उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 1:26 - 1:31
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 1:26 – 1:31
कार्यक्रम : #0015

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नमस्कार मित्रों, एक बार पुनः आप सभी का आप के अपने बाइबल अध्ययन सत्यवचन में स्वागत है। मुझे आशा है कि आप सृष्टि की रचना के भेद को अब समझ गए होंगे कि कैसे परमेश्वर ने किसी सामग्री के बिना सृष्टि की रचना किया था और उसके बाद कैसे उसने उसी बिगड़ी हुई रचना को फिर से बना का रूप प्रदान किया। आइए अब हम देखते हैं सब से महत्वपूर्ण रचना को जो है।

मनुष्य की रचना

आइए हम पढ़ें उत्पत्ति अध्याय एक का पद छब्बीस लिखा है।

उत्पत्ति 1:26 “फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।”

इस पद को पढ़ने के पश्चात् प्रश्न उठता है कि मनुष्य की सृष्टि कैसे हुई? इस विषय पर उत्पत्ति दो हमें बताता है। परन्तु वचन में लिखा है, “सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।” परमेश्वर ने मनुष्य को समस्त पृथ्वी पर अधिकार दिया। इसका मतलब यह नहीं कि परमेश्वर ने आदम को अदन की वाटिका महिमामण्डित माली बना रख था। यह कोई साधारण बात नहीं थी, क्योंकि परमेश्वर ने आदम को एक अद्भुत अधिकार दिया था, जिसे हम आगे देखेंगे। परमेश्वर आदम से कहता हैं कि उसे इस सृष्टि के लिए कुछ निश्चित कार्य करना है जिस पर परमेश्वर ने उसे अधिकार दिया। तब आगे पद 27 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:27 “तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उस ने मनुष्यों की सृष्टि की।”

मित्रों, यहाँ पर हम मनुष्य की सृष्टि का एक साधारण सत्य पाते हैं, और इस पद में हम तीसरी बार बारा शब्द को पाते हैं। जिसका अर्थ है बिना किसी तत्व के कुछ उत्पन्न करना। इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य की रचना की जाती है और वह एक नया प्राणी है। बारा वही शब्द है जो हमें उत्पत्ति पहले अध्याय के प्रथम पद में पढ़ने को मिलता हैः “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ हम देखते हैं कि परमेश्वर ने सर्वप्रथम भौतिक विश्व की रचना की उसके पश्चात् जीवित प्राणियों की। उत्पत्ति 1:21 में हम पढ़ते हैं, इसलिए परमेश्वर ने जाति-जाति के बड़े-बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते-फिरते हैं…“ अब आगे यहाँ पर हम देखते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की: “तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया।“ परमेश्वर हमें अगले अध्याय में मनुष्य की सृष्टि के बारे में विस्तृत जानकारी देता है, और हम इससे देख सकते हैं कि परमेश्वर ने ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में बहुत गहराई से सब कुछ प्रगट नहीं करता है। “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की“, उसने हमें केवल यही जानकारी दी है, और हम केवल इतना ही जानते हैं। वह हमें इसकी विस्तृत जानकारी दे सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया। परमेश्वर आगे जा कर अपनी केवल एक ही रचना के बारे में विस्तार से चर्चा करता है, और वह है मनुष्य की रचना। आप जानते हैं ऐसा क्यों? क्योंकि यह विवरण केवल मनुष्यों के लिए ही लिखा गया है, परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य अपने उत्पत्ति को जाने। यह कुछ इस प्रकार है जैसे परमेश्वर कह रहार हो, “मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी सृष्टि पर विशेश ध्यान दो और जगत की सृष्टि के बारे में काल्पनिक न बनो।“ यह पद हमें कुछ अद्भुत बातें बताता हैं।

