उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 12:1 - 12:3
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 12:1 – 12:3
कार्यक्रम : #0030

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प्रिय मित्रों, प्रभु यीशु के नाम में आप सभों को नमस्कार!
इस बाइबल अध्ययन कार्यक्रम में आप सभी दर्शकों का स्वागत है। मैं आशा करता हूँ कि आप सब कुशलपूर्वक हैं, और आज के अध्ययन के लिए तैयार हैं। आपको याद होगा कि इन दिनों हम उत्पत्ति की पुस्तक से अध्ययन कर रहे हैं। और पिछले अध्याय में हमने अध्याय 11 को समाप्त किया है, तो आज का अध्ययन हम अध्याय 12 से आरंभ करेंगे। और सर्वप्रथम हम परमेश्वर की बुलाहट और अब्राहम को दिए गए वायदों के विषय में देखेंगे।

विषय: अब्राहम को परमेश्वर की बुलाहट और प्रतिज्ञा, अब्राहम का प्रत्युत्तर, अब्राहम का विश्वास में चूक जाना।

उत्पत्ति की पुस्तक का यह अध्याय हमें उसके महान विभाजन के दूसरी तरफ ले आता है जो उसे दो भागों में विभाजित करती है। यहाँ वातावर्ण और माहोल बिलकुल विपरीत हो जाता है और हमें अपनी रफतार को धीमी करना होगा। यहाँ पर महत्व अब घटनाओं और महान घटनाओं से हट कर व्यक्तियों पर आ जाता है – उन में सभी महान व्यक्ति नहीं थे परन्तु उन में से सभी महत्वपूर्ण अवश्य थे। उत्पत्ति में ऐसे 4 मनुष्य हैं और हम अन्य व्यक्तियों को हम बाइबल की अन्य पुस्तकों में देखेंगे।

उत्पत्ति के पहले 11 अध्यायों में हमने 4 महान घटनाओं को देखा है: सृष्टि की रचना, मनुष्य का पाप में गिरना, जलप्रलय और बाबेल का गुम्मत। इन सभी महान घटनाओं में आप परमेश्वर को पूरी मानवजाति के साथ व्यवहार और संर्घष करते देखते है। परमेश्वर, आदम और अब्राहम के अलावा, किसी और के सामने प्रकट नहीं हुआ। परमेश्वर पूरी मानव जाति के साथ संर्घष करते रहा। परन्तु अध्याय 12 में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। अब हमारे सामने चार व्यक्ति लाए जाएँगे। परमेश्वर अब घटनाओं से नहीं, बल्कि एक-एक व्यकित से व्यवहार करेगा और उस मनुष्य से वह एक राष्ट्र बनाएगा। पहले भाग मे ंहम अब्राहम को देखते हैं जो विश्वास का मनुष्य है (उत्पत्ति 12-23)। तब उसके बाद हम इसहाक को देखेंगे जो प्रिय पुत्र है (उत्पत्ति 24-26)। उसके बाद आता है याकूब जो चुना हुआ और अनुशासित किया गया पुत्र है (उत्पत्ति 27-36)। तथा उसके बाद आता है यूसुफ जो दुःख उठाने और महिमा पाने वाला पुत्र है(उत्पत्ति 37-50)। परमेश्वर के वचन को भली-भांती समझने के लिए ये चार पूर्वज बहुत महत्वपूर्ण है। हम उत्पत्ति के बचे हुए अध्ययन में इनके जीवन पर ही केन्द्रित रहेंगे।

आप देख सकते हैं कि परमेश्वर ने यह प्रगट कर दिया है कि वह अब इस जाति के साथ सामुहिक रूप से संर्घष नहीं करेगा। मनुष्य के पतन के बाद, हम कैन का बड़ा पाप देखते हैं। उसका बड़ा पाप क्या था? क्या हत्या थी नहीं, उसका घमंड। वह इसलिए क्रोधित हुआ क्योंकि दिल ही दिल में उसे अपने अन्दर उस भेंट पर घमंड था जो वह परमेश्वर के लिए लाया था। और जब उसकी भेंट ठुकरा दी गई जबकि उसके भाई की भेंट स्वीकार कर ली गई, तो उसे अपने भाई से नफ़रत हो गई। उसकी नफ़रत ने हत्या को जन्म दिया, और इन सब की जड़ केवल घमंड था। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि घमंड शैतान का भी पाप था। घमंड हमारे मन का पाप है।

