उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 16:1 - 17:5
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 16:1 – 17:5
कार्यक्रम : #0034

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अध्याय 16
विषय: सारै का सुझाव, हाजिरा का भाग जाना, अब्राहम की परिक्षा

दोस्तों जैसे ही हम इस अध्याय में आते हैं तो मेरे मन में आता है कि यह अध्याय बाइबल में न होता तो अच्छा होता। 15वें अध्याय में अब्राम जिस ऊँचाई पर चला गया था, आप कह सकते हैं कि वह ऊँचाईयों पर था, यद्यपि वह सिद्ध नहीं था। पर अध्याय 16 में आप सारै और उसकी मिश्री दासी हाजिरा के संदर्भ में इस व्यक्ति के विश्वास को टूटते देख सकते है। यहाँ हम सरै और अब्राम दोनों का अविश्वास और साथ ही इश्माएल का जन्म देखतें हैं। पिछले अध्याय के उत्तम प्रदर्शन के बाद निश्चित रूप से यह निराशाजनक है।

अब्राम को सारै का सुझाव
उत्पत्ति 16:1 “अब्राम की पत्नी सारै के कोई सन्तान न थी। उसके हाजिरा नाम की एक मिस्री दासी थी।“

मित्रों जैसा मैंने आप से पहले कहा था कि अब्राम ने मिश्र में ऐसी दो चीजें प्राप्त की जिसने उसे समस्या में डाल दिया: एक थी उसी धन-सम्पत्ति और दूसरी थी उसकी मिश्री दासी, हाजिरा। आगे पद 2 में लिखा है।

उत्पत्ति 16:2 “सारै ने अब्राम से कहा, “देख, यहोवा ने तो मेरी कोख बन्द कर रखी है, इसलिये मैं तुझ से विनती करती हूँ कि तू मेरी दासी के पास जा; सम्भव है कि मेरा घर उसके द्वारा बस जाए।” सारै की यह बात अब्राम ने मान ली।“

सारै ने जो सुझाव दिया वह उन दिनों की आम प्रथा थी। जब एक पत्नी सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ रहती थी तब वह सन्तान उत्पन्न करने के लिए अपनी दासी को अपने पति के पास भेज दिया करती थी। परन्तु परमेश्वर ने इस प्रथा को कभी अनुमति नहीं दिया था। कदापि नहीं। यह सारै की योजना थी और अब्राम ने उसकी बात मान ली। ऐसा प्रतीत होता है कि वह घर के एक मुखिया होने के पद को समर्पित करते हुए उसकी गलत योजना में शामिल हो गया। तब आगे पद 3 में हम पढ़ते हैं।
उत्पत्ति 16:3 “इसलिये जब अब्राम को कनान देश में रहते दस वर्ष बीत चुके तब उसकी स्त्री सारै ने अपनी मिस्री दासी हाजिरा को लेकर अपने पति अब्राम को दिया, कि वह उसकी पत्नी हो।“

यह छोटी मिस्री दासी अब्राम की रखैल या सहस्त्री बन जाती है, और यह बिल्कुल ही परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं था। परमेश्वर इससे उत्पन्न सन्तान को कभी स्वीकार करने वाला नहीं था। उसने स्वीकार नहीं किया और न कभी करेगा। क्यों? क्योंकि यह गलत था। आप यह न कहें कि परमेश्वर ने इसे स्वीकृति दी थी। आप सब यह कह सकते हैं कि यह इसलिए लिखा गया है, क्योंकि यह एक ऐतिहासिक सत्य है। तब पद 4 में हम पढ़ते हैं।

उत्पत्ति 16:4 “वह हाजिरा के पास गया, और वह गर्भवती हुई। जब उसने जाना कि वह गर्भवती है, तब वह अपनी स्वामिनी को तुच्छ दृष्टि से देखने लगी।“