लिखा है, “परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया।“ मित्रों, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह वचन परमेश्वर का एक महान कथन है। मैं इससे बढ़कर और अधिक इस बारे में नहीं कह सकता, क्योंकि यह एक अद्भुत बात है। इसका क्या अर्थ है? वास्तव में मनुष्य परमेश्वर के समान है, मैं सोचता हूँ परमेश्वर की त्रिएकता के समान है। कोई व्यक्ति कहेगा, मैं आप के कहने का मतलब जानता हूँ। आप कहना चाहते हैं, मनुष्य शारीरिक और मान्सिक और आत्मिक प्राणी है।“ जी हाँ, मैं इस बात पर विश्वास करता हूँ। 1 थिस्सलुनीकियों 5:23 में पौलुस प्रेरित इस प्रकार कहता हैं, “… और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोश सुरक्षित रहें।“ यद्यपि यह सही है फिर भी हम अगले अध्याय में इस के विषय में देखेंगे जब हम उस अध्याय में पहुँचेंगे, कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है? मुझे लगता है यह इस सच्चाई की ओर इशारा करता है कि मनुष्य एक व्यक्तित्व है, और व्यक्तित्व हाने के नाते उसमें आत्म चेतना है, और वह, वो है जो अपने निर्णय स्वयं लेता है। वह एक स्वतंत्र नैतिक घटक या माध्यम है। अंततः यही वह बात है जो मानव जाति के बारे में अनोखी है। मेरा मानना है कि जब परमेश्वर कहता है कि उसने मनुष्य को अपनी स्वरूप और समानता में बनाया है, तो उसका यही अर्थ है।

आगे पद 27 में लिखा है, “नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।” यह पद हमें इस बात की जानकारी नहीं देता है कि नर और नारी किस प्रकार बनाए गए थे। इस बात का खुलासा तब तक नहीं होत, जब तक हम दूसरे अध्याय में नहीं आ जाते हैं। इस कारण ही मैं कहता हूँ कि परमेश्वर हमें सृष्टि की रचना की विस्तृत जानकारी नहीं देना चाहता है जिस में हम वास करते हैं। और अगर वह चाहता तो इस संबंध में वह एक और अध्याय जोड़ सकता था। पर परमेश्वर सृष्टिकर्ता होने के अलावा हमें और कोई जानकारी नहीं देता है। यह बात हमें उस अत्यंत महत्वपूर्ण सच्चाई की ओर ले जाती है जो इब्रानियों की पत्री के 11:3 में दी गई है, “विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। पर यह नहीं कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।“ आज जो भी चीज़ें हम देखते हैं वे किसी वस्तु के बिना बनाई गई हैं, जो पहले कभी थी ही नहीं। परन्तु सृष्टि बिना किसी सामग्री के बनी है। किसी ने कहा कि आप इसे समझाइए। पर मित्रों मैं इसे समझा नहीं सकता। यहाँ तक कि विकासवाद भी इसे समझा नहीं सकता। क्रमिकविकास ने कभी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया कि कैसे कुछ नहीं से सब कुछ बनाया गया। क्रमिकविकास हमेशा ही एक छोटे से अमीबा या कोशिका, या कचरे, या कोई शैवाल या फिर पेड़ पर बैठे किसी प्राणी से आरंभ करता है। हमारे दिमाग में सदा किसी वस्तु से आरंभ करने की बात आती है, पर बाइबल कुछ नहीं या शून्य से आरंभ करती है। जैसा लिखा है “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।“ यह इस अध्याय का आश्चर्यजनक प्रकाशन है। तब आगे पद 28 में कहता है।

उत्पत्ति 1:28 “और परमेश्वर ने उनको आशीष दी, और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।”

हम यहाँ पर देखते हैं कि परमेश्वर ने अपनी इस निर्मित प्रणी अर्थात मानव को कुछ असामान्य योग्यता दी हैं। सर्वप्रथम वह मनष्य से कहता है, “फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ।“ और हम परमेश्वर को इसी बात को पुनः दोहराते तब सुनते हैं, जब वह स्त्री की रचना करता है। इस प्रकार से एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि परमेश्वर ही हमें यौन संबंध से परिचित कराता है। यहाँ एक रोचक बात है कि हमारे समय के लोग सोचते हैं कि उन्होंने ही यौन संबंध की खोज की है। परमेश्वर आरंभ में ही इस बात का उल्लेख करता है। वास्तव में परमेश्वर, मनुष्य को इस ब्रम्हाण में रखने के लिए चार मुख्य पद्धतियों का उपयोग करता है। पहला है, सीधे रचने के द्वारा, जिससे आदम की सृष्टि हुई। दूसरा है अप्रत्यक्ष रचलना के द्वारा, जिससे हव्वा की रचना हुई। तीसरा है, कुँवारी से जन्म के द्वारा, जिसके द्वारा प्रभु यीशु मसीह मानव रूप धारण किया। और चौथा है, सामान्य प्रजनन प्रक्रिया के द्वारा, जो हमारे आज के समय में प्रचलित है।