जलप्रलय के समय, शरीर की अभिलाषा मुख्य पाप था। हमने देखा था कि मनुष्य के कार्य और विचार केवल उसके देह या शरीर को संतुष्ट करने वाले थे।

मनुष्यों का न्याय करने के लिए उस समय परमेश्वर को जलप्रलय लाना पड़ा क्योंकि उस समय केवल एक ही विश्वासी बचा हुआ था – नूह। अगर परमेश्वर एक और पीढ़ी के आने का इंतज़ार करते, तो वह पूरी मानवजाति को खो देता। परमेश्वर संसार के मनुष्यों के साथ धीरज रखा हुआ था। उसने 969 सालों तक इंतज़ार किया, जो मतूशेलह के पूरे जीवनकाल का समय है। मुझे यकीन है आप कहेंगे कि 969 साल किसी भी को अपना मन बदलने का मौका देने के लिए पर्याप्त समय हैं। परन्तु फिर भी मनुष्य, परमेश्वर की ओर फिरने के बजाय, ऐसी इच्छा प्रगट रहे थे जो परमेश्वर के विरूद्ध खुलेआम विद्रोह था। जलप्रलय के बाद बाबेल का गुम्मद प्रगट करता है कि “कोई भी परमेश्वर का खोजने वाला नहीं था।“

जब परमेश्वर ने अब्राहम को चुना, तब उसने विश्वास से भरे एक मनुष्य को चुना, जो किसी भी मनुष्य की तुल्ना में महान था। अब्राहम संसार के तीन महान धर्मो का वह आधार है: यहूदी, ईसाई और इस्लाम। आज आफ्रिका, एशिया मैं करोड़ो लोग हैं जो अब्राहम को जानते हैं पर उन्होंने संसार के अन्य प्रसिद्ध लोगों का नाम नहीं सुना है। किसी भी जगत प्रसिद्ध व्यक्ति की एक पहचान है कि उसे अनेक लोग जानते हैं, और अब्राहम उन में से एक है।

किसी महान व्यक्ति की दूसरी पहचान होती है उसका उत्तम चरित्र, उदार स्वभाव। क्या आप ने अब्राहम से अधिक नम्र स्वाभाव वाले किसी अन्य मनुष्य की कल्पना कर सकते है? मुझे शक है कि आज कोई ऐसा व्यक्ति जीवित भी होगा जो उसके समान काम करे जैसा अब्राहम ने किया था। जब अब्राहम और उसका भतीजा लूत, फिलिस्तीन की भमि पर वापस आए, तो उसने लूत से कहा कि वह जो भी हिस्सा चाहे चुन ले, और अब्राहम ने कहा कि जो बचेगा वह मेरा होगा।

तीसरी बात, एक महान व्यक्ति को एक महत्वपूर्ण समय में उपस्थि होना चाहिए। जैसा नेपोलियन ने कहा था, उसे किस्मत वाला मनुष्य होना चाहिए। एक मनुष्य और सही समय का मेल जीवन में उचित समय पर होना चाहिए। यह बात निश्चित रूप से अब्राहम के बारे में सत्य थी।