हाजिरा में कहा होगा, “मैं अब्राम को एक सन्तउन देने में सफल हुई पर सारै ऐसा नहीं कर सकी।“ इस कारण वह सारै को तुच्छ दृष्टि से देखने लगी।“ पद 5 में लिखा है।

उत्पत्ति 16:5 “तब सारै ने अब्राम से कहा, “जो मुझ पर उपद्रव हुआ वह तेरे ही सिर पर हो। मैं ने तो अपनी दासी को तेरी पत्नी कर दिया; पर जब उसने जाना कि वह गर्भवती है, तब वह मुझे तुच्छ समझने लगी; इसलिये यहोवा मेरे और तेरे बीच में न्याय करे।”

मित्रों आप इस पद को ऐसे ही न जाने दें। आप यह भी न सोचें कि परमेश्वर ने इसको भी अनुमति दे दिया। परमेश्वर इसे गलत ठहराता है, और अब सारै देखती है कि उसे भी गलती कर दी है। कहती है, “जो मुझ पर उपद्रव हुआ वह तेरे ही सिर पर हो,“ मित्रों वह अपने निर्णय में गलत थी। परमेश्वर इसे कभी ग्रहण नहीं करेगा, और यह उस बुजुर्ग अब्राम के लिए दुःख कारण होने जा रहा था। आप देख सकते हैं कि अब्राम और सारै परमेश्वर पर ऐसा विश्वास नहीं कर रहे थे जैसा उन्हें रखना था। जो भी हो इस समय अब्राम नब्बे का और सारै अस्सी वर्ष की हो चुकी थी। मेरा अनुमान है कि वे इस नतीजे पर आ चुके थे कि अब उन्हें कोई सन्तान उत्पन्न नहीं होगी। संभवतः सारै यह अनुमान लगा रही थी कि परमेश्वर भी यही चाहता होगा, क्योंकि उन दिनों में यही प्रथा थी।“ यद्यति उप दिनों की यह प्रथा रही होगी परन्तु यह परमेश्वर के काम करने के विपरीत तरीका था। यदि हम ऐसा सोचते हैं कि ऐसा बाइबल में लिख हुआ है इसलिए यह परमेश्वर इसे अनुमति देता है, तो आप गलत सोच रहे हैं। बाइबल परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित है इसलिए इसके सारे अभिलेख और घटनाएं सच्ची है, परन्तु बाइबल में ऐसी बहुत सी बातें और कुरीतियाँ हैं जिन्हें परमेश्वर अनुमति नहीं देता है।

मित्रों, यहाँ पर जो नैतिक पहलू आप और मैं पढ़ते हैं ऐतिहासिक लेख में बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। अब्राम और सारै कसदियों के ऊर देश में पले-बढ़े थे, जहाँ पर यह साधारण प्रथा थी। और यहाँ पर नैतिकता नैतिकता के दृष्टिकोण से देखें तो उन लोगों के लिए यह कोई बहुत गलत है नहीं थी। सबसे भयानक बात तो यहाँ पर यह है कि उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया। अब्राम द्वारा सारै की दासी हाजिरा को अपनी रखैल बनाने की जो गलती उन्होंने की वह पाप था। और परमेश्वर ने उसे इसी दृष्टिकोण से देखा। लेकिन आज हम उसे उल्ट कर देखते हैं और कहते हैं कि रखैल रखना पाप है, लेकिन हम अविश्वास पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते हैं। फिर भी मित्रों यहाँ अविश्वास ही सबसे बड़ा पाप था; यानी, यह दूसरे पापों से कहीं ज़्यादा काला था।

हाजिरा का भाग जाना
आगे पद 6 में हम पढ़ते हैं।
उत्पत्ति 16:6 “अब्राम ने सारै से कहा, “देख, तेरी दासी तेरे वश में है; जैसा तुझे भला लगे वैसा ही उसके साथ कर।” तब सारै उसको दुःख देने लगी, और वह उसके सामने से भाग गई।“

