उत्पत्ति : सृष्टि से पतन तक

बाइबिल के माध्यम से - उत्पत्ति 11:4 - 11:32
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डॉ. जे. वर्नोन मैकगी के साथ बाइबिल के माध्यम से
पुस्तक : उत्पत्ति
अध्याय : उत्पत्ति 11:4 – 11:32
कार्यक्रम : #0029

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प्रिय मित्रों प्रभु यीशु मसी में आप को प्रेम भरा नमस्कार। आशा है आप स्वस्थ्य और सुरक्षित है। परमेश्वर का अनुग्रह आप पर बना हुआ है। एक बार पुनः आप का सत्यवचन बाइबल अध्ययन में स्वागत है। पिछले प्रसारण में हम उत्पत्ति 11 अध्याय के आरंभ में ही बाबुल की मीनार के बनाए जाने पर मनन कर रहे थे। अब हम उसी अध्ययन को पद 4 से आगे बढ़ाएंगे। तो आईए हम पढ़ें अत्पत्ति 11 का पद 4, लिखा है।
उत्पत्ति 11:4 “फिर उन्होंने कहा, “आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें, ऐसा न हो कि हम को सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े।”

मित्रों, यहाँ पर ध्यान दीजिए, कि उन्होंने कहा, “आओ हम अपने लिए एक नगर बनाएँ… और अपने लिए एक नाम कमाएँ, ऐसा न हो कि हम पृथ्वी पर तितर-बितर हो जाएँ।“ उनके पास “मैं“ शब्द की एक बुरी दशा या आदत थी, कि “आओ हम अपने लिए नाम कमाएँ।“ मेरे विचार से इस मीनार का एकमात्र उद्देश्य मनुष्यों को एकत्र करने के लिए था।

वास्तव में बाबुल की मीना जिग्गुरात आकार में थी जो नीचे से चौड़ी पर ऊपर की ओर सकरी होती जाती है। ऐसे आकार के बहुत से मीनारों के अवशेष टायग्रीस-युफ्राटीस की घाटी में देखने को मिलते हैं। कसदियों के ऊर नगर में जहाँ अब्राहम रहता था वहाँ भी ऐसी एक मीना का अवशेष पाया गया है। वह पूर्णतः ईंट से बड़ी मज़बूती से बनी थी। इसके चारों ओर एक सड़क या रास्ता था जो चोटी की तरफ जाता था। और स्पष्ट रूप से इस चोटी पर एक वेदी थी जिसमें मानवबलि चढ़ाई जाती थी। बाद में बच्चों की भी बलि चढ़ाई जाने लगी, उन्हें एक लाल-गरम प्रतिमा में चढ़ाया जाता था। ये सब बातें जिग्गुरत के बाद के इतिहास में जुड़ी हैं।

परन्तु बाबुल की मीनार, के निर्माण के समय, यह (मीनार) सर्वशक्तिमान सामर्थी परमेश्वर के विरुद्ध, मनुष्यों के विद्रोह को दर्शाता है। और स्पष्ट रूप से यह निम्रोद ही था जिसने इसकी अगुवाई की। वह बाबेल शहर को बनानेवाला और स्पष्ट रूप से बाबेल की मीनार को भी बनवाने वाला वही था। यह स्थान उसके लिए संसार में एक शासक खड़ा करने का था जो परमेश्वर के विरोध में था।

अपनी महत्वकांक्षा को साधने और अपने सपनों को साकार करने के लिए दो विषेशताएँ और कारण अनिवार्य थे। सबसे पहले – उसे एक एकता का केन्द्र चाहिए था, जो एक मुख्यालय जैसे हो, और उसे एक राजधानी की भी आवश्यकता थी। एक स्थान जहाँ लोग एकत्रित हो सकें, एक स्थान जहाँ से देखभाल की जा सके। और इसी कारण से उसने बाबेल शहर को बनाया या बसाया था। इस संसार में उसके एक शासक बनने की आवश्यकता को वह पूरी कर रहा था। अब दूसरा है – कि उसे भीड़ जमा करने के लिए एक स्थान चाहिए था, जो न केवल भौगोलिक तरीके से, परन्तु मनोवैज्ञानिक तरीके से निर्माण किया गया हो। जो उनमें एक उत्साह को उत्पन्न करे, और उन्हें एक जिज्ञासा, एक प्रेरणा, एक संगीत, और युद्ध की पुकार दे। जैसे कि झण्डे लिए हुए जवानों के चारों ओर एक भीड़ हो जाए। मित्रों, वहाँ पर एक सम्मोहक और सम्मोहक प्रेरणा होना चाहिए। वहाँ एक स्मारक होना चाहिए जैसे लेनीन की कब्र थी, जहाँ कम्यूनिस्ट मिलते थे, और ठीक उसी प्रकार निम्रोद के दिनों में यह बाबेल का मीनार था, जहाँ लोग एकत्रित होते थे। वे कहते हैं, “आओ हम अपने लिए“ यह परमेश्वर के विरोध में एक चुनौती और विद्रोह है। आगे लिखा है, “आओ हम अपने लिए नाम कमाएँ।“ मित्रों, यह उनके अभिमानी उद्देष्य को प्रगट करता है।