परमेश्वर ने स्वयं कहा था कि अब्राहम विश्वासी मनुष्य था। बाइबिल में अब्राहम के बारे में जो सबसे बड़ी बात कही गई है, वह यह है कि उसने परमेश्वर पर विश्वास किया। रोमियों 4ः3 में लिखा है, “पवित्रशास्त्र क्या कहता है? यह कि “अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिये धार्मिकता गिना गया।“ जैसे-जैसे हम उत्पत्ति की पुस्तक के इन अध्यायों को पढ़ेंगे, तो हम देखेंगे कि परमेश्वर अब्राहम का विश्वास बढ़ाने के लिए उसके जीवन भर में उसे सात बार दर्शन देता है। इसका मतलब यह नहीं होता कि वह सिद्ध मनुष्य था। सच तो यह है कि वह कई बार असफल हुआ। परमेश्वर ने चार बार उसकी परिक्षा की और वह चारों बार असफल रहा। परन्तु शमौन पतरस के समान, वह उठा, खुद को सम्भाला और फिर से आगे बढ़ा। मैं आप से कहना चाहता हूँ मित्रों, यदि परमेश्वर ने आप के जीवन और हृदय को स्पर्श किया है, तो आप भी गिर सकते हैं, पाप में पड़ सकते हैं, परन्तु आप निश्चित रूप से उठ का आगे बढ़ सकते हैं। फिर से आरंभ करत सकते है। जैसे हम आगे बढ़ेंगे तो हम अब्राहम के जीवन में इस बात को संपादित होते देखेंगे।

अब्राहम को परमेश्वर की बुलाहट और प्रतिज्ञा

मित्रों, अध्याय 12 के पहले तीन पदों में परमेश्वर अब्राहम (अब्राम) से तीन प्रतिज्ञाएँ करता है, और वास्तव में यही बाइबल का केन्द्र बिन्दु है। बाकी के बाइबल पद इनहीं तीन प्रतिज्ञाओं से पर्दा उठाते हैं।
आइए हम पढ़ें, उत्पत्ति 12 का 1 से 3, लिखा है।

उत्पत्ति 12:1 “यहोवा ने अब्राम से कहा, “अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।“
उत्पत्ति 12:2 “और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान् करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा।“
उत्पत्ति 12:3 “जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।”

मित्रों, इन तीन प्रतिज्ञाओं में से, सबसे पहली प्रतिज्ञा भूमि देने की थी। परमेश्वर ने कहा, “मैं तुम्हें एक भूमि (देश) दिखाने और देने जा रहा हूँ।“ और इसके दूसरे भाग की प्रतिज्ञा जाति से थी। “मैं तुझे एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और मैं तुझे आशीष दूँगा और तेरा नाम महान् करूँगा।“ उसने उससे यह भी प्रतिज्ञा किया कि, “जो तुझे आशीर्वाद देंगे, मैं उन्हें आशीष दूँगा, तथा जो तुझे शाप दें, मैं उसे शाप दूँगा।“ और तीसरी प्रतिज्ञा थी कि “पृथ्वी के सब घराने तुझमें आशीष पाएँगे।“ अब्राहम के लिए परमेश्वर की यही तीन प्रतिज्ञाएँ थी।

अब यहाँ पर प्रश्न उठता है, कि क्या परमेश्वर ने अब्राहम से, प्रतिज्ञा करके अच्छा किया? परमेश्वर ने निश्चय ही अब्राहम से एक महान जाति बनाई, और सम्भवतः यह जाति पृथ्वी की सभी जातियों में सबसे लम्बे समय तक बनी रही। और उनके साथ कोई भी जाति पूर्ण रूप से मेल नहीं खा सकती है।
दूसरी प्रतिज्ञा के बारे में आप का क्या विचार है, क्या अब्राहम सारी मानवजाति के लिए आशीष का करण ठहरा? जी हाँ! वह यीशु मसीह के द्वारा से सारे संसार के लोगों के लिए आशीश का कारण ठहरा है। और परमेश्वर का पूर्ण वचन भी हम तक अब्राहम के द्वारा ही पहुँचा है।