हाजिरा निकल पड़ी, वह भाग गई, और इसका सीधा सा अर्थ था हाजिरा की मृत्यु और उस बालक की भी जिसे वह रखी हुई थी। आगे पद 7 में हम देखते हैं लिखा है।

उत्पत्ति 16:7 “तब यहोवा के दूत ने उसको जंगल में शूर के मार्ग पर जल के एक सोते के पास पाकर कहा।“

मुझे पूरा विश्वास है मित्रों कि यह यहोवा का दूत कोई और नहीं पर देहधारण से पूर्व का प्रभु यीशु ही है। यही उसकी एक पहिचार या चरित्र है। वह सदा ही खोए और भटके हुओं को खोजता रहता है। उनकी सुधी लेता है। हाजिरा अपने घर से बहुत दूर निकल गई थी। आगे पद 8 से 10 में लिखा है।

उत्पत्ति 16:8 “हे सारै की दासी हाजिरा, तू कहाँ से आती और कहाँ को जाती है?” उसने कहा, “मैं अपनी स्वामिनी सारै के सामने से भाग आई हूँ।”

उत्पत्ति 16:9 “यहोवा के दूत ने उससे कहा, “अपनी स्वामिनी के पास लौट जा और उसके वश में रह।”
उत्पत्ति 16:10 “और यहोवा के दूत ने उससे यह भी कहा, “मैं तेरे वंश को बहुत बढ़ाऊँगा, यहाँ तक कि बहुतायत के कारण उसकी गणना न हो सकेगी।”

गलातियों की पत्री के चौथे अध्याय में पौलुस इस घटना को उदाहरण या दृष्टान्त के रूप में उपयोग करता है। वहाँ वह हाजिरा और उसकी सन्तान को सीनै पर्वत के रूप में प्रस्तुम करता है जहाँ मूसा की व्यवस्था दी गई थी। और वह व्यवस्था की वैधता और दासत्वता की बातेें भी करता है। तब वह सारै के विषय में कहता है कि वह स्वतंत्र है। यहाँ पर कहने का तात्पर्य है कि जो अब्राम की है वह तो सारै ही थी जो उसकी पत्नी थी। आज बहुत से लोग इसे विभिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं। और वे व्यवस्था के अधीन होना चाहते हैं। लेकिन मेरे प्रिय मित्रों मैं आपको बताना चाहता हूँ कि, हम जो विश्वासी हैं, यीशु मसीह से जुड़ चुके हैं। कलीसिया मसीही की दुल्हन है, पौलुस प्रेरित कहते हैं, “यह पवित्र कुँवारी के जैसे है, जो एक दिन मसीह की दुल्हन बन जाएगी। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आपको व्यवस्था के अधीन नहीं होना चाहिए। क्योंकि व्यवस्था एक दूसरी चीज़ है जिसे मुझे और आपको लेने की आवश्यकता नहीं है। यह हाजिरा के जैसा है।“ और यही विषय है जिसे पौलुस प्रेरित गलातिया के विश्वासियों को बता रहे हैं।
यह न सिर्फ़ सारै के लिए बहुत दुख की बात होने वाली है, (यद्यपि उसके लिए तो यह पहले ही हो चुकी है), बल्कि बाद में अब्राम के लिए तो यह और भी बड़ा दुख होगा। हाजिरा अब एक लड़के को जन्म देने के लिए वापस आती है, वह पुत्र जो अब्राम का बेटा है। तब पद 11 और 12 में लिखा है।

उत्पत्ति 16:11 “और यहोवा के दूत ने उससे कहा, “देख, तू गर्भवती है, और पुत्र जनेगी; तू उसका नाम इश्माएल रखना, क्योंकि यहोवा ने तेरे दुःख का हाल सुन लिया है।“
उत्पत्ति 16:12 “और वह मनुष्य बनैले गदहे के समान होगा, उसका हाथ सब के विरुद्ध उठेगा और सब के हाथ उसके विरुद्ध उठेंगे; और वह अपने सब भाई-बन्धुओं के मध्य में बसा रहेगा।”