आइए अब हम देखें कि बाबेल का मीनार क्या नहीं था। वह बारिश के बाढ़ से छुपने का शरणस्थान नहीं था। वह जलप्रलय के पानी से और ऊपर तक नहीं बन रहा था जैसे कि कुछ व्याख्याकर्त्ता मानते हैं। और मैं इसे एक बचकानी व्याख्या मानता हूँ। लेनीन की कब्र कोई शरणस्थान नहीं थी, जब वोलगा नदी उसके ऊपर से बहकर जाती थी। यहाँ पर यह मीनार परमेश्वर के विरोध में मनुष्य के घमण्ड, जिद्दीपन, और विद्रोही स्वभाव को प्रगट करती है। परमेश्वर ने मनुष्य से कहा था कि फूलो – फलो और पृथ्वी में भर जाओ। परन्तु इसके बदले में मनुष्यों ने उत्तर दिया कि हमें कुछ नहीं करना है। हम लोग अलग होने नहीं जा रहे हैं, परन्तु हम सब एक जुट होकर रहनेवाले हैं। हम आपके साथ शुरू से अन्त तक हैं। मित्रों, बाबेल का मीनार परमेश्वर के विरोध में था।

मित्रों मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि बाबेल की मीनार एक धार्मिक चिन्ह भी था। यह एक जिग्गुरत था जैसे कि पहले ही मैं कह चुका हूँ कि उस पूरी घाटी में विध्वंस जिग्गुरत हैं। ये वे स्थान थे जहाँ पर लोग सृष्टि की आराधना किया करते थे, न कि सृष्टिकर्त्ता की। कुछ जिग्गुरत में चोटी पर जाने का रास्ता था। जहाँ लोग सूरज, चाँद और तारों की उपासना करते थे। जब कभी भी वे सूरज, चाँद और तारों को देखते थे, तो उन्हें मालूम हो जाता था कि जलप्रलय नहीं होगा। और उन्होंने यह महसूस किया कि जलप्रलय को भेजने में परमश्वर इच्छुक था।

अब हम इस बाबेल की मीनार के प्रति परमेश्वर की प्रतिक्रिया देखते हैं। आइए हम पढ़ें पद 5 और 6 लिखा है।
उत्पत्ति 11:5 “जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे, तब उन्हें देखने के लिये यहोवा उतर आया।“

उत्पत्ति 11:6 “और यहोवा ने कहा, “मैं क्या देखता हूँ कि सब एक ही दल के हैं, और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जो कुछ वे करने का यत्न करेंगे, उसमें से कुछ भी उनके लिये अनहोना न होगा।“

मित्रों, यह एक आश्चर्यजनक कथन है, जबकि सब लोग एक ही भाषा बोलते थे, तो उनके लिए भाषा एक बड़ी समस्या नहीं थी। इसलिए वे एक जुट होकर अपनी बुद्धि और साधन का प्रयोग कर सकते थे। लिखा है कि, “और अब जो कुछ वे करने का यत्न करेंगे, उसमें से कुछ भी उनके लिये अनहोना न होगा।“ मित्रों, यहाँ पर हम मनुष्य के पापमय स्वभाव को देखते हैं जो जलप्रलय से बचने के बाद भी हम में बना रहा है, कि वह पूर्ण रूप से भष्ट था। परमेश्वर इस विद्रोह को अनदेखा नहीं कर सकता था क्योंकि उनका यह विद्रोह परमेश्वर के विरुद्ध था। इसलिए अब परमेश्वर एक सुरक्षा की दीवार खड़ी करने जा रहे था। वह एक अवरोधक लगाने जा रहे था। ऐसा करना आवश्यक था, क्योंकि मनुष्य एक सक्षम सृष्टि है वह चाँद पर जा सकता है और हवाई जहाज़ से उड़ सकता है। आज भी मुझे आश्चर्य होता है कि हम हवाई जहाज़ में ध्वनी की गजी से यात्रा कर सकते और उसमें दिए जानेवाले भोजन का आनन्द ले सकते है। कभी-कभी ये सब कुछ असंभव सा लगता है। लेकिन मनुष्य ने ऐसा कर दिखाया है क्योंकि वह परमेश्वर की एक बहुत सुयोग्य सृष्टि या रचना है।
मित्रों, आप देख सकते हैं कि यदि मानवजाति एक ही भाषा के हो और यदि वे परमेश्वर के विरुद्ध में हो जाएं, तो वे क्या कर सकते हैं।
तो आइए देखें कि तब परमेश्वर ने क्या किया – हम पढ़ते हैं, उत्पत्ति 11:7-9