परमेश्वर ने अब्राहम से की अपनी सभी प्रतिज्ञाएं पूरी की, सिर्फ पहली वाली को छोड़कर। परमेश्वर ने अब्राहम से कहा कि “मैं तुम्हें एक देश (भूमि) देने जा रहा हूँ।“ और आज हमारे दिनांे में देखिए कि वहाँ उस भूमि पर क्या हो रहा है। वे बड़ी कोशिश के साथ इस भूमि को थामे रहना चाहते हैं परन्तु वे उसे प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए आप ऐसा न कहें कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा को पूरा नहीं किया या भलाई नहीं की। असल बात तो यह है कि परमेश्वर वही कर रहे हैं, जैसा उसने कहा था। एक दिन आएगा जब परमेश्वर इस्राएलियों को पुनः इस प्रतिज्ञा किए हुए देश में स्थापित करेगा।
(अब्राहम को दी गई भूमि का नक्शे का चित्र)

उन्होंने अब तक कभी उस पूरे भू-भाग पर कब्जा नहीं किया है जो परमेश्वर ने अब्राहम को दिया था। अपनी संपूर्ण सामर्थ्य और ताकत से भी वे मात्र तीस हजार वर्ग मील के क्षेत्र पर ही कब्जा कर पाए थे। वास्तव में परमेश्वर ने उन्हें तीन लाख वर्ग मील का क्षेत्रफल दिया है। उन्हें बहुत लम्बी दूरी पूरी करना है। परन्तु वे उसे परमेश्वर की शर्त के अनुसार उसके समय में ही उसे प्राप्त कर सकेंगे। इसलिए कोई भी देश या संयुक्त राष्ट्र भी इस्राएल के लिए कुछ नहीं कर सकता अर्थात् उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकता है। संसार का कोई भी महान् राष्ट्र उनके लिए कुछ नहीं कर सकता।

अब हम देखेंगे कि अब्राहम को की गई उन तीन प्रतिज्ञाओं की रौशनी में अब्राहम क्या करता है।

अब्राहम का प्रत्युत्र

उत्पत्ति 12:1 में हमने पढ़ा था, “तब यहोवा ने अब्राम से कहा।“ हम पवित्रशास्त्र की अन्य पुस्तकों के माध्यम से यह जानते हैं कि परमेश्वर ने अब्राहम को कसदियों के ऊर देश के में से बुलाया था। प्रेरितों के काम 7:2-4 में इस प्रकार लिखा है “… हमारा पिता अब्राहम हारान में बसने से पहले जब मेसोपोटामिया में था; तो तेजोमय परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया, और उससे कहा, ‘तू अपने देश और अपने कुटुम्ब से निकलकर उस देश में जा, जिसे मैं तुझे दिखाऊँगा।‘ तब वह कसदियों के देश से निकलकर हारान में जा बसा। उसके पिता की मृत्यु के बाद परमेश्वर ने उसको वहाँ से इस देश में लाकर बसाया जिसमें अब तुम बसते हो।“ मित्रों, अब्राहम ने यह बिना जाने कि उसे किधर जाना है, अपना घर छोड़ने, अपना कारोबार छोड़ने और ऊर नगर की विकसित सभ्यता को छोड़ने के द्वारा परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया। यद्यपि उसने ऐसा किया परन्तु यह उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता नहीं थी। क्योंकि हम पढ़ते हैं कि उसने अपने साथ कुछ परिवार के सदस्यों को ले लिया। उसने अपने साथ अपने पिता, तेरह को लिया, जबकि परमेश्वर ने ऐसा करने के लिए उसे मना किया था। मित्रों, आखिर, परमेश्वर क्यों चाहता था कि अब्राहम अपने नगर और परिवार के सदस्यों से दूर हो? हमें इसका उत्तर यहोशू की पुस्तक में मिलता है। यहोशू 24:2 पद में लिखा है, “… प्राचीन काल में अब्राहम और नाहोर का पिता तेरह, आदि तुम्हारे पुरखा परात महानद के उस पार रहते हुए दूसरे देवताओं की उपासना करते थे।“
मित्रों, अब हम पवित्रशास्त्र के वचनों के अनुसार चलेंते हुए अब्राम को अब्राहम कहकर संबोधित करेंगे। जब तक हम अध्याय 17 तक न पहुँच जाएँ क्योंकि परमेश्वर वहाँ उसक बदल कर अब्राम से अब्राहम कर देता है। आइए हम पढ़ें अत्पत्ति 12 को 4।