क्या आप ने इस पद को मध्य एशिया के पिछले 4000 वर्षों के इतिहास की धटनाओं की रौशनी में कभी देखा है? आज वहाँ क्या चल रहा है। क्या हाल है? इश्माएल के वंशज बनैले गदहे के समान हो चुके हैं। वे जंगली मनुष्य हैं – यह बेडुईन जाति की कहानी है जो शताब्दियों से मरूभूमि (निर्जन) में रहते आए हैं। और यह परमेश्वर की भविष्यद्वाणी का पूर्ण होना है, जो उसने की थी। वे आपसे कहेंगे कि वे अब्राम की सन्तान हैं, परन्तु वे इश्माएल की भी सन्तान हैं। वे इश्माएल के द्वारा से, अब्राम के भी संबंधी हुए या उसके साथ जुड़ गए हैं।

अब हम आगे बढ़ते हुए उत्प्त्ति 16 अध्याय के पद 13 और 14 को देखते हैं लिखा है।
उत्पत्ति 16:13 “तब उसने यहोवा का नाम जिसने उससे बातें की थीं, अत्ताएलरोई रखकर कहा, “क्या मैं यहाँ भी उसको जाते हुए देखने पाई और देखने के बाद भी जीवित रही?”
उत्पत्ति 16:14 “इस कारण उस कुएँ का नाम लहैरोई कुआँ पड़ा; वह तो कादेश और बेरेद के बीच में है।

देखिए मित्रों परमेश्वर हाजिरा पर कितना अनुग्रहकारी रहा! यह उसका पाप नहीं था, इस कारण परमेश्वर उसके साथ नम्रता से व्यवहार करता है। मैं आप से पुनः कहना चाहता हूँ कि वह दूत और कोई नहीं पर देहधारण से पूर्व का प्रभु यीशु मसीह ही है जो फिर से खोए हुओं को ढ़ंढने निकल पड़ता है। वह एक चरवाहे के समान है जो उसके पास आनन्द का समाचार लाता है।

जैसा हम ने पढ़ा, “तब उसने यहोवा का नाम जिसने उससे बातें की थीं, और कहा, “क्या मैं यहाँ भी उसको जाते हुए देखने पाई और देखने के बाद भी जीवित रही?” यह उसके लिए एक नई बात थी जो वह पहले नहीं जानती थी। मिस्री लोगों की परमेश्वर के बारे में बहुत आदिकालीन विचारधारा और अचधारणा थी। क्योंकि वह कहती है, “क्या मैं यहाँ भी उसको जाते हुए देखने पाई और देखने के बाद भी जीवित रही?” वह इस सच्चाई से अत्यंत अभिभूत हो गई कि उसने परमेश्वर को देखा है। आज यह धारणा हमारे लिए बहुत आकर्षक नहीं है क्योंकि परमेश्वर के बारे में हमारी अवधाण या विचार उससे बहुत ऊँची है। पर एक मिनट रूकें! मित्रों, शायद हम भी परमेश्वर के बारे में जानने में उतने ही पीछे हैं जितना हाजिरा थी। एक छोटे, सीमित इंसान के लिए अनंत परमेश्वर के बारे में सोचना असंभव और कठिन है, और हम भी उसेें जानने और समझने में पीछे रह जाते हैं। मेरे विचार में “परमेश्वर को जानना” ही एक ऐसा विषय है जो अनन्तकाल तक हमें व्यस्त रखेगा। वह जो प्रत्येक व्यक्ति के अध्ययन के योग्य हैं, परमेश्वर को जानना एक ऐसी चीज़ है जो मनुष्य के पद को अनन्तकाल तक के लिए गौरव प्रदान करेगा। तब आगे पद 15 और 16 में लिखा है।