उत्पत्ति 11:7 “इसलिये आओ, हम उतर के उनकी भाषा में गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सकें।”
उत्पत्ति 11:8 “इस प्रकार यहोवा ने उनको वहाँ से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया।“
उत्पत्ति 11:9 “इस कारण उस नगर का नाम बेबीलोन पड़ा; क्योंकि सारी पृथ्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, वह यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्यों को सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया।“
अब मनुष्य पृथ्वी की छोर तक फैल जाते हैं। वे विद्रोह के समय में एक साथ थे। लेकिन अब वे एक दूसरे की भाषा नहीं समझ सकते थे। मित्रों, क्या आप जानते हैं, कि भाषा अवरोधक है, एक दीवार है, जो चीन देश की दीवार से भी ऊँची और प्रभावपूर्ण है। यह वह दीवार है जो मनष्य को मनुष्य से अलग करती है। यह किसी भी देश की राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र से किसी समुद्र से भी मज़बूत है।
बहुत से लोग हैं जो यह कहते हैं कि समय के अन्तराल भाषाएँ बनती चली गई या बन गई। परन्तु परमेश्वर ने कहा, कि उसने उनकी भाषा में, गड़बड़ी डाल दी, इसलिए जब वे मीनार बना रहे थे, तो अचानक से एक दूसरे की भाषा वे नहीं समझ पाए। मीनार बनाने का कार्य अचानक थम सा गया और भीड़ बाबेल को छोड़कर जाने लगी। और वे हरेक दिशा में चले गए।
मित्रों, यह एक अद्भुत घटना है जो इस प्रकार से घटी। यहाँ पर “अन्य-अन्य भाषा में बोलना आरंभ हुआ था,“ जो एक दूसरे की भाषा को नहीं समझ पाए। यह एक चमत्कार था। एक अन्य भाषा बोलने का चमत्कार और सुनने का चमत्कार था। वे अन्य भाषा बोल रहे थे, जिन्होंने भी यह सुना वे समझने में असमर्थ थे।
मित्रों, मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ, क्या भाषा को बदल देना आशीष थी, या मनुष्य के ऊपर शाप था? यह एक अच्छा प्रश्न है और परमेश्वर की दृष्टिकोण से यह एक आशीष है। मनुष्य अपनी उन्नति के लिए परमेश्वर से दूर गया, जो निश्चित रूप से एक दण्ड था। कई शताब्दियों से मानवजाति को अलग रखा गया है। और यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ी रूकावट रही है। इन दिनों में एक चीज़, जो रेडियो, टेलीविजन, और जेट जहाज़ की यात्रा के द्वारा हो रहा है, और वह यह है कि भाषा की दीवारें गिराई जा रही हैं। वे यरीहो की दीवार या शहरपनाह की तरह गिर रही हैं। मैं विश्वास करता हूँ कि यही एक कारण है कि परमेश्वर पुनः न्याय के लिए आगे बढ़ रहा हैं।

आइए अब हम इस अन्य भाषा की क्रिया को पिन्तेकुस्त के दिन की उन घटनाओं के विरुद्ध रख कर देखें। वह अन्य भाषा की एक दूसरी बड़ी की क्रिया थी। और उस समय हम देखते हैं कि सुसमाचार सभी भाषाओं में प्रचार किया गया जो वहाँ उपस्थित लोगों के द्वारा समझा गया। यहाँ वे अनजान भाषा में नहीं बोल रहे थे। अन्य भाषा की क्रिया को आरंभ करने मंे कभी भी इसे शामिल नहीं किया गया। पिन्तेकुस्त के दिन परमेश्वर बाबेल के मीनार का उत्तर दे रहे थे, परमेश्वर मानवजाति से कह रहे हैं, “मेरे पास एक सुसमाचार और एक सन्देश तुम्हारे लिए है, और मैं तुम्हारे पास सुसमाचार के साथ तुम्हारी ही भाषा में आ रहा हूँ।“

यही एक बात है जिसे परमेश्वर ने पूरा किया है और आज बाइबल अन्य पुस्तकों की अपेक्षा ज्यादा भाषाओं में पढ़ने के लिए उपलब्ध है। आज भी इसका अनुवाद कई छोटी-छोटी भाषाओं में किया जा रहा है और संसार में हज़ारों भाषा बोलने वालों तक पहुँचाई जा रही है। क्योंकि सुसमाचार सभी मानवजाति के लिए है, और अन्य भाषा में बोलने का कारण और उद्देश्य यह था, कि मानवजाति जान ले कि इसका उत्तर परमेश्वर ने बाबेल की मीनार में दे दिया है। अब मानवजाति के लिए उसके पास छुटकारा है। उसके लक्ष्य पूरे हो चुके हैं। अब यह आवश्यक नहीं है कि मनुष्य अपने उद्धार के लिए कार्य करे। वह परमेश्वर के सन्देश को सुनकर उसकी ओर फिर सकता है। मित्रों, सुसमाचार आपके लिए है, आप कोई भी क्यों न हों, और कोई भी भाषा क्यों न बोलते हों। यह सिर्फ आपके लिए ही है, यह संसार की सभी जाति और भाषा के लोगों लिए है। हमें बाइबल की अन्तिम पुस्तक प्रकाशितवाक्य में बताया गया है कि एक दिन सब उसकी उपस्थिति में खड़े किए जाएँगे। प्रकाशितवाक्य 7:9 “… हर एक जाति और कुल, और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था, …मेमने के सामने खड़ी है।“