उत्पत्ति 12:4 “यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला, और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का था।“

लिखा है, “यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला।“ अब वह परमेश्वर द्वरा दिए गए निर्देश के अनुसार आगे बढ़ेगा।
यह भी लिखा है, “लूत भी उसके संग चला।“ ओह यह तो अपूर्ण आज्ञाकारिता है। वह अपने भतीजे को साथ ले कर जा रहा है। तब आगे पद 5 में लिखा है।

उत्पत्ति 12:5 “इस प्रकार अब्राम अपनी पत्नी सारै, और अपने भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया था, और जो प्राणी उन्होंने हारान में प्राप्त किए थे, सब को लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ गए।“

अब्राम अपनी पत्नी सारै को साथ लेकर चला, यह उसका अधिकार था और आवश्यक भी।

लेकिन हम आगे देखते हैं, “अपने भतीजे लूत, अपनी सारी धन संपत्ति जो उन्हांेने इकट्ठी की थी, और उन लोगों को जो उसने हारान में प्राप्त किए था उन्हें भी लिया।“ अब्राम ने हारान में जो समय बिताया था वो ध्यान में लेने योग्य है क्योंकि उसके कारण परमेश्वर की आशीषों को पाने मंे देर हुई। जब तक अब्राम हारान से पलिश्ती देश में चला नहीं गया, परमेश्वर ने उसे दोबारा दर्शन नहीं दिया। जब तक कि वह अपने नज़दीकी रिश्तेदारों से दूर नहीं हो गया, सिवाय लूत के।

तब हम देखते हैं कि “इस प्रकार वे कनान देश मंे आ गए।“ तब आगे पद 6 में लिखा हैं।

उत्पत्ति 12:6 “उस देश के बीच से जाते हुए अब्राम शकेम में, जहाँ मोरे का बांज वृक्ष है, पहुँचा। उस समय उस देश में कनानी लोग रहते थे।“
यहाँ पर हम यह पाते हैं कि कनानी लोग हाम के पुत्र कनान के वंशज थे। मैं यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण बात जोड़ना चाहता हूँ। कई लोग यह सोचते हैं कि अब्राम ने कसदियों के देश के ऊर नगर को छोड़ दिया, जो भद्दा या भयानक स्थान था, और वह उपजाऊ और अच्छा अनाज देनेवाली भूमि, जहाँ दूध और मधु की धारा बहती है, और जहाँ सब कुछ अच्छा ही है, उस देश में आया। वे लोग सोचते हैं कि अब्राम के इस देश या भूमि में आने के द्वारा उसका भाग्य सुन्दर बन गया, या वह भाग्यवान हो गया। क्या आप भी ऐसा विश्वास करते हैं? मित्रों, बाइबल ऐसा नहीं बताती है। क्योंकि हम भूगर्भ-शास्त्रियों के द्वारा से यह जानते हैं कि कसदियों का ऊर नगर उस समय उच्चकोटि की सभ्यता का स्थान था। और सच बात तो यह है, कि अब्राम और सारै के पास उस समय स्नानागृह भी रहे होंगे। “ऊर“ एक महान् और फलता-फूलता नगर था। और अब्राम ये सब कुछ छोड़कर कनान देश में जाने का निर्णय लिया। लिखा है, “और उस समय कनानी लोग उस देश में रहते थे।“ ये कनानी लोग सभ्य नहीं थे, वे असभ्य और देवी देवताओं के उपासक थे। लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि अब्राम का कनान देश में आना अपनी किस्मत को चमकाना नहीं था। वह इस देश में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के लिए आया। अब जबकि उसने परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए आया था।
तो आइए आगे देखें कि उसकी आज्ञापालन का क्या प्ररिणाम होता है और हम पढ़े पद 7।

उत्पत्ति 12:7 “तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, “यह देश मैं तेरे वंश को दूँगा।” और उसने वहाँ यहोवा के लिये, जिसने उसे दर्शन दिया था, एक वेदी बनाई।“