उत्पत्ति 16:15 “हाजिरा को अब्राम के द्वारा एक पुत्र हुआ; और अब्राम ने अपने पुत्र का नाम, जिसे हाजिरा ने जन्म दिया था, इश्माएल रखा।“
उत्पत्ति 16:16 “जब हाजिरा ने अब्राम के द्वारा इश्माएल को जन्म दिया उस समय अब्राम छियासी वर्ष का था।“

ध्यान दें मित्रों कि इश्माएल अब्राम की सन्तान था। तथा अब्राम अब छयासी वर्ष का हो चुका था।

अब्राम की परिक्षा
मित्रों इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, मैं उन सात अवसरों को आप के साथ दोहराना चाहता हूँ जब परमेश्वर अब्राम के सामने उपस्थित हुआ। उन में से पांच हम पहले ही देख सुके हैं। अब्राम के जीवन में निश्चित तौर पर कुछ असफलताएँ रही है पर साथ ही वह सफल भी रहा था। वास्तव में परमेश्वर ने अब्राम की सात परिक्षाएँ की थीं। उसमें सबसे पहली है,

(1) कि परमेश्वर ने अब्राम को कसदियों के ऊर देश से बुलाया, जहाँ उसका घर था और अब्राम ने इस बुलाहट को अधूरा स्वीकार किया। उसका विश्वास कमज़ोर और सिद्ध नहीं था, लेकिन कम से कम वह, वहाँ से निकल पड़ा। अन्ततः अब्राम कनान देश में सुरक्षित पहुँच गया और परमेश्वर ने उसे आशीष दी।

(2) कनान में आकाल पड़ा और अब्राम कनान से मिश्र भाग गया। वहाँ उस ने धन-सम्पत्ति और हाजिरा को प्राप्त किया जो उसके लिए ठोकर का कारण ठहरे।

(3) अब्राम की धन-सम्पत्ति उसके लिए परिक्षा का कारण ठहरीं। आज भी धन-सम्पत्ति बहुतों के लिए ठोकर का कारण होती है। मैं सदा यही चाहता रहा हूँ कि मैं जिन परिक्षाओं पड़ा हूँ, प्रभु मुझे उनसे कुछ अलग परिक्षाओं में पड़ने देता तो अच्छा होता। परन्तु मैं सोचता हूँ कि धन के मामले में वह मुझ पर और शायद किसी पर भरोसा नहीं कर सकता। उस समय भी अब्राम परमेश्वर को नहीं भूला, वह निश्चय ही अपने भतीजे के प्रति उदार और विशाल हृदय रखता था। उसकी धन-संपत्ति ने उसे लूत से अलग कर दिया, और परमेश्वर ने दोबारा उसे दर्शन दिया।

(4) पूर्व के राजाओं को हराने के द्वारा से अब्राम को सामर्थ्य भी प्राप्त हुई। यह एक कठिन परिक्षा थी, क्योंकि वह अब विजेता बन चुका था। मेरे विचार में मलिकिसिदक से उसकी भेंट ने अब्राम को उसकी परिक्षा के लिए मजबूत बनाया, इस कारण वह युद्ध में जीती धन-संपत्ति का इन्कार कर सका। इसके बाद परमेश्वर अब्राम के सामने प्रगट हुआ और उसे प्रोत्साहित किया।

(5) परमेश्वर ने अब्राम को उसकी पत्नी सारै से पुत्र देने में देरी की। अब्राम अधीर हो गया, और सारै के कहने पर परमेश्वर के कार्य को अपने हाथों में ले लिया और परमेश्वर की इच्छा के बाहर चला गया। इसके परिणामस्वरूप इश्माएल का जन्म हुआ। आज भी अरब देशों के साथ इस्राएल का युद्ध चला आ रहा है और मेरे विचार में प्रभु यीशु के दूसरे आगमन तक ऐसा ही चलता रहेगा।