हमने निश्चित रूप से प्राकृतिक पीढ़ी को उस स्तर तक नीचे खींच ले आया है, जो परमेश्वर कभी नहीं चाहता था। परमेश्वर ने मनुष्य को प्रजनन के लिए भी बनाया था। यह एक बहुत ही अद्भुत महिमापूर्ण सच्चाई है। परमेश्वर ने मनुष्य को इसलिए नहीं रचा कि वह गन्दे, घिनौने, अश्लील व अपवित्र रूप से मनुष्य के वंश की उत्पत्ति करे। जैसा कि आज कल हम अनेक व्यक्तियों को देखते हैं, आज कई लोग गन्दी और अश्लील पुस्तकें लिखते हैं, और उसे साहित्य कहते हैं। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि कुछ आलोचक इसके विरोध में बातें कर रहे हैं, वे वही कह रहे हैं जो मैं लंबे समय से कहता आया हूँ, जिसे कला कहा जाता है, वह घिनौना और घृणित है, और वह कला है ही नहीं। यह अश्लीलता के अलावा कुछ नहीं है, और यह सिर्फ़ पैसे के लिए किया जाता है। परमेश्वर ने कभी नहीं चाहा था कि यौन संबंध इस प्रकार का हो।

परमेश्वर ने इस मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता में बनाया था। परमेश्वर जो स्वयं एक व्यक्ति है, उसने मनुष्य को एक अमर आत्मा दी है, और उसने मनुष्य को एक सच्चा और अच्छा व्यक्तित्व प्रदान किया है। हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि मनुष्य के पास विवेक है, उसके पास स्वतंत्र इच्छाशक्ति है, तथा उसके पास विभिन्न मौलिक और नैतिक ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। वह परमेश्वर का स्वरूप है।

परमेश्वर ने मनुष्य से कहा कि “फूलो-फलो और समस्त पृथ्वी मंे भर जाओ।“ यहाँ पर परमेश्वर मनुष्य को वंश उत्पत्ति द्वारा पृथ्वी पर भर जाने की बात कह रहा हैं। कृपया यहाँ पर शब्द “भर जाओ“ पर ध्यान करें। जिसका अर्थ है दोबारा से उत्पत्ति करके पृथ्वी को अपने वंश से भर दो। इस वचन से प्रगट होता है कि इस पृथ्वी पर मनुष्य से पूर्व अन्य प्राणी पर वास करते थे। ये प्राणी कोई भी हो, मनुष्य की सृष्टि से पहले ही विलीन हो चुके थे।

परमेश्वर मनुष्य से पृथ्वी को अपने वश में कर लेने के लिए भी कहता है। मैं सोचता हूँ कि यही मनुष्य और वैज्ञानिकों की खोज का आधार है जिसमें से हम प्रतिदिन कुछ न कुछ सीख रहे हैं। नीतिवचन 25:2 में लिखा है, परमेश्वर की महिमा, गुप्त रखने में है, परन्तु राजाओं की महिमा गुप्त बात का पता लगाने से होती है।“

परमेश्वर ने हीरा पृथ्वी की गहराई में छुपा रखा है और परमेश्वर ने सब प्रकार के खजाने भी वहीं छुपा रखा है जिसे मनुष्य को खोद कर निकालना पड़ता है। मेरा ऐसा मानना है कि आज ज्ञान के लिए भी यही बात लागू होती है। परमेश्वर चाहता है कि हम प्रयोगशाला में जा कर परख नली और सूक्ष्मदर्शी या माईक्रोस्कोप का उपयोग कर उन बातों की खोज करें परन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य एटम बम के साथ बाहर आता है, वी मानव सभ्यता को ही समाप्त करना चाहता है।

तथा साथ में मनुष्य को परमेश्वर का निदेर्श है, “उन पर अधिकार रखो।“ आदम अदन की वाटिका में केवल घास काटने वाला घसियारा नहीं था। मनुष्य पृथ्वी पर शासन करने के लिए रचा गया था। मेरा अनुमान है कि आदम मौसम को वैसे ही नियंत्रित कर सकता रहा होगा जैसे हम अपने कूलर, पंखे या एसी को नियंत्रित कर सकते हैं। वह इस पृथ्वी का शासक था। यही बात हम प्रभु यीशु मसीह में भी देखते हैं। जब वह इस पृथ्वी पर था, तब इस प्रकृति पर उसका नियंत्रण था। उसने तूफान से कहा और वह थम गया। वह पॉच रोटी और दो मछली से बड़ी भीड़ को भोजन करा सकता था। मेरा ऐसा विश्वास है कि पाप में गिरने से पहले आदम भी ऐसा करने के योग्य था। परन्तु पाप में गिरने के बाद उसने वह अधिकार और नियंत्रण खो दिया जो परमेश्वर ने उसे दिया था। तब आगे पद 29 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:29 “फिर परमेश्वर ने उनसे कहा, “सुनो, जितने बीजवाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं।“