अब्राम ने परमेश्वर के लिए एक वेदी बनाई। परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया, और यह दूसरा दर्शन था। जब अब्राम हारान में था, जो देरी करने का स्थान था, परमेश्वर ने उसे वहाँ पर दर्शन नहीं दिया।

मित्रों, इस बात पर ध्यान दीजिए कि, कई बार मैं और आप बाइबल तो पढ़ते है लेकिन आशीष प्राप्त नहीं करते हैं, इसका एक कारण यह भी है कि बाइबल हमें दोषी ठहराती है, क्योंकि हम वैसा जीवन को नहीं जीते हैं, जैसा जीवन परमेश्वर ने हमें पहले से ही दिया है। यदि हम परमेश्वर की आज्ञा का पालन करेंगे वो निश्चय ही हम अधिक आशीषें प्राप्त करेंगे। हम अब्राम के जीवन के अनुभव से देख सकते हैं कि परमेश्वर ने उसे तब तक दर्शन नहीं दिया, जब तक कि वह हारान से नहीं निकल गया, और फिर से परमेश्वर की आज्ञा पालन किया, जैसा उसे करना चाहिए था। अब परमेश्वर उसे पुनः दर्शन देते हैं, और अब्राम परमेश्वर के लिए वेदी बनाता है, और आगे हम देखेंगे कि वह वास्तव में एक वेदी बनानेवाला व्यक्ति ठहरा। आगे पद 8 में लिखा है।

उत्पत्ति 12:8 “फिर वहाँ से आगे बढ़ कर वह उस पहाड़ पर आया, जो बेतेल के पूर्व की ओर है, और अपना तम्बू उस स्थान में खड़ा किया जिसके पश्चिम की ओर तो बेतेल और पूर्व की ओर ऐ है। वहाँ भी उसने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई और यहोवा से प्रार्थना की।“

उस देश में पहुँच का अब्राम दो काम करता है, पहला – उसने तम्बू खड़े किए, यह किसी नये स्थान में घर खरीद कर उसमें रहने जैसा है। उसने तम्बू खड़ा किया, और उसमंे रहने लगा। तब उसने “एक वेदी बनाई“ जो परमेश्वर के प्रति उसकी गवाही और आभार था। और जहाँ – कहीं भी अब्राम गया उसने परमेश्वर के लिए उस स्थान में एक गवाही छोड़ी।

मेरे प्रिय मित्रों, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि, आपके पास किस प्रकार की गवाही है? गवाह होने के लिए या गवाही देने के लिए आपको अपने घर के सामने पर्चे लगाने की ज़रूरत नहीं है, और न ही आपको कार में या दरवाज़े में “यीशु बचाता है“ का स्टीकर लगाने की आवश्यकता है, ताकि आप आज़ादी से और तेज़ गति से कार चला सकें, जैसा कि कुछ लोग सोचते हैं। मित्रों, यह किसी प्रकार की गवाही नहीं है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि अब्राम निश्चित रूप से परमेश्वर की आराधना करता था, और बहुत जल्द कनानियों ने, यह जान लिया, कि यह व्यक्ति परमेश्वर का आराधक या उपासक है। तब आगे पद 9 में हम पढ़ते है।

उत्पत्ति 12:9 “और अब्राम आगे बढ़ करके दक्खिन देश की ओर चला गया।“

यदि आप को गर्म क्षेत्र में जाना है तो बेहतर है कि आप दक्षिण की ओर यात्रा करें। इस प्रकार आप देखते हैं कि अब्राम दक्षिण की ओर बढ़ता है। उसके पैर अस्थिर थे, अर्थात् वह चलते रहनेवाला या हमेशा घूमते रहनेवाला व्यक्ति बन गया था।
अब हम उसके जीवन में दूसरी बार कलंक लगने की बात को हम अगले अध्ययन में देखेंग।
आइए प्रार्थना के साथ समाप्त करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

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