अब्राहम की छठवीं परिक्षा हमें 18वें अध्याय में सदोम और अमोरा के विनाश के समय देखने को मिलती है तथा सातवीं परिक्षा बाइसवें अध्याय में उसके पुत्र इसहाक के बलिदान के समय की जाती है।

इसके साथ ही अध्याय 16 समाप्त होता है मित्रों, अब हम अध्याय 17 से अपना मनन जारी रखेंगे। जिसका विषय है।

अध्याय 17

विषय: परमेश्वर अब्राम को नया नाम देता है, अब्राहम, अब्राहम के साथ परमेश्वर की वाचा, इश्माएल
बहुत से लोगों का मानना है कि उत्पत्ति की पुस्तक का 17 अध्याय एक असाधारण अध्याय है। यहाँ पर परमेश्वर अब्राम से वाचा बाँधता और उसे पुत्र देने की प्रतिज्ञा को दोहराता है। वह अब्राम से कहाता हैं कि इश्माएल वह पुत्र नहीं है जिसके लिए उसने प्रतिज्ञा की थी। एक प्रकार से यह अध्याय, उत्पत्ति की पुस्तक की कुंजी है, और यह पूरे बाइबल की भी कुंजी हो सकता है। अब्राम के साथ परमेश्वर की वाचा, दो बातों पर केन्द्रित है, उसका बीज या सन्तान और दूसरा भूमि या देश। परमेश्वर ने स्वयं को अब्राम पर एक नए नाम के साथ प्रकट किया, “एल-शदाई“ जिसका अर्थ है सर्वसामर्थी परमेश्वर, और साथ ही वह अब्राम को भी एक नया नाम देता है, अब्राहम। अब्राम का अर्थ है – “उन्नत पिता” और अब्राहम का अर्थ है “बहुतों का पिता।“ इश्माएल वह पुत्र नहीं था, जिसकी परमेश्वर ने अब्राहम को प्रतिज्ञा किया था, यही बात इस अध्याय हमें स्पष्ट की गई है। तो आइए हम आगे बढ़ें, और पढ़ते हैं अध्याय 17 का पहला पद लिखा है।
परमेश्वर अब्राहम को नया नाम देता है।

उत्पत्ति 17:1 “जब अब्राम निन्यानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, “मैं सर्वशक्तिमान् ईश्वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा।“

मित्रों आप विचार कर के देखें, जब इश्माएल का जन्म हुआ, उस समय अब्राम की आयु छियासी वर्ष की थी, और उसके चौदह वर्ष के बाद इसहाक जन्मा।
लिखा है, “परमेश्वर अब्राम पर प्रगट हुआ और उससे कहा, “मैं सर्वशक्तिमान् ईश्वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा।“ परमेश्वर कहता है, “मैं एल-शदाई, अर्थात् सर्वसामर्थी परमेश्वर हूँ।“ यह एक नया नाम है। जो परमेश्वर ने अब्राहम को बताया। तब पद 2 में हम पढ़ते हैं।

उत्पत्ति 17:2 मैं तेरे साथ वाचा बाँधूँगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊँगा।”

मित्रों इसी अध्याय में तेरह बार “वाचा“ शब्द का उपयोग किया गया है। इन 27 पदों में तेरह बार उपयोग किए जाने का मतलब यह है कि निश्चय ही परमेश्वर केवल वाचा के बारे में बात कर रहा हैं। यह अब्राम को परमेश्वर का पाँचवां दर्शन है। इस बार परमेश्वर सिर्फ वाचा बाँधने के लिए नहीं परन्तु पुत्र देने की प्रतिज्ञा को भरी पुनः निश्चित करने के लिए आते हैं, जो उसने अब्राम की थी। जो इस बालक इश्माएल को इससे बाहर करता है।

रोमियों की पत्री के चौथे में रोमियों 4:19 में पौलुस कहता है, “वह जो एक सौ वर्ष का था, अपने मरे हुए से शरीर और सारा के गर्भ की मरी हुई की सी दशा जानकर भी विश्वास में निर्बल न हुआ।“