शेम से अब्राहम
अब हम शेम से अब्राहम तक के वंश को देखेंगे। यहाँ शेम का वंश है जो पूरे पुराने नियम में अनुसरण किया गया है। तो आइए हम पढ़ें उत्पत्ति 11 का 10।

उत्पत्ति 11:10 “शेम की वंशावली यह है। जल-प्रलय के दो वर्ष पश्चात् जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उससे अर्पक्षद का जन्म हुआ।“
शेम की वंशावली अगले पदों मंे दी गई है जिसे हम पढ़ते हैं, पद 24 और 26 में, लिखा है।
उत्पत्ति 11:24 “जब नाहोर उनतीस वर्ष का हुआ तब उसके द्वारा तेरह का जन्म हुआ।“
उत्पत्ति 11:25 “और तेरह के जन्म के पश्चात् नाहोर एक सौ उन्नीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियाँ उत्पन्न हुईं।“
आप देख सकते हैं कि हम तेरह के वंशक्रम का अनुसरण कर रहे हैं। पर तेरह के वंश क्रम को क्यों? अगले पद संख्या 26 को देखें।

उत्पत्ति 11:26 “जब तक तेरह सत्तर वर्ष का हुआ, तब तक उसके द्वारा अब्राम और नाहोर और हारान उत्पन्न हुए।“

अब हम अब्राम के वंश को देखने जा रहे हैं, जिसे हम अब्राहम के रूप में जानते हैं।
हम लोग शेम के वंश को देख रहे हैं और वास्तव में हम बाइबल में से इस वंश का अनुसरण करते हुए जा रहे हैं, क्योंकि बाइबल इसी वंश का अनुसरण करती है। परमेश्वर का वचन इसी वंश का अनुसरण करते हुए सीधे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस तक जाता है। परमेश्वर ने इन सबको आरंभिक रूप में आलिखित किया है। और अब परमेश्वर ने मनुष्यों को प्रदर्शित करता है कि मानव पाप में है। हम कैन और हाबिल की घटना में पाते हैं कि कैन ने इस बात को नहीं स्वीकारा की वह एक पापी है। उसमें हम जीविका के घमण्ड के प्रदर्शन को देखते हैं। जलप्रलय के समय हम शारीरिक पाप को देखते हैं, क्योंकि उस समय लोगों ने अपने आपको शारीरिक पापों के लिए सौंप दिया था। वे हिंसा कार्य में लिप्त थे और उनके विचार और कल्पनाएँ बुरे थे। वे अपने जीवन में परमेश्वर की आवश्यकता के प्रति अन्धे थे। वे परमेश्वर की मांग के प्रति बहरे थे। परमेश्वर के लिए वे मरे हुए थे। वे पाप और अपराध में मरे हुए थे। परमेश्वर ने उन्हें नूह के द्वारा एक निमंत्रण दिया। परन्तु उन्होंने उस निमंत्रण को ठुकरा दिया और शारीरिक पाप करते रहे। तब बाबेल की मीनार के निकट हम उनकी इच्छा के पाप को देखते हैं जो उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया। वही बाबेल का मीनार था।
मित्रों, आपके पास भी ऐसा कोई छोटा बाबेल का मीनार है, जिसे आपने बनाया है? क्या आप परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह में हैं? जो भी हो, यह मनुष्य का एक स्वभाव है कि वह परमेश्वर के विरुद्ध में विद्रोह करता रहता है। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूँ।

