं हैं और रात को तो बिलकुल नहीं। लूत उनसे कहते हैं, कि आप लोग चौराहे में मत ठहरिए। यह आपके लिए सुरक्षित स्थान नहीं है। जब उसने उन पर दबाव डाला, तो वे उसके घर में गए।

मित्रों परमेश्वर आज संसार के सभी स्थानों को देखता रहता है कि वहाँ लोगों का जीवन कैसा है। कुछ हैं जो उसका आनन्द उठा रहे हैं पर कुछ हैं जो ऐसे जीवन से दुःखी हैं। आप का क्या विचार है मित्रों कृपया हमें बताने का कष्ट करें। आइए प्रार्थना के साथ अध्ययन को विराम दें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

आज के पैसेज से आपने जो मुख्य बात सीखी, उसे लिखें।

उत्पत्ति से और अधिक

उत्पत्ति

Scroll to Top