सारै की कोख वास्तव में एक कब्र थी – वह मृम्यु का स्थान था। परन्तु उसी मृम्यु से जीवन लिकल का आता है। उससे ही इसहाक का जन्म हुआ। पौलुस चौथे अध्याय को समाप्त करते हुए प्रभरु यीशु मसीह के बारे में कहता है, रोमियों 4:25, “वह हमारे अपराधों के लिये पकड़वाया गया, और हमारे धर्मी ठहरने के लिये जिलाया भी गया।“ मृत्यु में से जीवन का उद्गम – यही प्रतिज्ञा अब परमेश्वर मनुष्यों से कर रहा है। अब अब्राम 99 और सारै 89 वर्ष के हो चुके हैं। जब इसहाक का जन्म हुआ तब अब्राहम 100 और सारै 90 वर्ष की थी। आगे पद 3 और 4 में हम पढ़ते हैं।
उत्पत्ति 17:3 “तब अब्राम मुँह के बल गिरा: और परमेश्वर उस से यों बातें करता गया।“
उत्पत्ति 17:4 “देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा।“

परमेश्वर अब्राम से कहता हैं कि वह जातियों के समूह का मूलपिता होगा। मुझे लगता है, ऐसा कहा जाना चाहिए था कि जितना हम जानते हैं, इस पृथ्वी पर जीवन जीने वाले सभी मनुष्य में से इसकी सब से अधिक सन्तान होंगी। आप ज़रा सोच कर देखें पिछले चार हज़ार वर्षो तक केवल दो ही महान वंश या पीढ़ी बनी रही हैं, एक इश्माएल की और दूसरा इसहाक की तथा प्रत्येक में करोंड़ों लोग शामिल हैं। यह एक अद्भुत परिवार है! एक अच्छी घर वापसी। साथ ही इस में आत्मिक बीज भी है, जैसे हम मसीही जो प्रभु यीशु मसीह में अब्राहम की सन्तान कहलाते है। रोमियों 4:16 पद में पौलुस अब्राम के विषय में कहता है, “… जो हम सबका पिता है।“ अर्थात विश्वासियों का, इस्राएल जाति का और साथ ही अरब देश के लोगों का भी। मित्रों कि इन करोड़ों लोगों के बारे में ज़रा विचार कीजिए जिनके बारे में परमेश्वर यहाँ कहता हैं, “मैं तुझे बहुत सी जातियों का मूलपिता ठहराऊँगा,“ और उसने यह प्रतिज्ञा पूरा भी की। तब आगे पद में लिखा है।

उत्पत्ति 17:5 “इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है।“

मित्रों, अब्राम का अर्थ होता है, “उच्च पिता“ या “उन्नत पिता।“ तथा अब्राहम का अर्थ होता है “बहुतों का पिता।“

अब्राम के विश्वास के संदर्भ में मित्रों, मैं उदाहरण के तौर पर एक कहानी बताना चाहता हूँ। मान लीजिए कि एक सुबह अब्राम और सारै उठते हैं और रोज़ की तरह अपने तम्बू के चारों ओर जो हेब्रोन में है, कुछ काम कर रहे थे तब अचानक ही व्यापारियों का एक दल उसके क्षेत्र में प्रवेश करता है, और अब्राम उनसे मिलने के लिए उनके पास जाता है, और वे जानना चाहते हैं कि क्या अब्राम उनके ऊँटों को पानी पिला सकता है?