एक बार एक छोटे और नटखट बच्चे से परेशान होकर उसकी माँ ने उसे समझाया कि वह बदमाशी न करे। लेकिन वह नहीं माना। तब उसकी माँ ने उसे बुलाया और दीवार की तरफ मुँह करके उसे बैठने को कहा और बाकी सदस्य उसे छोड़कर अपने-अपने कमरे में चले गए। कुछ समय के बाद माँ ने उसकी आवाज़ सुनी और पुकार कर कहा, यहाँ आओ। जब छोटा बालक माँ के सामने आया, तो माँ ने उससे पूछा, क्या तुम दीवार की ओर मुँह करके बैठे थे। उस बालक ने जवाब दिया, हाँ मैं बैठा तो था परन्तु अपने हृदय में मैं अभी भी खड़ा ही हूँ।
मित्रों, मेरा विश्वास कीजिए आज भी बहुत से स्त्री और पुरुष हैं जो अपने हृदय के अन्दर में खड़े हुए हैं, वे परमेश्वर के विरुद्ध में खड़े हुए हैं। उन्होंने अपने लिए, एक छोटा बाबेल का मीनार बना लिया है।
अब जैसे की हम यीशु मसीह की ओर ले जानेवाले वंश का अनुसरण करते हैं तो यहाँ पर तेरह की पीढ़ी या परिवारों की सूची हमें पढ़ने को मिलती है तो हमें 11 अध्याय के पद 27 से 32 में दी गई है, लिखा है।
तेरह की वंशावली
उत्पत्ति 11:27 “तेरह की वंशावली यह है। तेरह से अब्राम, नाहोर और हारान का जन्म हुआ; और हारान से लूत का जन्म हुआ।“
उत्पत्ति 11:28 “हारान अपने पिता के सामने ही कसदियों के ऊर नामक नगर में, जो उसकी जन्मभूमि थी, मर गया।“
उत्पत्ति 11:29 “अब्राम और नाहोर दोनों ने विवाह किया। अब्राम की पत्नी का नाम सारै और नाहोर की पत्नी का नाम मिल्का था। यह उस हारान की बेटी थी, जो मिल्का और यिस्का दोनों का पिता था।“
उत्पत्ति 11:30 “सारै तो बाँझ थी; उसके सन्तान न हुई।“
उत्पत्ति 11:31 “तेरह अपने पुत्र अब्राम, और अपने पोते लूत, जो हारान का पुत्र था, और अपनी बहू सारै, जो उसके पुत्र अब्राम की पत्नी थी, इन सभों को लेकर कसदियों के ऊर नगर से निकल कनान देश जाने को चला; पर हारान नामक देश में पहुँचकर वहीं रहने लगा।“

उत्पत्ति 11:32 “जब तेरह दो सौ पाँच वर्ष का हुआ; तब वह हारान देश में मर गया।“
हमें अब्राहम के जीवन और उसके वंश की थोड़ी जानकारी इसलिए दी गई क्योंकि हम अब्राहम के वंश क्रम का अनुसरण करने जा रहे है जिसो हम अगले अध्याय में देखेंगे।
इस स्थान में उत्पत्ति की पुस्तक और, वास्तव में, पूरी बाइबिल एक नया मोड़ लेती है। एक बहुत बड़ा विभाजन जो सीधे उत्पत्ति की पुस्तक के बीच से गुज़रता है। पहले ग्यारह अध्याय एक तरफ हैं, और आखिरी उनतालीस अध्याय दूसरी तरफ हैं। पहले ग्यारह अध्याय में 2,000 से अधिक सालों का समय पूर्ण होता हैं, जो कि बाइबिल के बाकी हिस्सों को मिलाकर बने पूरे समय के बराबर है। इन 2,000 सालों की तुलना उत्पत्ति 12 से 50 अध्याय के 350 सालों से करें। उत्पत्ति के इन पहले ग्यारह अध्यायों में हमने सृष्टि की रचना, मनुष्य का पतन, जलप्रलय और बाबेल की मीनार को देखा है। ये चार बड़ी घटनाएँ हैं जिन्होंने इतने लंबे समय के इतिहास को किया। ये चार महान घटनाएं कई सालों के समय को आपने में समाए हुए हैं जो हमारी कल्पना से बाहर है।
परमेश्वर महान है और हम उसे असानी से समझ नहीं सकते। परन्तु हम परमेश्वर के वचन बाइबल से उसे जान सकते हैं। आइए हम उस बाइलब के परमेश्वर को धन्यवाद दें और प्रार्थना करें।

अध्ययन मार्गदर्शिका

जे. वर्नोन मैकगी के नोट्स और रूपरेखाएँ

उत्पत्ति — बाइबिल की बीज-भूमि

लेखक: मूसा। उत्पत्ति नाम सेप्टुआगिंट (LXX) से लिया गया है, जो पुराने नियम का एक ग्रीक अनुवाद है जो अलेक्जेंड्रिया में 285-247 ईसा पूर्व के आसपास टॉलेमी फिलाडेल्फस के आदेश पर किया गया था। जोसेफस हमें बताता है कि 72 पुजारियों (प्रत्येक 12 जनजातियों में से छह) ने 72 दिनों में यह अनुवाद तैयार किया। मसीह और पॉल दोनों ने इस अनुवाद से उद्धृत किया।

उत्पत्ति का अर्थ है “उत्पत्ति,” “स्रोत,” “जन्म।” ग्रीक क्रिया gennao — “जन्म देना” या “पैदा करना” से व्युत्पन्न, यह शुरुआत और स्रोतों की पुस्तक है, और विशेष रूप से जन्मों की पुस्तक है। यह पीढ़ियों की पुस्तक है: स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य की वंशावली। उत्पत्ति 3:15 में नया जन्म भी सुझाया गया है, जिसमें एक उद्धारकर्ता का पहला उल्लेख है।