इस वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ में परमेश्वर ने मनुष्य को शाकाहारी बनाया था। परन्तु जल-प्रलय के पश्चात् मनुष्य माँसाहारी बन गया। इसके पहले वह फल-फूल और कन्दमूल खाया करता था। तब आगे पद 30 और 31 में लिखा है।

उत्पत्ति 1:30 “और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले जन्तु हैं, जिन में जीवन का प्राण है, उन सब के खाने के लिये मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं,” और वैसा ही हो गया।“

उत्पत्ति 1:31 “तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवाँ दिन हो गया।“

इस पद के साथ ही पहला अध्याय समाप्त होता है। अच्छा होगा कि हम इस अध्याय से कुछ मुख्य बातों को फिर से दोहराएं। सब से पहली बात यह है कि परमेश्वर का नाम इस अध्याय में 32 बार उपयोग किया गया है। ध्यान रखें मित्रों कि बाइबल इस बात को साबित करने को कोई प्रयास नहीं करती है कि परमेश्वर है। पर ऐसा क्यों? क्योंकि बाइबल भजन संहिता 14:1 के अनुसार यह मानती है कि, मूर्ख ने अपने मन में कहा है, कोई परमेश्वर है ही नहीं।“ बाइबल परमेश्वर के असतित्व को मान कर चलती है।

बाइबल एक ऐसी पुस्तक है जो आत्मिक, धार्मिक, और पाप से छुटकारे अर्थात मोक्ष या उद्धार की सच्चाई को प्रगट करती है, जो केवल विश्वास के द्वारा हम ग्रहण कर सकते हैं। हमारे पास एक सच्चाई है कि परमेश्वर ही सृष्टि का रचनाकार है।

इस पहले अध्याय में हम परमेश्वर की त्रिएकता, सामर्थ्य और व्यक्तित्व को देखते हैं। यह वही है जो पौलुस ने रोमियों की पत्री 1:20 में कहा था, उसके अनदेखे गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं, यहाँ तक कि वे निरुत्तर हैं।“ प्रश्न उठता है कि वे स्पष्ट रूप से कैसे दिखाई देते हैं? उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व को, उसकी रचना या सृष्टि के द्वारा ही समझा जा सकता है, जिसे हम स्पष्ट रूप से देखते हैं। इसलिए उनके पास कोई भी बहाना नहीं है। मित्रों, मैं आपको यहाँ पर स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि, परमेश्वर ने उस पर विश्वास करने आपको बाध्य किया है।

इस अध्याय में हम कुछ अन्य सच्चाई पर भी विचार करेंगे। यह अनेक-ईश्वरवाद या एक से अधिक ईश्वर के अस्तित्व का इन्कार करता है। एक परमेश्वर ही सृष्टिकर्त्ता है। दूसरा यह तत्व की अमरता का इन्कार करता है। इस अध्याय का पहला शब्द है, “आदि में“ या आरंभ में। इस प्रकार सबका आरंभ किया गया है। इस तथ्य के बाद भी सच्चाई यह है कि एक समय था जब वैज्ञानिक तत्व की अमरता पर बात किया करते थे। तीसरी बात, यह अध्याय सर्वेईश्वरवाद का इन्कार करता है, जो सारे जगत को ईश्वर मानता है। उनका मानना है कि परमेश्वर सभी वस्तुओं के पहले हैं और वह स्वयं वस्तु में नहीं हैं। चौथी बात, यह भाग्यवाद या दैववाद पर विश्वास नहीं करता है। परमेश्वर अपनी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार कार्य करता है।

अंततः अध्याय एक में चार उल्लेखनीय बातें हैं

(1) आज्ञा

(2) प्रगति

(3) तत्परता

(4) परिपूर्णता

आइए मित्रों हम प्रार्थना के साथ अध्ययन का समापन करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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