मित्रों, उन दिनों में इस प्रकार का अतिथि सत्कार करनेवाले बहुत लोग हुआ करते थे। यह बिल्कुल ही रोचक लगता है। हम लोग गुफ़ा में रहनेवाले मानव के बारेमें बातें करते हैं कि वह कितना भयानक रहा होगा! क्या मैं आप से कह सकता हँू कि, उन दिनों में कोई भी आगन्तुक या राहगीर किसी नगर या देश से तब तक होकर नहीं जा सकता था, जब तक कि कोई उसके लिए अपने घर का द्वार न खोल दे और उसका स्वागत न कर। परन्तु यदि आज आप किसी शहर मंे जाएँ, तो यह संभव ही नहीं है कि कोई आपको अपने घर के अन्दर ले जाए और एक गिलास पानी पिलाए। यद्यपि जब कि बहुत से मसीही शहरों में पाए जाते हैं, फिर भी यह असंभव लगता है। आज हमारी संस्कृति बिल्कुल बदल गई है, और निश्चित तौर से आज हम अतिथि – सत्कार करना भूल चुके हैं, जैसे कि पहले के दिनों में हमारे पूर्वज किया करते थे।

अब्राम उनसे मिलने के लिए जाता है और कहता है, “यदि मुझ पर कृपादृष्टि है तो अपने दास के पास से चले न जाना। मैं कुछ रोटियाँ ले आऊँगा। क्या आप सब थोड़ी देर ठहर सकते हैं?“ उन्होंने कहा, “नहीं, हम सब इस समय व्यापार के लिए निकले हैं और हमें जल्दी ही मिस्र में पहुँचना है।“

उनमें से एक व्यक्ति कहता है कि “मेरा नाम अली है,“ और दूसरा कहता है, “मेरा नाम अली बाबा है, पर तुम्हारा नाम क्या है?“ जब अब्राम ने उत्तर दिया कि “मेरा नाम उच्च पिता है।” तब वे लोग आश्चर्यचकित हुए और कहा, इसके तो एक भी बेटा या बेटी नहीं है तब भी इसका नाम अब्राम, अर्थात अनेको का पिता। वे लोग हँसते हुए बोले, “तुम यह कहना चाहते हो कि तुम्हारे एक भी सन्तान नहीं है, और तुम्हारा नाम अब्राम है? तुम इस तरह संसार में कैसे तुम्हारा नाम अब्राम हो सकते है।“ और वे हँसते हुए वहाँ से चले गए और रास्ते भर उसका मजाक बनाते रहे।

छः महिने बाद वे फिर उसके पास आते हैं। जब वह पुनः उनसे मिलने के लिए जा रहा था, तब उन्होंने फिर उस पर हँसना आरंभ कर दिया। कहिए “उन्नत पिता“ कैसे हो। परन्तु अब्राम उनसे कहा है, “अब मेरा नाम “उन्नत पिता” नहीं रहा। अब मेरा नाम “बहुतों का पिता” है। तब व्यापारियों ने कहा, “हो सकता है कि इसके पास जुड़वाँ बच्चे हों।“ जब अब्राम ने उन्हें बताया कि ऐसा नहीं है, अभी भी मेरे पास सन्तान नहीं है, तब वे फिर से हँसने लगे। उन्होनंे उससे कहा, “यह इतनी बेतुकी बात कैसे कर सकता है?“

मित्रों, यहाँ पर एक व्यक्ति है, जो सन्तान उत्पन्न करने के पहले ही पिता बना दिया गया था। अब्राहम उस समय भी, विश्वास के द्वारा से अब्राहम था, अर्थात बहुतों का पिता। परन्तु चार हज़ार साल के बाद, जहाँ आप और मैं आज बैठते हैं, अब हम कह सकते हैं कि परमेश्वर ने इसे कर दिखाया। हो सकता है कि उसका नाम सुन कर आप को समझ न आया हो परन्तु यह याद रखें कि वह अभी भी अब्राहम ही है, अर्थात “बहुतों का पिता“ है।
आइए दोस्तों हम परमेश्वर को धन्यवाद दें कि वह असंभव को संभव करता है, जो चीजें नहीं है उन चीजों का नाम ऐसे लेता है जैसे वे हैं। आइए हम उसे धन्यवाद देते हुए प्रार्थना करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

आज के पैसेज से आपने जो मुख्य बात सीखी, उसे लिखें।

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