उत्पत्ति शुरुआत की पुस्तक है: सृष्टि, पुरुष, स्त्री, सब्त, विवाह, परिवार, कार्य, पाप, हत्या, बलिदान, नस्लों, भाषाओं, संस्कृति, सभ्यता और मुक्ति की शुरुआत। यह दो प्राकृतिक विभाजनों में आती है — उत्पत्ति 2:4 (स्वर्ग और पृथ्वी के जन्म की पुस्तक) और उत्पत्ति 5:1 (पुरुषों के जन्म की पुस्तक)।

मुख्य शब्द: पीढ़ियाँ। उद्देश्य: हमें परिवार देना — उत्पत्ति 12:3; 22:18; 28:13–14; प्रेरितों के काम 3:25; गलातियों 3:6, 9, 16। पहले 11 अध्याय कम से कम 2,000 वर्षों को कवर करते हैं; अध्याय 12 से अध्याय 50 तक, समय केवल 350 वर्ष है। यह विरोधाभास हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहिए — अध्याय 12 में रिकॉर्ड नाटकीय रूप से धीमा हो जाता है क्योंकि व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए विश्व की घटनाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

टिप्पणी: अब्राहम परमेश्वर के लिए ब्रह्मांड से अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्वर एक परिवार के इतिहास के 350 वर्षों को 39 अध्यायों में समर्पित करते हैं, जबकि विश्व इतिहास के पहले 2,000+ वर्षों को केवल 11 अध्यायों में कवर करते हैं। चार सुसमाचारों में, वही सिद्धांत प्रकट होता है: चार अध्याय यीशु के जीवन के पहले 30 वर्षों को कवर करते हैं, जबकि 85 अध्याय अंतिम तीन वर्षों को कवर करते हैं, और 27 अध्याय अंतिम आठ दिनों को कवर करते हैं। जोर हमेशा उस पर होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है — और उत्पत्ति में, वह एक चुने हुए परिवार के माध्यम से परमेश्वर की मुक्ति योजना है।

उत्पत्ति बनाम बेबीलोनियन विवरण: बेबीलोनियन सृष्टि की गोलियों के साथ तुलना बाइबिल के रिकॉर्ड की श्रेष्ठता को प्रकट करती है। बेबीलोनियन गोलियाँ अराजकता से शुरू होती हैं; बाइबिल ब्रह्मांड और पूर्णता से शुरू होती है। बेबीलोनियन विवरण स्वर्गीय पिंडों को देवताओं के रूप में मानता है; बाइबिल उन्हें पदार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। बेबीलोनियन पाठ बहुदेववादी है; उत्पत्ति एकेश्वरवादी है। बेबीलोनियन गोलियाँ एक शिल्पकार के काम को दर्शाती हैं; उत्पत्ति में, परमेश्वर ने बात की। बेबीलोनियन विवरण बचपन और विकृति की विशेषता है; बाइबिल एक पवित्र सृष्टिकर्ता की भव्य और गंभीर वास्तविकताओं को प्रस्तुत करती है जो एक उद्धारकर्ता भी है। जबकि बेबीलोनियन विवरण विज्ञान के साथ सामंजस्य में नहीं है, उत्पत्ति का रिकॉर्ड विज्ञान के अनुरूप है — इतना अधिक कि कई वैज्ञानिक विश्वासी हैं।

I. पृथ्वी पर पाप का प्रवेश (अध्याय 1-11)

  • A. सृष्टि, अध्याय 1-2
    1. स्वर्ग और पृथ्वी, 1:1 — “सृष्टि” (बारा) केवल 3 बार आता है (पद 1, 21, 27)
    2. पृथ्वी उजाड़ और शून्य हो गई, 1:2
    3. पुनः-सृष्टि, 1:3-2:25
      • a. पहला दिन — प्रकाश, 1:3-5
      • b. दूसरा दिन — वायुमंडल (आकाश), 1:6-8
      • c. तीसरा दिन — सूखी भूमि प्रकट होती है और वनस्पति जीवन, 1:9-13
      • d. चौथा दिन — सूर्य, चंद्रमा, तारे प्रकट होते हैं, 1:14-19
      • e. पाँचवाँ दिन — पशु जीवन (जीव विज्ञान), 1:20-23
      • f. छठा दिन — सृष्टि की उर्वरता और मनुष्य की सृष्टि, 1:24-31
      • g. सातवाँ दिन — सब्त, 2:1-3
      • h. मनुष्य की सृष्टि का पुनर्कथन, 2:4-25 (पुनरावृत्ति का नियम)
  • B. पतन, अध्याय 3-4
    1. पाप की जड़ — परमेश्वर पर संदेह करना और उसकी अवज्ञा करना
    2. पाप का फल — “हृदय से … हत्याएँ निकलती हैं …” (मत्ती 15:19)
  • C. जलप्रलय, अध्याय 5-9
    1. आदम की पीढ़ियों की पुस्तक — सेथ के माध्यम से — मनुष्य के इतिहास की शुरुआत — मृत्युलेख, अध्याय 5
    2. जलप्रलय-पूर्व सभ्यता — जलप्रलय का कारण और सन्दूक का निर्माण, अध्याय 6
    3. जलप्रलय का न्याय, अध्याय 7
    4. जलप्रलय-पश्चात सभ्यता — जलप्रलय के बाद, अध्याय 8
    5. जलप्रलय-पश्चात जीवन — नई शुरुआत, अध्याय 9
  • D. बाबुल का बुर्ज और भाषाओं का भ्रम, अध्याय 10-11
    1. जाति विज्ञान — नूह के पुत्र, अध्याय 10
    2. बाबुल का बुर्ज, अध्याय 11 (पेंटेकोस्ट के दिन के विपरीत)
  • रूपरेखा (वंशावली के अनुसार):
    • उत्पत्ति 1:1–2:6 — स्वर्ग और पृथ्वी की पीढ़ियों की पुस्तक — सृष्टि का दिव्य काव्य — परमेश्वर का रचनात्मक कार्य
    • उत्पत्ति 2:7–6:8 — आदम की पीढ़ियों की पुस्तक (पुरुष, मानव) — आदम को बनाया गया था, लेकिन उसे बच्चे पैदा हुए
    • उत्पत्ति 6:9–9:29 — नूह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 10:1–11:9 — नूह के पुत्रों की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 11:10-26 — शेम के पुत्रों की पीढ़ियाँ (अन्यजाति)
    • उत्पत्ति 11:27–25:11 — तेरह की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:12-18 — इश्माएल की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 25:19–35:29 — इसहाक की पीढ़ियाँ (“इसहाक में तेरा वंश कहलाएगा” — उत्पत्ति 21:12; इब्रानियों 11:8-9; रोमियों 9:7)
    • उत्पत्ति 36:1–37:1 — एसाव की पीढ़ियाँ
    • उत्पत्ति 37:2–50:26 — याकूब की पीढ़ियाँ (अस्वीकृत वंश पहले दिया गया, चुना हुआ वंश अंत में — cf. 1 कुरिन्थियों 15:46)

II. समस्त मानवजाति के उद्धारकर्ता के आगमन की तैयारी (अध्याय 12-50)

  • A. अब्राहम (विश्वास), अध्याय 12-23

    (परमेश्वर के सात दर्शनों द्वारा विश्वास का विकास)

    1. अब्राम को परमेश्वर का बुलावा और वादा — विश्वास की कमी से उसकी प्रतिक्रिया, अध्याय 12
    2. अब्राम मिस्र से भूमि पर लौटता है — लूत से अलग होता है — परमेश्वर अब्राम को तीसरी बार दर्शन देता है, अध्याय 13
    3. पहला युद्ध — अब्राम लूत को बचाता है; पहला याजक — अब्राम को मेल्कीसेदेक द्वारा आशीष मिलती है, अध्याय 14
    4. परमेश्वर अब्राम को स्वयं को और अधिक पूरी तरह से प्रकट करता है — अपने वादों की पुष्टि करता है, अध्याय 15
    5. साराई और अब्राम का अविश्वास — इश्माएल का जन्म, अध्याय 16
    6. परमेश्वर अब्राहम के साथ वाचा बनाता है (अब्राम अब्राहम बन जाता है) — एक पुत्र के बारे में वादे की पुष्टि करता है, अध्याय 17
    7. परमेश्वर अब्राहम को सदोम के आने वाले विनाश को प्रकट करता है — अब्राहम मध्यस्थता करता है, अध्याय 18
    8. दूत लूत को चेतावनी देते हैं — लूत सदोम छोड़ देता है — परमेश्वर मैदान के शहरों को नष्ट कर देता है, अध्याय 19
    9. अब्राहम सारा के संबंध में गेरार में पाप दोहराता है, अध्याय 20
    10. इसहाक का जन्म — हागार और इश्माएल को बाहर निकाला जाता है — अब्राहम बेर्शेबा में, अध्याय 21
    11. परमेश्वर अब्राहम को इसहाक को बलिदान करने का आदेश देता है — उसे रोकता है — वाचा की पुनः पुष्टि करता है, अध्याय 22
    12. सारा की मृत्यु — अब्राहम दफन स्थान के लिए मखपेला की गुफा खरीदता है, अध्याय 23
  • B. इसहाक (प्रिय पुत्र), अध्याय 24-26

    (एक दुल्हन का चुनाव मसीह और कलीसिया से तुलना करता है)

    1. अब्राहम इसहाक के लिए दुल्हन के लिए नौकर भेजता है — रेबेका लौटती है — इसहाक की दुल्हन बनती है, अध्याय 24
    2. अब्राहम की मृत्यु — एसाव और याकूब (जुड़वाँ) का जन्म — एसाव याकूब को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचता है, अध्याय 25
    3. परमेश्वर इसहाक को वाचा की पुष्टि करता है — इसहाक रेबेका के साथ संबंध को गलत बताता है — इसहाक गेरार में कुआँ खोदता है, अध्याय 26
  • C. याकूब (“जिसे प्रभु प्यार करता है उसे वह अनुशासित करता है”), अध्याय 27-36
    1. याकूब और रेबेका एसाव के लिए इच्छित आशीष प्राप्त करने के लिए षड्यंत्र करते हैं, अध्याय 27
    2. याकूब घर छोड़ता है — बेतेल में परमेश्वर उसे दर्शन देता है — अब्राहमिक वाचा की पुष्टि करता है, अध्याय 28
    3. याकूब हारान पहुँचता है — राहेल और चाचा लाबान से मिलता है — राहेल के लिए सेवा करता है — लेआ से शादी करने के लिए धोखा दिया जाता है, अध्याय 29
    4. याकूब के पुत्रों का जन्म — याकूब लाबान को छोड़ने की तैयारी करता है — याकूब का सौदा सफल होता है, अध्याय 30
    5. याकूब हारान से भागता है — लाबान उसे पकड़ लेता है — याकूब और लाबान मिजपा वाचा बनाते हैं, अध्याय 31
    6. याकूब के जीवन में संकट: पेनीएल में एक व्यक्ति उससे कुश्ती करता है — याकूब का नाम बदलकर इस्राएल कर दिया जाता है, अध्याय 32
    7. याकूब एसाव से मिलता है — याकूब शालेम की यात्रा करता है, अध्याय 33
    8. याकूब के परिवार में घोटाला: दीना को अपवित्र किया जाता है — भाई हामोर के पुरुषों को मारकर बदला लेते हैं, अध्याय 34
    9. याकूब बेतेल लौटता है — राहेल बेतलेहेम में मर जाती है — इसहाक हेब्रोन में मर जाता है, अध्याय 35
    10. एसाव का परिवार जो एदोम राष्ट्र बन जाता है, अध्याय 36
  • D. यूसुफ (दुख और महिमा), अध्याय 37-50
    1. याकूब कनान में रहता है — यूसुफ को गुलामी में बेच दिया जाता है, अध्याय 37
    2. यहूदा का पाप और शर्म, अध्याय 38
    3. मिस्र में अपमान, अध्याय 39-40
      1. पोतीफर के घर में overseer — पोतीफर की पत्नी द्वारा प्रलोभित और फिर फंसाया गया — कैद किया गया, अध्याय 39
      2. यूसुफ जेल में बेकर और बटलर के सपनों की व्याख्या करता है, अध्याय 40
    4. मिस्र में उत्थान, अध्याय 41-48
      1. यूसुफ फिरौन के सपनों की व्याख्या करता है — मिस्र का overseer बनाया गया — असेनाथ से शादी करता है — मनश्शे और एप्रैम का जन्म, अध्याय 41
      2. याकूब अपने दस बेटों को अनाज के लिए मिस्र भेजता है — यूसुफ से मुलाकात — शिमोन को बंधक के रूप में छोड़ता है — अनाज और वापस किए गए पैसे के साथ घर लौटता है, अध्याय 42
      3. याकूब बेटों (बेंजामिन सहित) को फिर से मिस्र भेजता है — यूसुफ के घर में मनोरंजन किया जाता है (अपनी पहचान प्रकट नहीं करता), अध्याय 43
      4. यूसुफ भाइयों को घर भेजता है — steward द्वारा गिरफ्तार किया जाता है — बेंजामिन के बोरे में कप मिलता है — यहूदा बेंजामिन के लिए विनती करता है, अध्याय 44
      5. यूसुफ अपनी पहचान प्रकट करता है — भाइयों के साथ भावुक पुनर्मिलन — याकूब और पूरे परिवार को मिस्र आमंत्रित करता है, अध्याय 45
      6. याकूब परिवार (70) के साथ मिस्र चला जाता है — याकूब और यूसुफ का पुनर्मिलन, अध्याय 46
      7. याकूब और भाई गोशेन में रहते हैं — फिरौन के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं — अकाल मिस्रियों को भूमि बेचने के लिए मजबूर करता है — यूसुफ शपथ लेता है कि वह याकूब को कनान में दफनाएगा, अध्याय 47
      8. याकूब मृत्युशय्या पर यूसुफ के बेटों को आशीष देता है, अध्याय 48
    5. याकूब और यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 49-50
      1. याकूब 12 बेटों के लिए मृत्युशय्या पर आशीष और भविष्यवाणी देता है, अध्याय 49
      2. कनान में याकूब की मृत्यु और दफन — मिस्र में यूसुफ की मृत्यु और दफन, अध्याय 50

आज के पैसेज से आपने जो मुख्य बात सीखी, उसे लिखें।

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